/लक्ष्मी मित्तल के ब्रिटेन में पहाड़ी खरीदने का हो रहा है विरोध..

लक्ष्मी मित्तल के ब्रिटेन में पहाड़ी खरीदने का हो रहा है विरोध..

LUXEMBOURG-ARCELORMITTAL-RESULTSलंदन में रहने वाले भारतीय स्टील किंग लक्ष्मी मित्तल के ब्रिटेन में पहाड़ी खरीदने पर लोगों ने विरोध जताया है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहाड़ी के बेचे जाने पर यह अमीरों के खेल का मैदान बन जाएगी.
कम्ब्रिया के लेक डिस्ट्रिक्ट रीजन में स्थित 2850 फीट ऊंची ब्लेनकेथ्रा नामक पहाड़ी को मई में अर्ल ऑफ लैंडसेल ने 1.75 मिलियन पाउंड की आस्क प्राइस के साथ नीलामी के लिए रखा था.

सैडलबैक के नाम से मशहूर इस पहाड़ी को लेखकर एल्फ्रेड वेनराइट ने लेकलैंड के ग्रैंडेस्ट ऑब्जेक्ट्स में से एक बताया था.
उधर स्थानीय रेसिडेंट्स के समूह फ्रेंड्स ऑफ ब्लेनकेथ्रा का यह दावा है कि अगर इस पहाड़ी को बेच दिया गया तो यह अमीरों के खेल का मैदान बन जाएगी. इसके चलते उन्होंने पहाड़ी को निजी हाथों में जाने से बचाने के लिए ईडन डिस्ट्रिक्ट काउंसिल को अर्जी लगाई थी.

शुक्रवार को एच एंड एच लैंड एंड प्रॉपर्टी के सेलिंग एजेंट्स के निदेशक जॉन रॉबसन ने यह पुष्टि की कि फ्रेंड्स ऑफ ब्लेनकेथ्रा यह केस हार गए हैं.
उन्होंने बताया कि लोन्स्डेल ने एक पार्टी से पहाड़ी की डील कर दी है. यह अब खुलासा हुआ है कि वह पार्टी और कोई नहीं बल्कि लंदन-बेस्ड मित्तल हैं. लंदन विश्व की सबसे बड़ी स्टील-मेकर आर्सेलर मित्तल के सीईओ और सबसे अमीर भारतीयों में से एक हैं.

इसके बाद फ्रेंड्स ऑफ ब्लेनकेथ्रा ने इस एतिहासिक पहाड़ी के मित्तल के खरीदने पर विरोध शुरू कर दिया. एजेट की स्टेटमेंट के मुताबिक, ब्लेनकेथ्रा को बेचने के पीछे मकसद विरासत कर चुकाना है. वर्ष 2006 में सातवें अर्ल ऑफ लोन्सडेल की मृत्यु के बाद यह कर 9 मिलियन हो गया है. इस नीलामी से यह कर चुकाया जाएगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.