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खेल खेल में साइबर क्राइम की ओर..

By   /  July 23, 2014  /  1 Comment

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Cyber-Crime1भावना पाठक।।
इंदौर से लेकर रतलाम, नीमच और मन्दसौर की लडकियां ख़ौफ़ज़दा हैं। डरती हैं कि कहीं फिर उसका फोन न आ जाए, पता नहीं अब वो कैसा मैसेज भेजेगा ? लड़के उससे रात-रात भर मीठी-मीठी बातें करते हैं। इसके लिए उसके मोबाइल में बैलेंस तक डलवाते हैं। पड़ गए न सोच में आप कि आखिर वह है कौन जिससे लडकियां डरती हैं और लड़के उससे बात करने के लिए मरते हैं। चलिए जान लीजिये की वह कोई और नहीं बल्कि झाबुआ का एक १७ साल का ११ वीं में पढ़ने वाला छात्र है जो मज़े लेने के लिए लड़कियों को डरावने एस.एम.एस. करता था और फ़ोन करके डराता था। इतना ही नहीं बल्कि वो लड़की की आवाज़ में लड़कों से घंटों बातें करता है और उन लड़कों से अपने फोन पर बैलेंस डलवाकर उससे लड़कियों को डराया करता था। जब वी केयर फॉर यू में उसकी शिकायत की गयी तब यह चौका देने वाला मामला खुला। पूछने पर उसने बताया की वह घर पर अकेला रहता है, टाइमपास करने के लिए ऐसी खुराफात करता रहता था। इस छात्र के लिए यह एक खेल भर था। अगर उसे पता होता की ऐसा करना अपराध है और इसके लिए उसे सजा मिल सकती है तो शायद वो ऐसा नहीं करता। यह घटना तो एक उदाहरण मात्र है, इसी तरह की ढेरों शिकायतें वी केयर फॉर यू में आती हैं।

आज किशोरों और युवाओं पर सोशल साइट्स का जादू सर चढ़कर बोलता है। इस बात के लिए उनमें होड़ सी मची रहती है की मार्केट में कौन सा नया एप्स आया है , कौन ज़्यादा अच्छा है , किसकी स्पीड तेज़ है, कौन सा कालिंग और मेसेजिंग एप्स ज़्यादा यूजर फ्रेंडली है आदि और इस क्षेत्र में महारत वो स्वयं-शिक्षा के ज़रिये हांसिल कर लेते हैं। हाल ही में टी.सी.एस. द्वारा इंदौर में कराए गए एक सर्वे से पता चला कि यहां १२-१८ वर्ष के किशोर १८-२० घंटे स्मार्टफोन के ज़रिये ऑनलाइन रहते हैं और ये फेसबुक जैसी सोशल -साइट्स पर ज़्यादा सक्रिय रहते हैं। महानगरों की अपेक्षा मध्यम दर्ज़े के शहरों के युवा इंटरनेट और सोशल साइट्स के इस्तेमाल में आगे निकल गए हैं। अब तो स्थिति यह हो गयी है कि गृहणियां भी घर के लोगों से इंटरनेट और सोशल साइट्स के बारे में सीख कर खाली समय में इस पर सक्रिय रहती हैं। इन महिलाओं के बीच ऑनलाइन शॉपिंग का शौक भी बहुत बढ़ता जा रहा है। किटी पार्टियों की चर्चाओं में भी आजकल सोशल साइट्स और ऑनलाइन परचेसिंग की चर्चा छायी रहती है। ज़्यादा से ज़यादा लोग इंटरनेट सैवी होते जा रहे हैं। जो लोग इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं उन्हें ओल्ड फैशन माना जाने लगा है।

जहां एक तरफ ऑनलाइन चैटिंग, ऑनलाइन शॉपिंग, इ-बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड से भुगतान, सोशल साइट्स पर सक्रियता तेज़ी से बढ़ रही है उसी रफ़्तार से साइबर क्राइम भी तेज़ी से बढे हैं। फ़ोन पर लड़कियों और महिलाओं को भेजे जाने वाले अश्लील वीडिओ और एस. एम. एस. की शिकायतें हर शहर में हो रही हैं। फेसबुक जैसी सोशल साइट्स का इस्तेमाल कई सिरफिरे किसी को नीचा दिखाने के लिए, उससे बदला लेने के लिए कर रहे हैं तो कई यूँ ही किसी के मज़े लेने के लिए। हाल ही मध्य प्रदेश के आगर ज़िले के एक १२ वर्ष के छात्र ने अपनी दोस्त का फेक अकाउंट बनाकर फेसबुक में उसकी अश्लील फोटो अपलोड कर दी जिसमें चेहरा तो उस लड़की का था लेकिन शरीर पोर्न साइट से लिया गया था। इस फेक अकाउंट को बंद कराने के लिए लड़की के माता-पिता को क्राइम सेल के दफ्तर से लेकर ऊँचे अधिकारियों के महीनो चक्कर लगाने पड़े लेकिन सफलता नहीं मिली। इस बीच उस लड़की के इस फेसबुक अकाउंट के बारे में सारे रिश्तेदारों और परिचितों को पता लग चुका था जिसके चलते पूरा परिवार भारी मानसिक प्रताड़ना का शिकार हुआ। नाबालिग होने का लाभ पाकर आरोपी बच गया। यह घटना बताती है कि साइबर क्राइम से निपटने में हमारी पुलिस व्यवस्था अभी पूरी तरह से सक्षम नहीं है। विधानसभा में जब साइबर क्राइम का मुद्दा उठा तो पता चला की इंदौर और भोपाल साइबर क्राइम के मामले में देश के टॉप टेन शहरों में आ गए हैं।

बढ़ रहे साइबर अपराधों को सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला मानकर नहीं चला जा सकता है। कानून के साथ साथ हमें भी सजग होना होगा। वजह यह है कि साइबर क्राइम के अपराधियों में बड़ी संख्या ऐसे नाबालिग किशोरों और युवाओं की होती है जिन्हे पता ही नहीं होता कि वे कोई अपराध कर रहे हैं। पकडे जाने पर पुलिस भी उन्हें डांट-डपटकर या समझा-बुझा कर छोड़ देती है। सही अर्थों में यह मामला मीडिया जागरूकता का है जिसे आज दुनियां भर में मीडिया लिटरेसी के नाम से जाना जाता है। मीडिया लिटरेसी के क्षेत्र में सरकारी प्रयासों के साथ-साथ, गैर सरकारी प्रयासों जैसे- एन. जी. ओ. मीडिया क्लब और इसी प्रकार के अन्य संगठनो की बड़ी भूमिका है।

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  • Published: 3 years ago on July 23, 2014
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  • Last Modified: July 23, 2014 @ 11:36 pm
  • Filed Under: अपराध

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. टेक्नोलॉजी के अपने लाभ है व अपने नुक्सान , अब उसका उपयोग करने वाले पर निर्भर है , जरुरत अब सभी को सतर्क रहने की है

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