/अस्मत के सौदागर आनंद सिंघल को बचाने में जुटा पुलिस महकमा..

अस्मत के सौदागर आनंद सिंघल को बचाने में जुटा पुलिस महकमा..

जब भी किसी धनाढ्य के ऊपर आरोप लगता है या किसी अपराध में शामिल होने की खबर आती है तो पूरा का पूरा सिस्टम और प्रशासनिक कुनबा उसे बचाने के लिए एकजुट हो जाता है. इसकी ताज़ा बानगी मिलती है जयपुर के एक मामले में जिसमें ग्लोबल ग्रुप के प्रमुख आनंद सिंघल के ऊपर उनकी महिला कर्मचारी ने कार्यस्थल पर यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाया है.Anand-Singhal

पिछले माह के मध्य में सामने आये इस मामले में ग्लोबल ग्रुप के इंजीनियरिंग कॉलेज ग्लोबल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के प्रमुख आनंद सिंघल पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाते हुए पीडिता ने शिकायत दर्ज करवाई है जिसमें यौन सम्बन्ध बनाने के लिए प्रलोभन, कार्य स्थल पर उत्पीडन और प्रस्ताव अस्वीकार करने पर खामियाजा भुगत लेने की धमकी देने का आरोप लगाया है.

आनंद सिंघल देश के जाने माने कारोबारी हैं और ग्लोबल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी सोसाइटी के चेयरमैन हैं. इसके साथ ही इनका हॉस्पिटैलिटी और रियल एस्टेट के कारोबार में भी अच्छा दखल है. पिछले 27 वर्षों से विवाहित और दो पुत्रों के पिता सिंघल पर ये भी आरोप है कि उनके इस मनचले व्यवहार की वजह से पीडिता के पहले भी कई महिला कर्मचारी नौकरी छोड़ चुकी हैं. पीडिता के अनुसार सिंघल ने पीडिता को यौन सम्बन्ध बनाने के एवज में तीन करोड़ रूपए, नए बन रहे हाउसिंग सोसाइटी में एक पूरा फ्लोर या नये बन रहे शिक्षण संस्थान  में उप-कुलपति का पद देने का प्रलोभन दिया था जिसे पीडिता ने अस्वीकार कर दिया था.

अब प्रशासन ने लीपा पोती का रवैया अपनाते हुए जयपुर के सांगानेर सदर थाने में दर्ज ऍफ़आईआर में पूरी तरह से कमज़ोर धाराएं लगायी है. इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 354A और 509 लगायी गयी है जो कि जमानती धाराएं हैं. ऐसे में इस मामले में सिंघल द्वारा अपने रसूख, पैसे और पहुँच का इस्तेमाल स्पष्ट दिख रहा है. सिंघल ने इस मामले में अपनी पहुँच का इस्तेमाल करने में कोई कोर-कसर बाकी न रखते हुए मामले को दबाने की नौबत ही नहीं आने दी और ठीक से उठने ही नहीं दिया. यही वजह थी कि एफआईआर मामला शुरू होने के लगभग तीन हफ्ते बाद दर्ज हुयी.

इस मामले के बाबत पूछे जाने पर इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर और थाना प्रभारी मनोज कुमार गुप्ता ने अधिकारिक रूप से कुछ भी कहने से इनकार कर दिया और ऊपर से भारी दबाव पड़ने की बात कही. यही नहीं उन्होंने किसी भी जानकारी के लिए कमिश्नर या ऐसे ही किसी अधिकारी से मिलने के लिए कहा और किसी भी तरह की जानकारी देने में असमर्थता ज़ाहिर करते हुए पल्ला झाड लिया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.