/सत्ता हमेशा कलाकार से डरती है..

सत्ता हमेशा कलाकार से डरती है..

-मंजुल भारद्वाज||

सत्ता हमेशा कलाकार से डरती है चाहे वो सत्ता तानाशाह की हो या लोकतान्त्रिक व्यस्था वाली हो . तलवारों , तोपों या एटम बम का मुकाबला ये सत्ता कर सकती है पर कलाकार , रचनाकार , नाटककार , चित्रकार या सृजनात्मक कौशल से लबरेज़ व्यक्तित्व का नहीं . क्योंकि कलाकार मूलतः विद्रोही होता है , क्रांतिकारी होता है और सबसे अहम बात यह है कि उसकी कृति का जनमानस पर अद्भुत प्रभाव होता है .इसलिए “कलाकार” को काटा या सत्ता के पैरों से रौंदा नहीं जा सकता . सत्ता ने कलाकार से निपटने के लिए उसकी प्रखर बुद्धि ,चेतना और गजब के आत्मविश्वास की पहचान कर उसके अन्दर के भोगी व्यक्तित्व को शह , लोभ , लालच और प्रश्रय देकर उसे राजाश्रित बनाया और सबसे बड़े षड्यंत्र के तहत सदियों से उसके समयबद्ध कर्म करने की क्षमता पर प्रहार किया और जुमला चलाया “अरे भाई ये क्रिएटिव काम है” और क्रिएटिव काम समयबद्ध नहीं हो सकता …और क्रिएटिव कर्म का समय निर्धारण नहीं हो सकता ..पता नहीं कब पूरा हो …और मज़े की बात है की सत्ता के इस षड्यंत्र को “कलाकार वर्ग” समझ ही नहीं पाया और ऐसा शिकार हुआ है की बड़े शान से इस जुमले को बहुत शान से दोहराता है “अरे भाई ये क्रिएटिव काम है” ..और इस जुमले को सुनकर , बोलकर आनन्दित और आह्लादित होता है बिना किसी तरह का विचार किये ?Underground.svg

कलाकार वर्ग एक बार भी विचार नहीं करता या अपने आप से प्रश्न नहीं पूछता कि क्या कला या सृजन का समय से पहले या समय से अभियक्त होना आवश्यक नहीं है ! जो अपनी कला से समय को ना बाँध पाए वो कलाकार कैसा ? सदियों से पढने ,पढ़ाने के पाठ्यक्रम की पुस्तकों से लेकर आर्ट गैलेरी तक में किस्से गुप्तगू मशहूर है “अरे भाई ये क्रिएटिव काम है” और क्रिएटिव कर्म का समय निर्धारण नहीं हो सकता .!

सत्ता वर्ग की ये साज़िश कलाकारों के डीएनए में घुस गयी है कि जो महा आलसी हो वो कलाकार , आकार , वेशभूषा से सामान्य ना दीखे वो कलाकार , जिसका चेहरा और आँखें बालों से बेतरतीब ढकी हों जो समयबद्ध सृजन ना करे ,जीवन में समय का अनुपालन ना करे वो कलाकार ! सत्ता के लोलुपों , मुनाफाखोरों ने उसको ऐसा बनाया है और ऐसा ढांचा खड़ा किया है , ऐसी व्यूह रचना रची है कलाकारों के इर्द गिर्द की उसके बाहर वो देख ही नहीं पाते जैसे कलाकृति को बोली लगाकर महंगा कर देना ,जनता से कटी और विशेष वर्ग के अनुकूल प्रदर्शनी स्थल या आर्ट गैलरी में प्रदर्शन , आम जनता को आर्ट की क्या समझ यानि पूरा मामला विशेष होने का और विशेष बनने का हो जाता है और उपर से सत्ता और बाज़ार की मेहरबानियाँ जिसके अहसान और बोझ से “कलाकार वर्ग” ताउम्र निकल ही नहीं पाता . जिंदगी के शोषण ,तफावत , बगावत , विद्रोह की आवाज़ , न्याय की पुकार , हक और बराबरी की चीख अपने ही कैनवास के दायरे में कैद हो जाती हैं शोषण के प्रकार और दमन के धब्बे , अदृस्य आकार में निर्जीव , मुर्दे की भांति टंगे रहते हैं और घोड़े या महिला के अंग प्रत्यंग , उसका रंग रूप . आकार और उसका वक्षस्थल , यानि सारी भोग्य सामग्री सुन्दरता ,अस्थेटिक, क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर कैनवास पर उभर आती है और नहीं उभरती है कैनवास पर वो है “कला” !

ज़रा ठहर कर “कलाकार” विचार करें की उनकी कृति को कौन खरीदता है और वो अमीर वर्ग उस कृति का क्या करता है उसे कला का सम्मान या दर्जा देता है या रंग रोगन की वस्तु समझ कर अपने गलीचे के उपर दीवार पर टांग देता है या उसके जीवन से उसका कोई सम्बन्ध होता है ?

कला जो जीवन से कटी हो वो कला नहीं होती ! सत्ता और बाज़ार के इस षड्यंत्र से “कलाकार वर्ग” को निकलने की ज़रूरत है और अपनी कला को जीवन और उसके समग्र अहम् पहलुओं से जोड़ने की आवश्यकता है . सबसे बड़ी बात समयबद्ध होने की ज़रूरत है . किसी भी कलाकार की आत्मकथा पढने के बाद एक बात उभर कर सामने आती है खुबसूरत महिलाओं का भोग उसने कैसे किया और महंगी शराब का लुत्फ़ कैसे उठाया और उस आत्मकथा से गायब होता है कला और उसको साधने का हुनर , शिल्प , तप और समयबद्ध सृजन प्रतिबद्धता !

अमीर वर्ग साल में ‘किसी कलाकार’ की कितनी कृति खरीदता है ? चूँकि खरीददार सीमित है इसलिए कलाकार का उत्साह समयबद्ध ‘कृति’ के सृजन को नकारता है .कलाकार को ‘समयबद्ध’ होकर जीवन को बेहतर बनाने वाली कलाकृति का सृजन करने के लिए सत्ता के षड्यंत्रों से बाहर निकलने की ज़रूरत है . अपनी राजनैतिक भूमिका के सक्रिय निर्वहन की प्रतिबद्धता का समय आवाज़ दे रहा है हर कलाकार और रचनाकार को . इस चेतना की आवाज़ को सुनने का हुनर हर कलाकार को सीखना है और जन मानस की चेतना को जागृत कर उसे शोषण मुक्त होने के लिए उत्प्रेरित करने वाली कलाकृतियों का समयबद्ध सृजन करना है !

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.