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नैनीताल में अतिक्रमण हटाने में प्रशासन निष्पक्ष क्यों नहीं..

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-चन्द्रशेखर करगेती||

नैनीताल का स्वरुप उत्तराखण्ड बनने से पूर्व जिन लोगो ने देखा था, वैसा अब नहीं रहा. राज्य बनने का सबसे बड़ा फ़ायदा उन लोगो ने उठाया जो कभी इस राज्य निर्माण की लड़ाई का हिस्सा रहे ही नहीं. नैनीताल के बिगड़ते स्वरुप पर बड़े बड़े चिंतको-विचारकों और स्वनामधन्य प्रसिद्ध पत्रकारों ने कॉलम तो बड़े-बड़े छपवाये लेकिन किसी ने भी इसे सुधारने की पहल नहीं की, नैनीताल के बिगड़ते स्वरुप पर अधिकारियों के बीच जाकर बड़े-बड़े व्याख्यान देनें वालों में वे लोग भी शामिल है, जो खुद अपने कर्मों से इस शहर की पहचान खत्म करने के काम में कभी पीछे नहीं रहे हैं , बल्कि आम आदमी से दो हाथ आगे ही रहे.nainital

प्रसाशनिक अधिकारियों और रसूखदार लोगो के नापाक गठजोड़ से जब इस शहर के मूल निवासी व नैनीताल में बाहर से आये बिल्डरों ने इस शहर नालों और गधेरों की ढालू जमींनो पर अवैध कब्जा कर अफसरों की मिलीभगत से होटल व मकान बनाने शुरू किये तो शहर का दैनिक जीवन चलाने को बाहर से आये निम्न तबके के लोगों ने भी रसूखदार और प्रभावशाली लोगों की देखा देखी जहां जगह मिली वहीं पर डेरा डाल दिया, इस प्रवृति ने नैनी झील के इस शहर का लोगो ने मिजाज तो बिगाड़ा ही साथ साथ अतिक्रमण के बढते बोझ से शहर के जीवन को चलाने वाली नैनी झील भी प्रभावित हुए बिना नहीं रही.

आखिर इस शहर के बदलते स्वरुप और दिनों दिन अपनी मौत की और बढती नैनी झील को बचाया कैसे जाय, कैसे नैनीताल को उसके पुराने स्वरुप की और लाया जाय, इसकी दिन रात चिंता करने वाले बुजुर्ग भूगोलशास्त्री प्रो० अजय रावत ने इस शहर के पुराने दिन लौटाने का बीडा उठाया, जिसका पहला कदम था शहर में गैर-कानूनी तरीके से निर्मित होने वाले अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर रोक लगवाना, और जो छोटे-बड़े निर्माण अवैध रूप से अतिक्रमण कर पूर्व में हो चुके हैं उन्हें ध्वस्त करवाना. इस काम को करवाने के लिए उन्होंने बहुत से प्रसाशनिक अधिकारियों की चिरोरी की होगी और इस शहर के अस्तित्व के लिए अवैध निर्माणों और अतिक्रमण के दुष्प्रभावों को समझाया भी होगा, लेकिन चंद कागज़ के टुकड़ों पर अपना ईमान बेचने के इस दौर में उनकी इस जनसरोकारी बात के लिए शायद ही किसी भी उच्च अधिकारी (यथा जिलाधिकारी व कुमाऊं कमिश्नर, एलडीए सचिव ) के पास समय नहीं था, उनके इस काम को कुछ गति नैनीताल बचाओं अभियान के कुछ चुनिन्दा जागरूक युवाओं ने भी दी, बहुत सी जगह पर वे स्वयं खड़े रहकर बड़े बड़े अवैध निर्माणों को झील विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को चिन्हित भी करवाते रहे, लेकिन कार्यवाही के नाम पर नतीजा सिफर ही रहा.

ऐसे में अपने धुन के धुनी प्रो० अजय रावत के सामने माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष नैनीताल और झील के हालात को लेकर जनहित याचिका प्रस्तुत करने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय भी नहीं बचता था, उन्होंने माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष जनहित याचिका प्रस्तुत कर भी दी, इस पवित्र काम के लिए जहाँ शहर के निवासियों ने उनका आभार व्यक्त करना चाहिए था, लेकिन इसके उलट वे आज खुले आम इस शहर को बर्बाद करने वाले राजनेताओं और उनके चाटुकारों के साथ मिलकर माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की अवमानना करने से भी बाज नहीं आ रहें है, उनके इस काम में वे बड़े बड़े और रसूखदार लोग परदे के पीछे से पूरा पूरा सहयोग कर रहें है जो इस शहर के बिगड़ते हालात को सीधे सीधे जिम्मेदार है. आखिर प्रो० अजय रावत की जनहित याचिका अपने लिए नहीं, बल्कि इस शहर के लोगो के लिए ही है, उनके रोजगार बचे रहे इसके लिए है, उनकी आने वाली पीढ़ी के लिए है, उनकी अपनी विरासत के लिए है कि इस शहर के अस्तित्व को आखिर बचाया कैसे जाय ?

इन सबके बीच माननीय उच्च न्यायालय ने अवैध अतिक्रमण हटाने के समबन्ध में कुमांऊ कमिश्नर को 17 जुलाई को रिपोर्ट पेश करने को कहा है, हम सभी पढ़ेगें कि वे किस प्रकार की रिपोर्ट न्यायालय में पेश करेंगे, उस रिपोर्ट में कितनी जमीनी हकीकत होगी और कितनी लीपापोती ? यह हम सब भी जानते है निचले तबके की हिम्मत गलत काम करने की तभी बढती है जब बड़े और रसूखदार लोगो का गलत काम करने के बाद भी कुछ नहीं बिगडता और यही अधिकारी होते हैं जो उनके गलत और अवैध निर्माणों को कागजों में गोलमोल कर वैध बना देते हैं. क्या ये अपनी रिपोर्ट में नैनीताल के अवैध निर्माणों की सही रिपोर्ट पेश कर पायेंगे ?

चित्र में नैनीताल का ही अधिकारियों के गठजोड़ से बने एक अजब नक्शे के भवन को दिखाया हुआ है, क्या यह निर्माण अवैध या अतिक्रमण नहीं है ? अगर है तो इसे बनाने की अनुमति किस अधिकारी ने दी ? क्या वर्तमान कमिश्नर द्वारा उस जिम्मेदार अधिकारी की गर्दन नापने के साथ-साथ अतिक्रमण कर किये गए इस निर्माण को अपने सामने ही ध्वस्त नहीं करवाना चाहिए ? चित्र में दिखाया गया भवन सिर्फ स्थिति को समझने भर के लिए है, अगर पुरे शहर में फैले पेड़ों के बीच छिपे ऐसे भवनों को सही और इमानदारी से चिन्हित किया जाय तो एक अनुमान से पुरे नैनीताल में लगभग पिछले दशक में बने सभी निर्माण ऐसे ही मिलेंगे जो प्रथम दृष्टया अवैध या नालों-गधेरों पर अतिक्रमण कर बनाये गए हैं, और जिन्हें अधिकारियों से बकायदा वैध भी बताया गया है.

लेकिन जब जब कार्यवाही की बात होती है तो कार्यवाही के नाम पर केवल निम्न तबके के लोगो के घर-दूकान उजाडकर कार्यवाही की खानापूर्ति की जाती रहती ? क्या कानून का डंडा समान रूप से इन बड़े रसूखदारों के गले तक नहीं पहुँचना चाहिए ? क्या कमिश्नर इन जैसे रसूखदारों के अवैध निर्माणों पर स्टेट्स का जिक्र अपनी 17 जुलाई को माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष पेश की जाने वाली रिपोर्ट पेश कर पायेंगे ?

अफसरों की रिपोर्ट बनती रहेंगी, रसूखदार और प्रभावशाली लोग और उनके निर्माण हमें यूँ ही तनकर खड़े मिलेंगे हर चौराहे पर पर, हर गली के मौड पर, आखिर राजनेताओं और अधिकारीयों की ही सरपरस्ती में सब कुछ संभव है ना. ये वे अवैध निर्माण और अतिक्रमण है जिन्हें जिलाधिकारी-कमिश्नर देखकर भी नहीं हटा पा रहे हैं ?

हम आप इन अखबारों और टीवी चेनलों में माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की पालना होने की खबरों को यूँ ही पढते सुनते जायेंगे, साल दर साल.

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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