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क्या यह अपराध नहीं..

300_1733895-भावना पाठक ||

आपकी नज़र में अपराध क्या है ? हत्या , चोरी- डकैती, अपहरण, बलात्कार ……ये तो संगीन जुर्म हैं ही लेकिन इन सबके अलावा देश के युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करना भी एक बड़ा अपराध है। युवाओं के भविष्य से हुए इस खिलवाड़ का ही एक नाम है व्यापम घोटाला जिसकी वजह से मध्य प्रदेश आजकल सुर्ख़ियों में है और शिवराज सरकार सवालों के घेरे में। यह अपने आप में एकलौता घोटाला हो ऐसा नहीं है। खबर है बिहार में भी जाली प्रमाणपत्र वाले १००० शिक्षकों की नियुक्ति की गयी है और ऐसे फ़र्ज़ी शिक्षकों की संख्या और भी बढ़ सकती है। बिहार सरकार ने पाया की प्राइमरी स्तर पर जिन १.५० लाख संविदा शिक्षकों की नियुक्ति की गयी थी उनमें से जब ५० हज़ार शिक्षकों की जांच की गयी तो २० हज़ार संविदा शिक्षकों की डिग्रियां और सर्टिफिकेट फ़र्ज़ी थे। इन शिक्षकों की नियुक्ति में अधिकारियों और मुखियाओं ने हर शिक्षक से १. ५० से २ लाख रूपए घूंस लिए थे। कभी पी. एम. टी. का पेपर लीक हो जाता है तो कभी राज्यों की लोक सेवा आयोग का। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार राजस्थान में आए दिन जो विभिन्न परीक्षाओं के पर्चे लीक हो रहे हैं उसके पीछे पूरा एक गिरोह है पर ये कोई कुख्यात अपराधियों का गिरोह नहीं बल्कि पढ़े लिखे प्रोफेसरों , शिक्षकों और विश्विद्यालयों के कर्मचारियों का गिरोह है जो अंधाधुंध अवैध कमाई में लिप्त है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक हर जगह धांधले-बाजी चल रही है यानि पूरे कुँए में ही भांग पड़ी है।

आजकल हर माँ-बाप अपने बच्चे को बेहतर से बेहतर शिक्षा देना चाहते है ताकि वो आने वाले समय के लिए खुद को तैयार कर अपने लिए रोज़गार के बेहतर साधन तलाश सकें। आजकल घरों में काम करने वाली बाइयां, रिक्शाचालक, ऑटोचालक जैसे लोग भी अधिकांशतः अपने बच्चों को सरकारी स्कूल न भेज कर यथाशक्ति अच्छे से अच्छे अंग्रेजी स्कूलों में भेजते हैं हैं कारण सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती। सरकारी स्कूल में कहीं स्कूल के नाम पर पेड़ों के नीचे क्लास लग रही है तो कहीं पढ़ाने वाला शिक्षक ही नदारद है तो कहीं स्कूल भवन को किसी ने अपना घर बना रखा है। कई बार तो शिक्षक बच्चों से अपने घर तक का काम करवाते हैं और उसके बदले उन्हें परीक्षा में ज़ियादा नंबर देते हैं। कई गावों में तो स्कूलों की हालत ऐसी है की मास्टर जी बस हाजरी लगाने आते है और स्कूल के टाइम पर अपना साइड बिज़नेस चलाते हैं। उन्हें स्कूल के बच्चों के भविष्य के बजाय अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य की ज़ियादा चिंता रहती है। इतना ही नहीं बल्कि इससे भी बढ़-चढ़कर अनियमितताएं होती हैं। मनरेगा की तरह सरकारी स्कूल के शिक्षक भी अपनी जगह थोड़े पैसों पर किसी बेरोजगार युवक को पढ़ाने के काम में लगा देते हैं और फोकट में पूरी तनखाह हड़पते रहते हैं और पूरे समय कोई और धंधा करते हैं। ऐसा नहीं कि ऊपर के अधिकारियों को इन अनियमित्ताओं की जानकारियां न हो पर जब उनकी भी बैठे-बैठाए अतिरिक्त कमाई होती है तो इस ज़माने में आती लक्ष्मी को भला कौन ठोकर मारेगा।

आज शिक्षा का अर्थ ही बदल गया है। शिक्षा माने अच्छी नौकरी पाने का जरिया। इस अंधी दौड़ में हर माँ बाप चाहते हैं की उनका बच्चा महंगी से महंगी शिक्षा प्राप्त कर अच्छे से अच्छे पैकेज वाली नौकरी पाए। समाज में व्याप्त इस मानसिकता का पूरा लाभ उठाते हुए शिक्षा को सबसे ज़्यादा फलता-फूलता व्यवसाय बना दिया गया है। आज इंजीनियरिंग, कॉमर्स, मेडिकल , मैनेजमेंट क्षेत्र में प्राइवेट कॉलेजों की बाढ़ सी आ गयी है। एक से बढ़कर १००% प्लेसमेंट के दावे किये जाते हैं। इन कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए लालायित छात्रों के बलबूते देश भर में तमाम कोचिंग सेंटर फलफूल रहे हैं। छोटे बच्चों के प्ले-स्कूल, नर्सरी स्कूल भी बहुत महंगे हैं। ज़रा सोचिये तो माँ-बाप किस तरह अपना पेट काटकर, अपने सपनों को तिलांजलि देकर, अपनी ज़रूरतों को कम करकर के बच्चों को बेहतर से बेहतर स्कूल में पढ़ाते हैं। वो स्कूल में अच्छे नम्बर लाये इसके लिए कोचिंग भेजते हैं ताकि आगे उसे अच्छा कॉलेज मिल सके। उनके अच्छे खाने पीने का इंतज़ाम करते हैं , उनकी फरमाइशें पूरी करते हैं, गरज यह है कि अच्छे परफॉर्मेंस के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसके बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बच्चों को और भी महंगे कोचिंग इंस्टिट्यूट में भेजना पड़ता है। अब वर्षों की इतनी तैयारी के बाद जब उन्हें ये पता चलता है की व्यापम जैसे घोटालों के ज़रिये अपात्र लोग पदों पे काबिज हो जाते हैं तो उनपर क्या बीतती है ? मेहनत करके प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले युवाओं के साथ साथ उनके माँ-बाप की उम्मीदों पर भी पानी फिर जाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है – हम थ्री एस के दम पर ही देश को आगे ले जा सकते हैं – स्किल, स्केल और स्पीड। इस थ्री एस का आधार शिक्षा है। जब हमारी नींव ही कमज़ोर होगी तो उसपर बनी इमारत विश्व प्रतिस्पर्धा में कितनी देर तक टिकी रह सकती है। शायद इसी कारण से एशियाई कंपनियां विश्व बाजार में आज भी अपनी वो जगह नहीं बना पायीं है जो पश्चिमी देशों की कम्पनिओं को हांसिल है।

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