/नशे में टुन्न पत्रकारिता..

नशे में टुन्न पत्रकारिता..

journalist-रामकिशोर पंवार।।

बैतूल जिले की टीवी पत्रकारिता खासकर जीटीवी की मध्यप्रदेश रिजनल की भांग पीकर नशे में टुन्न होकर की जा रही है. बैतूल जी न्यूज पर समाचार पढने को मिला कि माचना नदी में बहा युवक बचा लिया गया, अब सवाल यह उठता है कि दनोरा में जो लाश मिली वह किसकी है तथा बचा लिया गया युवक कहां पर है।

बैतूल जिले में आजकल टीवी पत्रकारिता ऐसे लोगो के हाथो में आ गई जिन्हे जिले का इतिहास तक नहीं मालूम लेकिन वे जिले का भूगोल ऐसे बताते है जैसे में बैतूल जिले के गूगल है। ऐसे गूगल बैतूल जिले में कभी कुंजीलाल की मौत का लाइव टेलिकास्ट करते है तो कभी मदर इंडिया की तर्ज पर फादर इंडिया की फर्जी स्टोरी चलाते है।

बैतूल जिले की कुछ साल तक टीवी पत्रकारिता मर्यादा में रह कर की जाती थी लेकिन प्रतियोगिता के दौर में सबसे पहले सनसनी खेज खबर देने वाले बैतूल जिले में पूर्णा बांध के बहने की खबर की फोनो पीटीसी करने से बात नहीं आते है। बैतूल जिले मे शासकीय दस्तावेज में पूर्णा जलाशय बना ही नहीं फिर पूर्णा जलाशय कैसे बह जाता है।

ताजा वीडियों देखिये और आप फैसला कीजिए कि बडे बैनर की टीवी पत्रकारिता किस स्तर की चल रही है। पूरे देश में टीवी पत्रकारिता बेक्रिंग न्यूज के चक्कर में भांग पीकर होने लगी है। ताजा घटना बैतूल जिले की है जहां पर जी न्यूज के संवाददाता आशुतोष गुप्ता बता रहे है कि बैतूल में माचना नदी में डूबे युवक को बचा लिया गया है। अगर वह युवक बच गया है तो दनोरा के पास लाश किसकी मिली……!

वैसे भी बैतूल जिले की टीवी पत्रकारिता खासकर जीटीवी की मध्यप्रदेश रिजनल की भांग पीकर नशे में टुन्न होकर की जा रही है। जी न्यूज के सनसनी पैदा करने के लिए बात का बतगंड बनाना आम बात है। अब इसे जी न्यूज की मजबुरी कहे या उनके संवाददाताओं का अल्प ज्ञान कि वे जिले के इतिहास का ज्ञान नहीं रखते और जिले का भूगोल बताने लगते है।

आज जरूरत है कि कुंजीलाल या अनीता नर्रे की फर्जी स्टोरी बना कर लोगो को दिग्यभ्रमित न किया जाए। चंद रूपयो का लालच देकर अनिता नर्रे को बिन्देश्वरी पाठक से लेकर मध्यप्रदेश सरकार अपने समग्र स्वच्छता अभियान का बाण्ड एम्बेसेडर बना के रखी है उसी समग्र अभियान की जमीनी हकीगत खुलने पर कई सरपंच सचिव जेल जाने की स्थिति में है। आज भी अनिता नर्रे के गांव में महिलाये और पुरूष गांव से बाहर शौच करने जाते देखे जा सकते है। अब जरूरत आप और हम सबकी है कि ऐसी पत्रकारिता का पर्दाफाश करे जो सच्चाई की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.