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विमान हादसे के बाद दुर्घटनास्‍थल पर पहुंचीं महिला रिपोर्टर की आंखों देखी..

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कीव. यूक्रेन में मलेशियाई विमान को मिसाइल से मार गिराए जाने के बाद दुर्घटनास्‍थल पर सबसे पहले पहुंचने वाले पत्रकारों में से एक न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स की रिपोर्टर सबरीना तावेनाइज भी थीं. वह पिछले कई महीनों से रूस और यूक्रेन की सीमा पर चल रही लड़ाई की रिपोर्टिंग कर रही हैं. विमान दुर्घटना पर उनकी आंखों देखी : A general view shows the site of a Malaysia Airlines Boeing 777 plane crash in the settlement of Grabovo in the Donetsk region

”मलेशियाई विमान MH17 का मलबा कई किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ था. चारों तरफ लाशें बिखरी हुई थीं. हालांकि, शवों की स्थिति देखकर लगता था कि विमान को कंट्रोल तरीके से लैंडिंग कराने की कोशिश हुई थी.

दुर्घटनास्‍थल का माहौल दिल दहलाने वाला था. काले रंग का स्‍वेटर पहनी हुई एक महिला के चेहरे से खून बह रहा था और उसका बायां हाथ ऊपर उठा हुआ था. ऐसा लग रहा था मानो वह किसी को इशारा कर रही हो. एक और महिला थी जिसके शरीर पर ब्रा के अलावा कुछ नहीं बचा था. उसका शरीर क्षत-विक्षत हो चुका था. कई पीडि़त अपने सीट बेल्‍ट से बंधे हुए थे, कई विमान के टुकड़ों में फंसे हुए थे. एक यात्री की कमर पर पैंट नहीं थी. वह कमर के बल जमीन पर पड़ा हुआ था. उसका दायां हाथ उसकी पेट पर था. ऐसा लगता था मानो वह विश्राम कर रहा हो. वहां ब्‍लू शॉर्ट्स और नाइकी के स्‍नीकर्स में एक युवा यात्री पड़ा हुआ था जिसने एक हाथ में अपना आई-फोन पकड़ा हुआ था.

इन सबके बीच 10 साल के एक बच्‍चे का शव दिखा. उसने लाल रंग की टीशर्ट पहन रखी थी जिस पर लिखा था, ‘डोंट पैनिक (घबराइए मत).’

मलबा खेतों में और सड़क पर फैला हुआ था. राहत और बचाव काम में लगे लोग उन पेड़ों की टहनियों पर सफेद कपड़े बांध रहे थे जहां नजदीक में शव पड़े हुए थे. विद्रोहियों ने पत्रकारों से कहा कि वे दुर्घटनास्‍थल और लाशों की तस्‍वीर लें. दुर्घटनास्‍थल के आसपास कोई मकान नहीं था.

रूस के लाइफन्‍यूज के कुछ लोग दुर्घटनास्‍थल की तस्‍वीरें ले रहे थे और वीडियो फुटेज बना रहे थे. मौके पर मौजूद एक और पत्रकार नोआ स्‍नाइडर ने ट्विटर पर लिखा कि यहां का माहौल इतना वीभत्‍स है कि इसकी तस्‍वीरें पोस्‍ट नहीं की जा सकती हैं.”

(भास्कर)

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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