/एक और भंवरी देवी : इंसाफ के लिए भटक रहा है भूरी देवी का गरीब परिवार..

एक और भंवरी देवी : इंसाफ के लिए भटक रहा है भूरी देवी का गरीब परिवार..

जोधपुर के डोडिया गाँव में पुलिस थाना फलौदी में फरवरी में घटी घटना पर दबंगों के दबाव के चलते लीपा पोती कर दी गयी है और पीड़ित परिवार घटना के छः महीने बाद भी इंसाफ के लिए इधर उधर भटक रहा है. 10 फरवरी 2014 को घटी इस घटना में भूरी देवी मेघवाल नाम की महिला को केरोसिन डाल कर जिंदा जला दिया था.इतना ही नहीं अपराधियों द्वारा मृतका के पति और ससुर को झूठे मुक़दमे में फंसा कर थाने में बंद भी रखा गया. 20140711_121448

सूत्रों के अनुसार मामला काफी हद तक भंवरी देवी हत्याकांड से मिलता है. घटना की  सूत्रधार झाबार सिंह कि पत्नी मानकंवर ने अपने मोबाइल से भूरीदेवी के ससुर को उसके लापता होने कि सूचना दी. सूचना पा कर जब ससुर तेजाराम ने भूरीदेवी की खोज कि तो उसकी अधजली लाश पास के जंगल में पड़ी हुयी मिली. उल्लेखनीय है कि तेजाराम के परिवार में पुत्र ओमाराम को छोड़ कर दूसरा पुत्र किरताराम, पुत्री लक्ष्मी और पत्नी तीनों ही मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं.  इस बात का फायदा उठा कर आरोपी मनोहर सिंह, कंवराज सिंह और तेजसिंह भूरीदेवी के पति और ससुर के खान में मजदूरी करने के लिए चले जाने के बाद डरा धमका कर उसका शारीरिक शोषण करते रहते थे. भेद खुलने पर ससुर तेजाराम ने कानूनी कारवाही कि धमकी दी जिसके जवाब में आरोपियों ने भूरी को जंगले में ले जाकर जिंदा जला दिया.

जांच अधिकारी किशन सिंह भाटी को नियुक्त किया गया जो कि खुद आरिपियों का नजदीकी रिश्तेदार है. भाटी ने जांच सही दिशा में ले जाने कि जगह उल्टा पीड़ित परिवार के खिलाफ कार्यवाही शुरू कर दी और भूरी के ससुर को 18 दिन और पति को 8 दिन तक जेल में रखा. इसके अलावा पीड़ित पक्ष कि किसी भी बात को सुना नहीं गया  और  भूरीदेवी के पति ओमाराम को डरा धमका कर झूठा बयान क़ुबूल करवाया गया. दबंगों कि मिलीभगत के ज़रिये झूठे साक्ष्य सामने रखते हुए आरिपियों को बचा लिया गया.

अब दलित समाज में इस केस को लेकर काफी रोष व्याप्त है और उन्होंने न्याय के लिए जगह जगह हाथ पाँव मरना फिर से शुरू कर दिया है. पिछले 46 दिनों से दलित समाज के लोग पुलिस महानिरीक्षक कार्यालय, जोधपुर के बाहर धरने पर बैठे हैं और षड़यंत्र में शामिल जब्बर सिंह, मनोहर सिंह, कंवराज सिंह और तेजसिंह और साक्ष्य मिटने वाले ओमसिंह, नारायण सिंह  से कड़ी पूछताछ कर पीडित पक्ष को न्याय दिलवाने कि मांग कर रहे हैं. इसके साथ ही पीड़ित परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और परिवार को 10 लाख का मुआवजा दिलवाने कि भी मांग कर रहे हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.