/नंदीग्राम का कहर जारी है वामपंथ के खिलाफ..

नंदीग्राम का कहर जारी है वामपंथ के खिलाफ..

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||
नंदीग्राम भूमि विद्रोह का असर अब भी कायम है और यह एक ऐसा सिलसिला बन गया है, जिससे भारतीय वामपंथ के निकट भविष्य में उबरने के आसार कम ही हैं. मेदिनीपुर समेत जंगलमहल में वामपंथ का सबसे मजबूत जनाधार पहले ही ध्वस्त हो गया है. विधानसभा चुनावों और पंचायत चुनावों में फिरभी वामपंथियों के वापसी की उम्मीद की जी रही थी. इसी उम्मीद की पूंजी लेकर वाम नेतृत्व परिवर्तन की मांग सिर से खारिज की जाती रही है. वाम जनता की मांगों के विपरीत बहिष्कृत पूर्व लोकसभाध्यक्ष की वापसी तो पार्टी में नहीं हो सकी, बल्कि नेतृत्व के प्रबल आलोचकों किसान नेता रज्जाक अली मोल्ला को बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया तो नंदीग्राम त्रासदी का ठीकरा तत्कालीन सांसद लक्ष्मण सेठ पर फोड़ते हुए उन्हें पार्टी से बाहर निकाल फेंका गया. लक्ष्मण सेठ और रज्जाक मोल्ला इस पूरे प्रकरण में एक दूसरे के संपर्क में रहे हैं.cpm-logo_1

जाहिर है कि नंदीग्राम और सिंगुर में जबरन जमीन अधिग्रहण, अंधाधुंध शहरीकरण और पूंजी के लिए वाम सरकार और नेतृत्व की अंधी दौड़ पार्टी के स्रवोच्च स्तर पर लिए गये निर्णय के मुताबिक ही हैं और इस कार्यक्रम को कार्यान्वित ही किया कैडर तंत्र ने, जिसे वाम सत्ता ने गेस्टापो और हर्माद में तब्दील कर दिया था. जमीन अधिग्रहण के मुद्दे को प्रशासनिक तौर पर सुलझाने की जगह पार्टी कैडरों के जरिये असहमत किसानों का दमन उत्पीड़न और नंदीग्राम में नरसंहार की जिम्मेदार भी पार्टी और सरकार दोनो रही हैं. लेकिन पार्टी नेतृत्व ने सरकार और नेतृत्व का बचाव करते हुए सारा दोष लक्ष्मण सेठ और जिला नेतृत्व पर डाल दिया, जिसके खिलाफ बगावत अब विस्फोटक होती जा रही है.

सेठ के निकाले जाने के बाद भी उनकी पत्नी तमालिका माकपा में बनी हुई थी और अब वह भारी धमाके के साथ जिला कमिटी के पूरे नेतृत्व को लेकर पार्टी से बाहर निकल गयीं. पूरे जिला नेतृत्व का पार्टी छोड़ने की यह घटना वामपंथी इतिहास में अभूतपूर्व है.

कुल 21 नेताओं के इस्तीफे राज्य कमिटी ने मंजूर भी कर लिये हैं लेकिन नेतृत्व ने दलत्यागियों के सारे आरोप सिरे से खारिज कर दिये हैं. जबकि लक्ष्मण सेठ के मुताबिक पारटी छोड़ देने के बाद निष्कासन हुआ या नहीं, यह किसी के लिए सरदर्द का सबब नहीं है.
बंगाल में 35 साल के वाम शासन के बाद चुनावी हार की वजह से समूचे वाम जनाधार के बिखरने के असली कारणो की पड़ताल करने और उसका निदान निकालने की कोई पहल पार्टी नेतृत्व की ओर से हो नहीं रही है. सत्तादल के सत्ता से बाहर हो जाने के बाद भेड़धंसान दलबदल आम है, लेकिन हाल के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद बंगाल में माकपाई विधायक, नेता और कार्यकर्ता जिस तरह तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में शामिल हो रहे हैं, वैसा वामपंथी पराजनीति में कभी हुआ नहीं है.

वामपंथी कैडर सिर्फ चुनावी हार के लिए विचारधारा और प्रतिबद्धता को तिलाजलि देकर धुर दक्षिणपंथी बन जाये, तो भारत में वामपंथी आंदोलन के चरित्र का नये सिरे से मूल्यांकन की जरुरत है.

विडंबना यह है कि न पार्टी महासचिव, न पोलित ब्यूरो और न राज्य नेतृत्व इसके लिए किसी भी स्तर पर तैयार है. इसके विपरीत जैसे जेएनयू में भी हुआ, असहमति के स्वर को कुचल देने के रास्ते पर ही चल पड़ा है माकपा नेतृत्व.

इससे पहले हालांकि 1996 में कामरेड ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देने के फैसले के खिलाफ उत्तर 24 परगना और कोलकाता जिलासमितियों का विभाजन हो गया था, लेकिन तब भी नेतृत्व के खिलाफ इतने संगीन आरोप नहीं लगाये गये थे और समूचे जिला नेतृत्व ही पार्टी से तब अलग नहीं हुआ था.

वैसे भी कामरेड नंबूरीदिपाद, कामरेड सुरजीत, कामरेड अनिल विश्वास और कामरेड ज्योति बसु के अवसान पर पार्टी नेतृत्व संकट से जूझ रही है और अलोकतांत्रिक ढंग से तानाशाही रवैया अपनाकर मौजूदा नेतृ्व भारतीय वामपंथ का गुड़ गोबर करने में लगा है.

गौरतलब है कि शुरु से ही सभी तबको को नेतृत्व में प्रतिनिधित्व देने की वाम परंपरा नहीं है. दबंग जाति वर्चस्व के खिलाफ लेकिन आवाजें हाल फिलहाल ही बुलंद होने लगी हैं.

अब हुआ यह कि बंगाल में राज्य व जिला कमेटी के कामकाज से नाराज होकर पूर्व मेदिनीपुर जिले के करीब तीन हजार माकपा नेताओं, कार्यकर्ताओं व समर्थकों ने एकमुश्त पार्टी छोड़ दी है.

इन लोगों ने भारत निर्माण मंच बनाने का ऐलान भी कर दिया. इस मंच के आचरण और भविष्य के बारे में कोई अंदाजा अभी नहीं है.

पार्टी छोड़ते हुए इन लोगों ने बाकायदा पार्टी नेतृत्व के खिलाफ एक आरोपपत्र का प्रकाशन भी कर दिया है और यह भी अभूतपूर्व है.

शनिवार को तमलूक के नीमतौड़ी में एक ऑडिटोरियम में पूर्व विधायक तथा हल्दिया नगरपालिका की पार्षद व माकपा के पूर्व सांसद लक्ष्मण सेठ की पत्नी तमलिका पांडा सेठ, पांसकुड़ा के पूर्व विधायक अमीय साहू, नंदीग्राम के नेता व जिला कमेटी के पूर्व सचिव अशोक गुड़िया ने संवाददाताओं को माकपा छोड़ने की जानकारी दी.

तमलिका पांडा सेठ ने कहा कि आज का दिन उनके लिए बेहद दुखद है. इसका कारण है कि आम लोगों के साथ अब माकपा नहीं है. लिहाजा आम लोगों की भावनाओं को देखते हुए पार्टी छोड़ने का उन्होंने फैसला किया है.

18 वर्षो से वह पार्टी के साथ थीं. राज्य व जिला कमेटी के नियमों को वह मान कर काम करती थीं, लेकिन नंदीग्राम की घटना को सामने रख कर तृणमूल कांग्रेस आगे बढ़ती गयी, लेकिन माकपा ने कोई कदम नहीं उठाया. नंदीग्राम की घटना में उनके कई नेता व कार्यकर्ता शहीद हुए.

कई को घर छोड़ कर बाहर रहना पड़ रहा है, लेकिन पार्टी साथ नहीं खड़ी हुई. नंदीग्राम की घटना में झूठे मामले में फंसा कर उनके कई नेता-कार्यकर्ताओं को जेल जाना पड़ा. पार्टी ने उनकी भी सुध नहीं ली. जिले में पार्टी को मजबूत करने में लक्ष्मण सेठ का योगदान है.  लेकिन पार्टी ने उनके साथ न खड़ी होकर दल से बहिष्कृत कर दिया.

श्रीमती सेठ ने आरोप लगाया कि जिला कमेटी का दायित्व रबीन देव को दिया गया. लेकिन उन्होंने उन लोगों को तरजीह दी जो जनता से दूर हैं.

श्रीमती सेठ ने आरोप लगाया कि धमकी के साये तले उन्होंने 18 महीने तक हल्दिया नगरपालिका को चलाया. लेकिन पार्टी ने बगैर कारण बताये लक्ष्मण सेठ सहित जिले के कुल छह नेताओं को सस्पेंड कर दिया. ऐसी स्थिति में बाध्य होकर वह पार्टी छोड़ने को मजबूर हुईं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.