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कोसी नदी में बाढ़ के खतरे से बिहार के कई जिलों में हाई अलर्ट..

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पटना। नेपाल से सुबह छह बजे 1.12 लाख क्यूसेक और आठ बजे 1.17 लाख क्यूसेक पानी कोसी में पहुंच गया है। हालांकि इसके विशाल जल क्षेत्र को देखते हुए इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है। आशंका है कि 12 बजे के बाद जलस्तर में अधिक तेजी से वृद्धि हो सकती है। जानकारों का मानना है कि छोटे-छोटे विस्फोटक लगाकर पानी के छोड़े जाने से फिलहाल खतरा टल गया है। गौरतलब है कि नेपाल में भूस्खलन के कारण कोसी नदी से भारी तबाही का खतरा पैदा हो गया था। उम्मीद की जा रही थी कि रविवार को कभी भी कोसी के रास्ते 10-11 मीटर की ऊंचाई वाला पानी का रेला भारत आ सकता है।2014-08-03 11.58.05

बिहार सरकार ने मदद के लिए सेना की मदद मांगी है, जबकि वायुसेना और नौसेना को अलर्ट पर रखा गया है। खतरे को देखते हुए सीमावर्ती नौ जिलों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। कोसी के नजदीकी चार जिलों-सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और मधुबनी की दो लाख की आबादी को सामान और पशुओं के साथ ऊंचे व सुरक्षित ठिकानों पर जाने को कहा गया है। केंद्र ने एनडीआरएफ (राष्ट्रीय आपदा नियंत्रण बल) की 15 टीम बिहार में तैनात कर दी हैं। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेपाल दौरा रविवार (आज) से शुरू हो रहा है। बिहार में तटवर्ती इलाका सन 2008 में कोसी में आई बाढ़ से भारी तबाही झेल चुका है। बाढ़ के खतरे को देखते हुए नई दिल्ली में केंद्र और पटना में बिहार सरकार सक्रिय हो गई है। कैबिनेट सचिव अजित सेठ ने बैठक करके हालात का जायजा लिया और आपदा प्रबंधन तंत्र को सक्रिय कर दिया है। बिहार के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह के साथ वार्ता करके बचाव एवं राहत की रूपरेखा तैयार की गई। इसी के साथ एनडीआरएफ (आपदा राहत बल) की 15 टीमों को कोसी क्षेत्र के लिए रवाना कर दिया गया।

केंद्र ने राज्य सरकार को हर संभव सहायता का आश्वासन दिया है। बिहार के आपदा प्रबंधन विभाग के प्रमुख सचिव व्यासजी ने बताया है कि सुपौल जिले में कोसी नदी पर बने बीरपुर बैराज के सभी 56 गेट खोल दिए गए हैं। आठ लाख क्यूसेक क्षमता वाले इस बैराज में ही नेपाल से आने वाला पानी भरेगा। हालात की गंभीरता को देखते हुए बिहार सरकार ने सेना से बचाव कार्य के लिए मदद मांगी है। वायुसेना ने मदद के लिए गोरखपुर और बागडोगरा स्थित अपने अड्डों पर एमआइ 17 हेलीकॉप्टरों को अलर्ट पर रखा है। पूर्णिया में मोबाइल मेडिकल टीम भी तैयार कर दी गई हैं। नौसेना ने अपने गोताखोर दस्ते को तैयार रहने के लिए कहा है। संवेदनशील स्थानों पर तैनात अधिकारियों को संपर्क के लिए 15 सैटेलाइट फोन दिए गए हैं। केंद्र सरकार पहाड़ टूटने से पैदा हुई स्थिति से निपटने के लिए नेपाल सरकार की भी मदद कर रही है।

विशेषज्ञों का एक दल काठमांडू रवाना कर दिया गया है, जो वहां पर नदी की धारा में गिरे पहाड़ के टुकड़े को विस्फोट से तोड़ने में मदद करेगा। सनकोसी नदी में पानी का बहाव रुकने से नेपाल स्थित डैम में 20 से 25 लाख क्यूसेक पानी एकत्रित होने की आशंका है। इसके चलते डैम टूटने का खतरे से नेपाल भी दो-चार है। अगर वहां पर डैम टूटा तो भीषण तबाही मच सकती है और उसका असर बिहार पर भी पड़ेगा। नेपाल में बाढ़ की ताजा स्थिति में अभी तक आठ लोग मारे जा चुके हैं। बिहार के जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी के अनुसार आपदा प्रबंधन विभाग ने संबंधित जिलाधिकारियों को तत्काल राहत शिविर स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं। जिलाधिकारियों को पेयजल, भोजन, शौच की व्यवस्था, दवा, पशु चारा आदि की व्यवस्था करने के लिए कहा गया है।

खतरे की मूल वजह: नेपाल में राजधानी काठमांडू से करीब सौ किलोमीटर उत्तर-पूर्व में सनकोसी नदी में भूस्खलन के चलते पहाड़ टूट कर गिर गया है। मलबे के कारण नदी का मार्ग अवरुद्ध हो गया है। चारों ओर पहाड़ है। नेपाल की सेना डायनामाइट लगाकर इसे तोड़ने में जुटी है। पहाड़ के इस टुकड़े के चकनाचूर होने पर तेज गति के साथ पानी का बहाव बिहार की ओर होगा। इससे 10-11 मीटर की ऊंचाई में पानी कोसी में आएगा। ऐसी स्थिति में कोसी बैराज के समीप करीब ढाई लाख क्यूसेक (क्यूबिक फुट प्रति सेकेंड) पहुंचने की आशंका है। इससे बिहार में कोसी क्षेत्र के छह जिलों में भीषण बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। 2008 में कोसी बरपा चुकी है कहर: छह साल पहले 18 अगस्त, 2008 को कोसी नदी में नेपाल की ओर से अचानक भारी मात्रा में पानी आ जाने से कुसहा बांध टूट गया था। बाढ़ में 247 गांवों के करीब साढ़े सात लाख लोग प्रभावित हुए थे, जबकि 217 लोगों को जान गंवानी पड़ी। इसके अलावा दो लाख साठ हजार पशु भी बाढ़ की चपेट में आए और उनमें से 5445 की मौत हो गई। क्षेत्र में 50,769 लाख हेक्टेयर भूमि पर लगी फसल बर्बाद हो गई थी और 30 हजार से ज्यादा कच्चे मकान ध्वस्त हो गए थे।

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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