कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे [email protected] पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

हर रोज हजारों बलात्कार इज्जत की चादर में लपेट कर दफना दिए जाते हैं..

0
Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’||

हमारे देश में स्त्रियों के साथ बलात्कार तो रोज होते हैं, एकाध नहीं हजारों की संख्या में किये जाते हैं, लेकिन कुछ एक बलात्कार की घटनाएं किन्हीं अपरिहार्य कारणों और हालातों में सार्वजनिक हो जाती हैं। जिनके मीडिया के मार्फ़त सामने आ जाने पर औरतों, मर्दोँ और मीडिया द्वारा वहशी बलात्कारी मर्दों को गाली देने और सरकार को कोसने का सिलसिला शुरू हो जाता है। लेकिन हमारा अनुभव साक्षी है की इन बातों से न तो कुछ हासिल हुआ, न हो रहा और न होगा। क्योंकि हम इस रोग को ठीक करने के बारे में ईमानदारी से विचार ही नहीं करना चाहते!rape

यदि साहस करके कड़वा सच कहा जाये तो सबसे गंभीर और सोचने वाली बात ये है कि हम बलात्कार को हजारों सालों से पोषित करते रहे हैं। अत: हमें बलात्कार के प्रसंग में तकनीकी तौर पर नहीं, बल्कि निरपेक्ष भाव से बिना पूर्वाग्रह के एक पुरुष, पति या शासक बनकर नहीं, बल्कि एक पिता, एक माता, एक भाई और सबसे बढ़कर एक मानव बनकर विचार करना होगा कि किन-किन कारणों से आदिकाल से हम एक स्त्री को बलात्कार और मर्द की भोग की वस्तु मात्र ही मानते रहे हैं और खुद स्त्री को भी इसी सोच की पैदा करते रहे हैं या वो पैदा होती रही या ऐसी बनाई जाती रही है। हमें जानना होगा कि हमारी सोच और हमारे अवचेतन मन को रुग्ण करने वाले वे कौनसे ऐसे कारण हैं, जो आज भी बदस्तूर और सरेआम जारी हैं! जिन्हे देश की बहुसंख्यक आबादी न मात्र मानती ही है, बल्कि उन्हें सार्वजनिक रूप से महिमा मंडित भी करती रहती है।

जब तक बलात्कार की इस मूल जड़ को सामूहिक रूप से नहीं काटा जायेगा, हम सभी कभी न कभी एक दूसरे की बहन-बेटियों को अपनी दमित और कुत्सित कामनाओं का यों ही शिकार बनाते रहेंगे और फिर सोशल मीडिया सहित हम सर्वत्र, हर मंच से गरियाते रहने का निरर्थक नाटक भी करते रहेंगे।

यदि हम में सच कहने की हिम्मत है तो हम सच कहें और देश की आधी आबादी को गुलाम मानने, गुलाम बनाये रखने, उसको बलात्कार तथा भोग की वस्तु मात्र बनी रहने देने और नारी को गुलाम समझने की शिक्षा देने वाले हमारे कथित धर्म ग्रंथों, कथित सांस्कृतिक संस्कारों और कथित सामाजिक (कु) शिक्षाओं के वाहकों को हमें साहस पूर्वक ध्वस्त करना होगा। क्या हम ऐसा करने को तैयार हैं? शायद नहीं!

अभी तक तो ऐसा करने की कोई टिमटिमाती आशा की किरण भी नहीं दिख रही। लेकिन जिस दिन हम ऐसा कर पाये उसके बाद भी हमें हजारों साल पुरानी इस बीमारी के खात्में का अगले कोई पचास सौ साल बाद कुछ सांकेतिक असर दिखेगा। अन्यथा तो नाटक करते रहें कुछ नहीं होने वाला। ये धर्म और संस्कृति जनित मानसिक बीमारी सख्त कानून बनाने या मर्दों या केंद्र सरकार या राज्य सरकारों को कोसने या गाली देने से नहीं मिटने वाली!

यदि हममें हिम्मत है तो इस दिशा में चिंगारी जलाएं करें, अन्यथा घड़ियाली आंसू बहाने से कुछ नहीं होगा। बलात्कार की जो घटनाएं सामने आ रही हैं, वे बलात्कार के कड़वे सच का संकेत मात्र हैं। सच तो ये है की हर रोज हजारों बलात्कार इज्जत की चादर में लपेट कर दफना दिए जाते हैं!

Facebook Comments
Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
Share.

About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

%d bloggers like this: