/रंगराजन की रिपोर्ट : कितना सच, कितना झूठ..

रंगराजन की रिपोर्ट : कितना सच, कितना झूठ..

आज रंगराजन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपते हुए गरीबी और जीवन यापन के लिए आवश्यक न्यूनतम आय की 2011-12 में दाखिल तेंदुलकर कमेटी की पिछली रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया. रंगराजन कमेटी ने आज सौंपी गयी रिपोर्ट में शहरी इलाको में प्रतिदिन 47 रूपए से अधिक कमाने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर बताया है और 32 रूपए से अधिक कमाने वाले ग्रामीण इलाके के निवासी को गरीबी रेखा से नीचे नहीं रखने की सिफारिश की है. इससे पहले तेंदुलकर कमेटी ने ये आंकड़े क्रमशः 32 और 27 रूपए बताये थे.

तेंदुलकर कमेटी के अनुसार 2009-10 में भारत में रहने वाली कुल जनसँख्या का 27 प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे अपनी ज़िन्दगी गुजरने को मजबूर है वहीँ रंगराजन कमेटी इसे ख़ारिज करते हुए कहती है कि उस वक़्त भारत में 38.2 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा के नीचे थी. रंगराजन कमेटी के अनुसार 2011-12 में गरीबी घट कर 29.5 प्रतिशत रह गयी थी वहीँ तेंदुलकरकमेटी के अनुसार इसी काल में गरीबी का प्रतिशत 21.9 था. 2009-10 के वर्ल्ड बैंक के सर्वे के अनुसार भारत में 32.7 प्रतिशत गरीब
थे.

इन आंकड़ों के खेल में आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी कितनी बदल रही है ये किसी भी कमेटी ने नहीं बताया है. सरकार जिस तरह से करोड़ों रूपए ऐसी कमेटियां Rangarajan sugar reportबनाने में खर्च करती है वो जनता की जेब से ही आता है.

एक फेसबुक उपयोगकर्ता की साधारण गणना के अनुसार :

आलू = 25 रू किलो
250 ग्राम लेने पर लगा 6 रूपये पच्चीस पैसा !
250 ग्राम आलूमें दो लोगो कि सब्जी बन जायेगी , जिसमे एक रू का तेल , 25 पैसे का जीरा , 15 पैसेकि हल्दी , 25 पैसे का नमक और 25 पैसे कि मिर्च उसमे डलने पर हुए कुल 8 रू 15 पैसे! मतलब दो लोगो के लिए एक वक्त की सब्जी हुई 8 रू 15 पैसे की !

अब इस सब्जीके साथ आटा भी चाहिए होगा तो मान कर चलो एक आदमी को कम से कम 250 ग्राम आटा तोलगेगा मतलब दो को लगा 500 ग्राम ! घटिया सेघटिया आटा आज 20 रू किलो आता है। तो 500 ग्राम आटे का हुआ 10 रू !
मतलब 10 + 8 रू 15 पैसे = 18 रू 15 पैसे !

अबइसको पकाना भी पड़ेगा और ना चाहते हुए भी आपको 9 रू गैस या घासलेट या लकड़ी के लिएखर्च करने होंगे !

मतलब = 10 + 8.15 + 9 = 27 रू 15 पैसे !

27 रू 15 पैसे मे दो लोगो का एक टाईम का जुगाड़ ये हो रहा है। दोनों टाईम का करे 54 रू30 पैसा होता है ! आप 50 मान लो!

 

इन सामान्य सी गणनाओं के आधार पर साफ़ पता चल जाता है कि इन कमेटियों की रिपोर्ट और सिफारिशें कितनी व्यावहारिक और जन-सुलभ होती हैं. लगातार आने वाली कमेटियों की सिफारिशों के आधार पर देख सकते हैं कि सभी आंकड़े किस तरह से पुरानी सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए नयी सरकार को फायदा पहुँचाने की कोशिश करती है. 2009-10 में गरीबी के आंकड़े बताने वाली सिफारिशों में वर्ल्ड बैंक, तेंदुलकरकमेटी और रंगराजन की सिफारिश, तीनो ही अलग अलग आंकड़े दिखा कर ये बताना चाहते हैं कि बढ़ते समय के साथ गरीबी कम हुयी है. रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार पहले की दोनों रिपोर्ट्स गलत हैं और भारत में गरीबी बढ़ी है. क्या इसे सिर्फ अच्छे दिन की शुरुआत की तरह देखा जाये जो लकीर को छोटा करने के लिए बगल में एक बड़ी लकीर खींच रहे हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.