/खुद ही उड़ा दिया गुलाबी रंग..

खुद ही उड़ा दिया गुलाबी रंग..

मीडिया से उपजी संपत पाल का विवाद और फिल्म गुलाब गैंग का आना बुंदेलखंड के गुलाबी गैंग पर भारी पड़ गया..

-आशीष सागर दीक्षित||

बांदा, दिलकश अदाकारा माधुरी दीक्षित अभिनीत फिल्म गुलाब गैंग पर जैसे ग्रहण लग गया. निर्देशक सौमिक सेन ने कभी न सोचा था कि बुंदेलखंड़ की ठेठ पट्टी से निकली संपत पाल न सिर्फ उसके लिए भारी पड़ेगी बल्कि खुद गुलाबी गैंग के अवसान काल का अध्याय लिख रही होगी.Hindustan malala samman divas 006

माधुरी दीक्षित भी पिंक साड़ी में लाठियों से लैस बुंदेलखंड के गुलाबी गैंग की तर्ज पर एक्शन के पूरे मूड में थी. शूटिंग पूरी हुई कुनबे का नाम गुलाब गैंग भी रख दिया और लाठी चलाने वाली संपत की तरह रज्जो भी हवा में उड़ते हुए हसिया चलाने लगी. लेकिन इस दरम्यान फिल्म की पटकथा से इतर एक और कल्पना संपत के दिमाग में तैयार हो रही थी. बिना इजाजत लिए सौमिक सेन ने पूरी फिल्म बना डाली और रज्जो की शक्ल में अबला को सबला दिखाने का बखूबी काम भी किया. बात हजम कैसे होती जिस महिला पर ये फिल्म बनी उसका नाम और काम करने का इलाका दोनो ही गुलाब गैंग से उड़ा दिए गए. बस यही एक बात संपत के लिए काफी थी, माधुरी की चमक फीकी करने के लिए.

अपने ऊपर फिल्माई गई गुलाब गैंग के मामले को लेकर संपत पाल दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंच गई और मीडिया में मुद्दे का उछाल दिया. मौका भी था और दस्तूर भी था संपत ने कोई कसर नहीं छोड़ी दिल्ली से लेकर बुंदेलखंड के स्थानीय मीडिया में खुद की सुर्खिया बटोरने के लिए. उच्च न्यायालय में फिल्म प्रदर्शन पर रोक लगा दी और फिल्म प्रदर्शित होने से एक दिन पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने रोक हटा भी दी. उसी दिन मीडिया में एक खबर तैर गई कि बुंदेलखंड की संपत पाल को उसके ही गुलाबी गैंग ने संगठन के पद से बाहर का रास्ता दिया है. फिल्म के बहाने गुलाबी गैंग एक बार फिर चर्चा में आ गया. गैंग के अंदरूनी झगड़े और असंतोष फिल्म के साथ बातचीत का मुद्दा बन गया. चित्रकूट जिले के रौली कल्याणपुर गांव की एक अल्हढ़ सी महिला संपत अंर्तराष्ट्रीय मीडिया में जाना पहचाना नाम है. ख्याति प्राप्त संपत पाल बनने से लेकर 13 साल की बालिका वधु के वेश में संपत पाल के पीछे कई लोग खड़े हुए. एक के बाद एक खबरें बनती गई और बांदा जिले के कस्बा बदौसा में चाय की थड़ी लगाने वाली संपत दुनिया की 100 प्रभावशाली महिलाओं में ‘द गार्जियन’ के रास्ते शुमार हो गई. अब से ठीक 6 साल पहले ग्राम रौली कल्याणपुर में बालिका वधु के नाम से पहचानी जाने वाली संपत जिसे उसका ही पति शराब पीकर मारता था स्थानीय मीडिया के तयशुदा पटकथा से बिग बॉस तक पहुंच गई.gulabi gaing mahoba 14 aprail 010

संपत पाल उस वक्त सुर्खियों में आई जब एक बार राशन बांटने के विवाद को लेकर तत्कालीन थाना प्रभारी बदौसा का नाटकीय क्रम में उन्होंने मर्दन कर दिया. संयोग से उस दिन धरना-प्रदर्शन करने वाली सभी ग्रामीण औरतें गुलाबी साड़ी में थी. जिला फतेहपुर के रहने वाले जयप्रकाश शिवहरे उर्फ बाबूजी ने इस समूह को ‘गुलाबी गैंग’ नाम दे दिया. गुलाबी साड़ी और हाथ में गुलाबी डंडा इस गैंग की पहचान बन गई. संपत के दावे की माने तो बीस हजार से अधिक पूरे देश में इसकी पंजीकृत सदस्य हैं. कल्पनातीत फिल्म गुलाब गैंग की रज्जो जहां हवा उड़ते हुए लात-घूंसे चलाती है वहीं बुंदेलखंड की संपत पाल लाठी चलाती है.

संपत पाल तब और खबरों में आई जब तत्कालीन एसपी ने संपत पर नक्सली होने का आरोप लगाया. मुद्दा उछला और अंर्तराष्ट्रीय मीडिया के कैमरे बुंदेलखंड की तरफ घूमने लगे. अमेरिकी निर्देशक किम लॉन्गिनोटो बुंदेलखंड आए और पिंक साडीज के नाम से फिल्म बनाई जिसे 2010 में कई पुरस्कार प्राप्त हुए. एनी बर्थाेड ने वॉरियर इन पिंक साडी: द इन साइड स्टोरी नाम से किताब लिखी. 2005 में विधानसभा क्षेत्र नरैनी से दस्यु ठोकिया की मां के खिलाफ संपत निर्दलीय चुनाव लड़ी लेकिन हार गई. तब पुरूषोत्तम नरेश द्विवेद्वी ब्राम्हण वोट बैंक से निर्वाचित हुए. 2012 में संपत कांग्रेस के टिकट पर मानिकपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ी और फिर हार गई. इसके बाद वह रियल्टिी शो बिग बॉस में पहुंची और उन्हें सितारा का दर्जा प्राप्त हो गया. शो में सिरकत करने की बतौर कीमत 25 लाख रूपए और एक लैप टॉप गुलाबी गैंग संगठन के लिए दिए गए. इस बीच असंतोष के बीज संगठन में तैयार हो रहे थे. सारा वित्तीय लेखा-जोखा संपत अपने पास रखती है. फिल्म गुलाब गैंग के तूल से गुलाबी गैंग में भी बिखराव शुरू हो गया. गैंग के राष्ट्रीय संयोजक और संपत के मीडिया मैनेजर जयप्रकाश शिवहरे ने गैंग की ही उप कंमाडर सुमन सिंह चौहान को एक नए लोकतांत्रिक गुलाबी गैंग का राष्ट्रीय कमांडर बांदा के अर्तरा कस्बे के गौराबाबा में महिलाओं की बैठक बुलाकर घोषित कर दिया.gulabi gaing mahoba 14 aprail 005

जयप्रकाश शिवहरे ने आरोप लगाया कि वह काम के बजाय खुद को महत्व देने लगी थी. शिवहरे का कहना है कि उनके ही प्रयास से गुलाबी गैंग की नींव पड़ने के साथ आदिवासी महिला उत्थान एवं ग्रामोद्योग सेवा संस्थान नाम की संस्था बनाई गई. जिसका पंजीकृत कार्यालय अकबरपुर, भरकूप जिला चित्रकूट है. संपत ने इस संस्था को कभी हिसाब नहीं दिया और राष्ट्रीय और अर्तराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाले अनुदान व पुरस्कार को निज हितार्थ प्रयोग किया है. वहीं संपत पाल के संगठन की उप कमांडर रही सुमन सिंह चौहान ने बताया कि संपत अकेले कुछ नहीं कर सकती थी हम लोगों ने भूख-प्यास सहकर गुलाबी गैंग को सींचा है. कांग्रेस पार्टी हर माह तीस हजार रूपए संगठन के लिए देती रही है जिसका हिसाब किताब संपत पाल के पास है. उनका यह भी कहना है कि गुलाबी गैंग के नाम से कोई संगठन पंजीकृत नहीं है यह संस्था की महिला इकाई है. जिसे जयप्रकाश शिवहरे ने तैयार किया था.

उधर नए लोकतांत्रिक गुलाबी गैंग की सदस्या से इतर संपत के समर्थन में खड़ी महोबा जिले की कमांडर फरीदा बेगम कहती हैं कि मैं नहीं चाहती बधीं हुई बढ़नी बिखरे. हम सब एक है, घर में विवाद होते रहते है. दीदी (संपत) को समझना चाहिए. अंदर की बात बोलें तो बकौल फरीदा ने ऑफ द रिकॉर्ड सोपॉन स्टैप पत्रिका के खबरनबीस आशीष अंशू व रिपोर्टर के सामने कहा कि मामला गुलाब गैंग से याचिका के बाद मिलने वाले 2 करोड़ रूपए का हैं. दीदी का विदेश जाने का पासपोर्ट व बीजा बन चुका था जो अब बाबूजी के चलते निरस्त हो गया है.

बाबूजी और संपत में करीबी संबंध रहे हैं. बाबूजी ने दीदी के लिए अपना घर छोड़ा है. वे भावनात्मक है. अगर दीदी मनाएगी तो वे मान सकते हैं. मैंने बाबूजी की आंखों में दीदी के लिए आंसू देखें है. अगर यह रुपया हिस्सेदारी में बंट जाता तो गुलाबी गैंग बिखरता नहीं. सौमिक सेन की फिल्म में सुमित्रा बागरेचा (जुही चावला) से लड़ने वाली रज्जो आश्रम में हर 5 मिनट में कमर मटकाकर नाचती और गाती है. वैसे ही आज संपत पाल को अपने अस्तित्व के लिए लड़ना पड़ रहा है. संपत पर बने एक वृतचित्र में उसकी गैंग की सदस्या नारा लगाती हैं ‘जो न माने बातों से, वो माने लातों से’ सौमिक चाहते तो दर्शको पर यह फार्मूला अपनाकर देख सकते थे. संपत का जीवन जितना नाटकीय है उतना ही रज्जो का गुुलाब गैंग. बुंदेलखंड की संपत पाल आज कांग्रेस की गोट बनकर राहुल गांधी की चुनावी रैलियों में नजर आती है. उसकी चाहत है कि स्थानीय मीडिया के कैमरे से निकली अल्हड़ संपत एक दिन देश के लोकतांत्रिक मंदिर संसद में दस्तक दे सके.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.