/शुद्ध संस्कृत में गाली..

शुद्ध संस्कृत में गाली..

-नचिकेता देसाई||
काशी पंडितों की नगरी है. यहाँ की संकरी भूल भुलैया जैसी हर गली में कोई न कोई पंडित टकरा ही जाएगा. कोई संगीत का पंडित, कोई संस्कृत का पंडित तो कोई शेर-ओ-शायरी का पंडित. लेकिन शुद्ध संस्कृत में कर्णप्रिय बनारसी गालियां देने वाला केवल एक ही पंडित है. उनकी विशेषता है कि वे जब संस्कृत में गालियाँ देते हैं तो सामने वाला उसे अपनी तारीफ समझता है. मजे की बात तो यह है कि महाशय लेखक भी हैं और इनके भारी भरकम संस्कृत अपशब्दों की पाठक भूरी भूरी प्रशंसा भी करते हैं. मुझे चूंकि इन अपशब्दों के केवल भोजपुरी पर्याय मालूम है इसलिए चाहकर भी यहाँ महाबंदोपाध्याय विद्वान की समृद्ध भाषा के उदाहरण देने में अक्षम हूँ.Varanasi

महामहिम राष्ट्रपति जी से इनकी शक्ल, कद-काठी इतनी तो मिलती है कि भूल से अगर ये कहीं इंडिया गेट के पास मटर गश्ती करते दिख जाएं तो राजधानी के सुरक्षा संगठन में भारी हडकंप मच जाए. दोनों में यूं तो फर्क सिर्फ उतना ही है जितना एक मुखोपाध्याय और बंदोपाध्याय में होता है. महामहिम मुखोपाध्याय हैं तो हमारे संस्कृत छंदों के विद्वान बंदोपाध्याय.

बंदोपाध्याय काशी के उन बंगाली ब्राह्मण परिवारों में से हैं जो सैंकड़ो साल से गंगा किनारे बस गए हैं. यहाँ उनकी अच्छी खासी जजमानी है. स्थानिक बंगाली परिवारों में इनका पूजनीय स्थान है. हर धार्मिक क्रिया कर्म में इनकी सलाह लेना आवश्यक समझा जाता है. किसी बालक का यज्ञोपवित हो, विवाह हो या परिवार में किसी की मृत्यु हो गई हो तो आत्मजनों में सूचना तो शुद्ध संस्कृत मिश्रित बंगला में ही दी जानी चाहिए. अब जब बनारस में बसे ज्यादातर बंगाली भोजपुरी को ही अपनी मातृभाषा मानने लगे हों तो भला शुद्ध संस्कृत में लिखना किसे आए. मोहल्ले के एकमात्र संस्कृत विद्वान बंदोपाध्याय जी की चिरौरी करनी पड़े.

पहले तो बंदोपाध्याय जी ऐसे चिरौरिबाज को संस्कृत में प्रेम से खूब गरियाएं और फिर एक राउंड चाय और दो बीड़ा पान ग्रहण करने के बाद प्रसंगोचित निमंत्रण पत्रिका का आलेख लिख दें. जजमान प्रसन्नचित्त हो कर विदा हों.

उनके पास शुद्ध संस्कृत में गालियों का भण्डार है इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें ठेठ बनारसी गाली देना नहीं आता. मोहल्ले के लुच्चे लफंगों के अलावा छुटभैये नेता और परेता को वे भोजपुरी में ही जम के गरियाते हैं. ऐसी गाली खाने वाला अपने आप को धन्य महसूस करता है.

बंदोपाध्याय महोदय विद्यार्थी काल में कट्टर साम्यवादी थे. जनसंघी उनसे बच कर चलते थे. आज भी बच कर चलते हैं.

व्यंग्य और हास्य के धनी तथा काशी की कला, संस्कृति, धर्म आध्यात्म विषयों पर उनकी पकड़ की वजह से काशी आने वाले पत्रकार, फिल्म कर्मी उन्हें ढूंढ निकालते. बंदोपाध्याय जी उनको अपना ज्ञान देते.

उनकी ख्याती उड़ते उड़ते सरहद पार भी पहुंची. उनका पता लगाने ढाका से कलकत्ता फ़ोन गया. दीदी ने बेगम को उनका पता बताया. बेगम ने बनारस आने की योजना बनायी. आखिरी समय किसी अत्यावश्यक कारणों से यात्रा मुल्तवी रखनी पड़ी. बात फैल गई. बंग समाज में बंदोपाध्याय का रुतबा और भी बढ़ गया. बंग समाज ने बंदोपाध्याय महोदय के सार्वजनिक सम्मान का भव्य आयोजन किया. संयोग से मैं भी उस आयोजन में उपस्थित था. उनके सम्मान में जो प्रशस्तिपत्र पढ़ा गया उसे सुन कर मैं अचम्भे में पड गया. वह बंगला कम संस्कृत ज्यादा लग रहा था.

“का गुरु, इतना बढ़िया बंगला के लिखा?” मैंने आखिर उनसे पूछ ही लिया.

“बकलोल, हम ही लिख देहली. और के लिखी”, महाबंदोपाध्याय मुंह में पान घुलाते हुए बोले.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.