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सहारनपुर में कहाँ से आये इतने हथियार..

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सुशील कुमार||

सहारनपुर, दंगे में सिपाही को थाने के अंदर 315 बोर की गोली मारी गई. जिन हथियारों से फायरिंग की गई, उनमें 12 से 315 बोर के तमंचे और 32 बोर के पिस्टल खुल कर प्रयोग किए गए. दंगाइयों के हाथों में एक साथ बड़ी संख्या में हथियार कहां से आए? पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी भी इसे लेकर हैरत में है.saharanpur-riots1

सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में हथियार बाहर से तस्करी कर लाए गए या जनपद में ही असलाह की फैक्ट्री चलाई जा रही हैं? यदि पहले से ही इस पर अंकुश लगाया जाता तो बेखौफ दंगाई पुलिस नहीं टूट पड़ते. माना जा रहा है कि पास के राज्य हरियाणा से लेकर बिहार के मुंगेर तक के हथियारों की सप्लाई जनपद में की जाती है.

मंडी थाना क्षेत्र के कुछ मोहल्लों में तो घर के अंदर ही हथियार बनाने के कारखाने हैं. पुलिस अवैध असलाह के खिलाफ अभियान भी चलाती है तो लोगों को पकड़ कर दफा 25 में जेल भेज दिया जाता है, जो एक से दो दिनों में जमानत पाने के बाद दोबारा से इस काम में जुट जाते है.

दंगे के समय में सरकारी मशीनरी को ऐसे सौदागरों की याद आई है, क्योंकि फसाद में बड़े पैमाने पर अवैध असलाह इस्तेमाल किए गए हैं. यदि दंगाइयों के हाथों में हथियार नहीं होते तो वह खुलेआम दुकानों को जलाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते.

डीआइजी एटीएस दीपक रतन का कहना है कि ऐसे हथियारों को भी चिन्हित किया जा रहा है. सिपाही के अलावा बाकी लोगों को मारी गई गोली में किस प्रकार के हथियार का प्रयोग हुआ है. उनकी मेडिकल रिपोर्ट को एकत्र कर कार्रवाई की जाएगी. आइजी मेरठ आलोक शर्मा का कहना है कि दंगों में अवैध असलाह के प्रयोग के बारे में एसएसपी सहारनपुर से रिपोर्ट मांगी जाएगी. किन थाना क्षेत्रों के लोगों ने अवैध असलाह का प्रयोग किया, उन क्षेत्रों में पड़ताल कराई जाएगी कि असलाह कहां से आया है? ताकि आगे भविष्य में इस प्रकार की वारदात न हो.

(जागरण)

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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