/झुंझुनू के कण-कण में अंकित है रणबांकुरों की शौर्यगाथा..

झुंझुनू के कण-कण में अंकित है रणबांकुरों की शौर्यगाथा..

शुरा निपजे झुंझुनू, लिया कफन का साथ .
रण-भूमि का लाडला, प्राण हथेली हाथ ..

-रमेश सर्राफ धमोरा||

उक्त कहावत को चरितार्थ किया है, झुंझुनू जिले के अमर सपूतों ने. इस वीर भूमि के रणबांकुरों ने जहां स्वतंत्रता पूर्व के आन्दोलनो में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया वहीं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की लड़ाइयों में भी इस धरती की माटी में जन्मे सेनानी देश की धरोहर साबित हुए हैं. यहां की धरती ने सदियों से जन्म लेते रहे सपूतों के दिलों में देशभक्ति की भावना को प्रवाहित किया हैं. शहादत राजस्थान की परम्परा है. यहां गांव-गांव में लोकदेवताओं की तरह पूजे जाने वाले शहीदों के स्मारक इस परम्परा के प्रतीक हैं. 15 साल पहले करगिल तो हमने जीत लिया, लेकिन शहीदों के परिवारों के सामने समस्याओं के कई करगिल हैं. जिन पर उन्हें जीत दर्ज करनी हैं.KARGIL SAHID PARK-1

इस जिले के वीरों ने बहादुरी का जो इतिहास रचा है उसी का परिणाम है कि भारतीय सैन्य बल में उच्च पदों पर सम्पूर्ण राजस्थान की ओर से झुंझुनू का ही वर्चस्व रहा है. वास्तव में यहां की धरती को यह वरदान सा प्राप्त होना प्रतित होता हैं कि इस पर राष्ट्रभक्ति के कीर्तिमान स्थापित करने वाले लाडेसर ही जन्म लेते हैं. चाहे 1948 का कबायली हमला हो या 1962 का भारत चीन युद्ध, चाहे 1965 व 1971 का भारत-पाक युद्ध यहां के वीरों ने मातृभमि की रक्षा हेतू सदैव अपना जीवन बलिदान किया हैं. जल,थल व वायु तीनों सेनाओं की आन के लिये यहां के नौजवान सैनिकों के उत्सर्ग को राष्ट्र कभी भुला नही सकता हैं.

इस क्षेत्र के सैनिकों ने भारतिय सेना में रहकर विभिन्न युद्धो में बहादुरी एवं शौर्य की बदौलत जो शौर्य पदक प्राप्त कियें हैं वे किसी भी एक जिले के लिये प्रतिष्ठा एवं गौरव का विषय हो सकता हैं. सीमा युद्ध के अलावा जिले के बहादुर सैनिकों ने देश मे आंतरिक शान्ति स्थापित करने में भी सदैव विशेष भूमिका निभाई हैं. सीमा संघर्ष एवं नागा होस्टीलीटीज हो या आïपरेशन ब्लूस्टार या श्रीलंका सरकार की मदद हेतु किये गये आपरेशन पवन अथवा कश्मीर में चलाया गया आतंकवादी अभियान रक्षक या कारगिल युद्व. सभी अभियान में यहां के सैनिको ने शहादत देकर जिले का मान बढ़ाया हैं.

झुंझुनू जिले में प्रारम्भ से ही सेना में भर्ती होने की परम्परा रही हैं तथा यहां गांवों में हर घर में एक व्यक्ति सैनिक होता था. सेना के प्रति यहां के लगाव के कारण अंग्रेजो ने यहां ‘‘ शेखावाटी ब्रिगेड ‘‘की स्थापना कर सैनिक छावनी बनायी थी. जिले के वीर जवानो को उनके शौर्यपूर्ण कारनामों के लिये समय-समय पर भारत सरकार द्वारा विभिन्न अलंकरणों से नवाजा जाता रहा हैं. अब तक इस जिले के कुल 117 सैनिकों को वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है. जो पूरे देश में किसी एक जिले के सर्वाधिक हैं.

वीरचक्र प्राप्त करने वालों में 1947-48 के कबायली हमले में कैप्टन बसन्ताराम, सुबेदार सांवलराम, गुगनराम, हनुमानाराम, हवलदार रक्षपाल, नायक बीरबलराम, सिपाही हनुमानाराम, लादुराम व मोहर सिंह(मरणोपरान्त), 1962 के भारत-चीन युद्व में सूबेदार हरीराम को मरणोपरान्त,1965 के भारत-पाक युद्व में कैप्टन मोहम्मद अयूब खान,हवलदार दयानन्द मरणोपरान्त,1971 के भारत-पाक युद्ध में एडमिरल विजय सिंह शेखावत, मेजर एच.एम.खान मरणोपरान्त, कैप्टन पुरूषोत्तम तुलस्यान, नायब सूबेदार रामसिंह, हवलदार जसवंत सिंह, गंगाधर मरणोपरान्त, नायक निहालसिंह, रघुवीरसिंह, सिपाही बिड़दाराम मरणोपरान्त, सिपाही रामकुमार, सूबेदार मदनलाल व नायब सूबेदार मदनलाल मरणोपरान्त शामिल है.
1971 के भारत-पाक युद्ध में एडमिरल विजयसिंह शेखावत को परम विशिष्ठ सेवा मेडल, अति विशिष्ठ सेवा मेडल, वीर चक्र व आर्मी डिस्पेच सर्टिफिकेट, ले.जनरल कुन्दन सिंह को परम विशिष्ठ सेवा मेडल,ब्रिगेडियर आर.एस.श्योरान को अतिविशिष्ठ सेवा मेडल दिया गया. सूबेदा दयानन्द, नायक मेघराज सिंह मरणोपरान्त, नायक हरिसिंह मरणोपरान्त, सिपाही रामस्वरूप मरणोपरान्त को कीर्तिचक्र से सम्मानित किया गया. मेजर रणवीर सिंह शेखावत, सूबेदार मेहरचन्द, नायक मनरूपसिंह, सिपाही महिपालसिंह, हवलदार भीमसिंह सभी मरणोपरान्त,हवलदार जगदीश प्रसाद ,सिपाही नेत्रभानसिंह को शोर्यचक्र प्रदान किया गया.इसके अलावा जिले के 23 सैनिको को सेना मेडल,दो को नो सेना मेडल व 14 को मेन्सन इन डिस्पेच से सम्मानित किया गया था.
भारतीय सेना में योगदान के लिये झुंझुनू जिले का देश में अव्वल नम्बर हैं. वर्तमान में इस जिले के 45 हजार जवान सेना में कार्यरत हैं. वहीं 62 हजार भूतपूर्व सैनिक हैं. भारतीय सेना की और से राष्ट्र की सीमा की रक्षा करते हुये यहां के 423 जवान शहीद हो चुके हैं. जो पूरे देश में किसी एक जिले से सर्वाधिक है. कारगिल युद्व के दौरान भी पूरे देश में यहां के सर्वाधिक जवान शहीद हुये थे. कारगिल युद्व के बाद से अब तक झुंझुनू जिले के 114 से अधिक सैनिक जवान सीमा पर शहीद हो चुके हैं.

यहां के जवान सेना के सर्वोच्च पदों तक पहुंच कर अपनी प्रतीभा का प्रदर्शन किया है. इस जिले के एडमिरल विजय सिंह शेखावत भारतीय नो सेना के अध्यक्ष रह चुकें हैं,वहीं स्व. कुन्दन सिंह शेखावत थल सेना में लेफ्टिनेन्ट जनरल व भारत सरकार के रक्षा सचिव रह चुके हैं. जे.पी.नेहरा , सत्यपाल कटेवा वर्तमान में सेना में लेफ्टिनेन्ट जनरल, कंवर करणी सिंह आर्मी हास्पिटल,दिल्ली में मेजर जनरल पद पर कार्यरत है. इसके अलावा यहां के काफी लोग सेना में ब्रिगेडियर,कर्नल,मेजर सहित अन्य महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत है. देश में झुंझुनू एकमात्र ऐसा जिला हैं जहां सैनिक छावनी नहीं होने के उपरान्त भी गत पचास वर्षो से अधिक समय से सेना भर्ती कार्यालय कार्यरत है. जिससे यहां के काफी युवकों को सेना में भर्ती होने का मौका मिल पाता है.
यहां के हवलदार मेजर पीरूसिंह शेखावत को 1948 के युद्व में वीरता के लिये देश का सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया जा चुका है. परमवीर चक्र पाने वाले पीरूसिंह शेखावत देश के दूसरे व राजस्थान के पहले सैनिक थे. यहां के सैनिकों ने द्वितीय विश्व युद्व में भी बढ़चढ़ कर भाग लिया था. आज भी यहां के 406 द्वितीय विश्व युद्व के पूर्व सैनिकों या उनकी विधवाओं को सरकार से 1500 रू मासिक पेंशन मिल रही है.

जिले में इतने अधिक लोगों का सेना से जुड़ाव होने के उपरान्त भी सरकार द्वारा सैनिक परिवारों की बेहतरी व सुविधा उपलब्ध करवाने के लिये कुछ भी नहीं किया गया है. कारगिल युद्व के समय सरकार द्वारा घोषित पैकेज में यह बात भी शामिल थी कि हर शहीद के नाम पर उनके गांव में किसी स्कूल का नामकरण किया जायेगा मगर जिले के ऐसे 24 शहीदों के नाम पर अब तक सरकार ने स्कूलों का नामकरण कई वर्ष बीत जाने के बाद भी नहीं किया है. ऑपरेशन कारगिल विजय के दौरान 28 दिसम्बर 1999 को सैनिक अमरसिंह ने देश रक्षा में अपने प्राणों की आहुती दी थी. लेकिन आज भी शहीद के परिजनों को न्याय की आश है, सरकारें बदलती रही पर शहीद के परिजनों की किसी ने सुध नही ली. भारत सरकार की और से कारगिल शहीद के परिजनों को दी जाने वाली सभी सुविधाऐं आज तक शहीद अमरचन्द जांगिड़ के परिजनों को नही मिल पाया है. शहीद वीरांगना सुशीला ने बताया कि शहीद परिवार के भरण-पोषण के लिए शहीद परिवाजनों को आवंटित किया जाने वाला पेट्रोल पम्प भी इतने वर्ष बित जाने के बाद आज तक स्वीकृत्त नही हो पाया है.

जिले की खेतड़ी तहसील के गोठड़ा गांव के शहीद धर्मपाल सैनी 14 अक्टूबर, 2012 को अफ्रीका के कांगो में शहीद हो गए थे. धर्मपाल सैनी के अंतिम संस्कार 19 अक्टूबर, 2012 के समय ऊर्जा व जलदाय मंत्री डॉ.जितेंद्रसिंह ने शहीद परिवार की सहायता करवाने के लिए लंबी चौड़ी घोषणाएं की थी. उसके बाद 13 अप्रेल, 2013 को शहीद की मूर्ति का अनावरण मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किया था. उस वक्त भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने शहीद परिवार को सहायता दिलाने के लिए कई लंबी चौड़ी घोषणाएं की थी. मगर उनमें से आज तक कोई भी घोषणाएं पूरी नहीं हुई हैं और ना ही सरकार की तरफ से मिलने वाला पैकेज भी अभी तक शहीद परिवार को नहीं मिल पाया है. अब तक सरकारी सहायता के नाम पर सिर्फ एक लाख रुपए मिले हैं. जबकि सरकार ने शहीद परिवार को एक फ्लैट व 25 बीघा सिंचित भूमि देने की घोषणा की थी. मुख्यमंत्री द्वारा शहीद के नाम से गोठड़ा गांव के स्कूल का नामकरण, सडक़ का निर्माण व बिजली कनेक्शन की घोषणाएं अभी तक मुंह बाहें खड़ी है.

झुंझुनू जिले की जनता के लिये सैनिक स्कूल खुलवाना आज भी सपना बना हुआ है. सरकार द्वारा झुंझुनू जिले को देश का सैनिक जिला घोषित कर यहां के सैनिक परिवारों को सुविधाये उपलब्ध करवाने की तरफ पर्याप्त ध्यान देवे तो आज भी झुंझुनू क्षेत्र से अनेको पीरूसिंह पैदा हो सकते हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.