/साठ दिन बीते नहीं और उत्तराखंड में मोदी लहर की हवा निकली..

साठ दिन बीते नहीं और उत्तराखंड में मोदी लहर की हवा निकली..

लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तराखंड में कांग्रेस को 5-0 से क्लीन स्वीप कर केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद माना जा रहा था कि तीन सीटों के उपचुनाव में कांग्रेस को कड़ी टक्कर मिलेगी.

लेकिन कांग्रेस ने तीनों सीट पर भारी अंतर से जीत दर्ज कर मोदी लहर की हवा निकाल दी है.harish rawat

धारचूला से सीएम हरीश रावत करीब 20 हजार वोटों से जीते जबकि डोईवाला से हीरा सिंह बिष्ट और सोमश्वर से रेखा आर्या ने जीत दर्ज कर कांग्रेस को 3-0 से जीत दिलाई है.

लोकसभा चुनाव में 5-0 से क्लीन स्वीप की हार झेलने के बाद उत्तराखंड कांग्रेस ने जोरदार वापसी करते हुए विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी को 3-0 से पटखनी दे उत्तराखंड में अपनी सरकार को और मजबूत कर लिया है.

नई राजनीतिक जमीन तैयार

तीन विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने उत्तराखंड में नई राजनीतिक जमीन तैयार ‌कर दी है. इस जीत के साथ 70 विधायकों की उत्तराखंड विधानसभा में कांग्रेस के अब 35 विधायक हो गए है.

बहुमत के लिए कांग्रेस को 36 विधायक चाहिए जो एक मनोनीत सदस्य इसकी पूर्ति कर रहा है.

इस तरह उत्तराखंड में अब कांग्रेस सरकार को कोई खतरा नहीं है. इसके अलावा कांग्रेस के सहयोगी 7 विधायक समर्थन दे रहे हैं.

लोकसभा चुनाव के बाद पहला चुनाव

लोकसभा चुनाव के करीब ढाई महीने बाद किसी राज्य में चुनाव हुए हैं. इन नतीजों की समीक्षा न सिर्फ प्रदेश में होगी बल्कि कांग्रेस-भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी नजर गड़ाए थे.

इस नतीजों से पहले तीन में अभी तक दो सीटें डोईवाला और सोमेश्वर भाजपा और धारचूला कांग्रेस के पास थी.

लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की दोनों सीटें खाली हुई थीं और मुख्यमंत्री हरीश रावत ने धारचूला खाली कराई थी.

मजबूत हुए हरीश रावत

अब कांग्रेस ने धारचूला के साथ अन्य दोनों सीटें भी जीत ली हैं. इससे साफ है कि न सिर्फ प्रदेश में बल्कि देश में कांग्रेस इसे मोदी खिलाफ जनता की नाराजगी के तौर पर पेश हुई है.

नतीजे कांग्रेस के पक्ष में होने का सीधा फायदा मुख्यमंत्री हरीश रावत को मिला. तीनों सीटें जीतने पर प्रदेश में कांग्रेस विधायकों की संख्या 35 हो जाएगी जो बहुमत से सिर्फ एक कम है. ऐसे नतीजे हरीश रावत का राजनैतिक कद भी बढ़ाएंगे.

कांग्रेस के विधायकों की संख्या बढ़ने और हरीश रावत का राजनैतिक महत्व बढ़ने पर मंत्रिमंडल में फेरबदल करा सकता है.

कांग्रेस कतई नहीं चाहेगी कि पर्याप्त संख्या बल होने के बाद भी वह सहयोगियों को उतना ही महत्व दे. हालांकि सतपाल महाराज का डर कांग्रेस को खुलकर ऐसा करने से रोकेगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.