/बड़ी अजीब दास्तान है इन झोपड़ियो की..

बड़ी अजीब दास्तान है इन झोपड़ियो की..

– के एम यादव ||

बांस की खरपच्चियो और फटी दरियो से तैयार छोटे छोटे आकार की झोपड़ियाँ दिखने में सुन्दर भले ही न हो पर इनमे बहुत सी ज़िन्दगियाँ सांस लेती है, पनपती है, बड़ी होती है और दुनिया से रुखसत हो जाती है लेकिन ये झोपड़ियो यू ही अनवरत चलती रहती है। इन झोपड़ियो का सौभाग्य कुछ ऐसा है कि ये हरदम कूड़े के ढेर के साये में रहती है। और यह सम्बन्ध इतना गहरा है कि यें आँखे खोले तो कूड़ा, मुंह से कुछ बोले तो कूड़ा शब्द पहले निकलता है और कानो में गूंज़ती आवाज़ कूड़ा कूड़ा कूड़ा । और इसके बाद भी ये झोपड़ियो कभी चीखती – चिल्लाती  नहीं और  न ही किसी से कोई शिकायत करती है बस लड़ती रहती  अपने अस्तित्व के साथ और अपने जीवन के साथ।DSC_0135 इनमें भी कई सारे सपने जन्म लेते है और फलते फूलते भी है पर न जाने कब कूड़े के ढेर में कही गुम हो जाते है। क्या करे इनका सौभाग्य ही कुछ ऐसा है। सारा जहां कूड़े को अपने घर से बाहर फेंकता है तो ये झोपड़ियाँ कूड़े को अपनी संतान की तरह पालती हैं। जिस कूड़े की दुर्गन्ध से हम और आप अपनी नाक बंद कर लेते है वही दुर्गन्ध इन झोपड़ियों के लिए जीविका की एक राह बनती है। जिस कूड़े के कारण हम विलायती बीमारियो की गिरफ्त में आ जाते है वही कूड़ा इन झोपड़ियों के लिए दो जून की रोटी का कारण बनता है। जब पूरे भारत में निर्मल भारत स्वच्छ भारत के नाम पर पुरष्कार बांटे जा रहे होते है तो ये झोपड़ियाँ कूड़े के ढेर में अपना जीवन तलाश रही होती है। कैसा अजीब विरोधाभाष है जहाँ एक तरफ हमारे देश का संविधान सभी की समानता और स्वतंत्रता की बात करता है वही उसी संविधान की नाक के नीचे इतनी घोर असमानता कि कुछ लोगो को अपना जीवन कूड़े की गुलामी में बिताना पड़ता है। पूरे देश में निर्मल भारत स्वच्छ भारत का अभियान चलाया जा रहा है। लेकिन कूड़ा बीनने वाले की स्वच्छता और निर्मलता से कोई सरोकार नहीं। उनका हाल तक पूछने वाला कोई नहीं। चुनाव के समय तो समानता, न्याय, गरीबी, विकास के बहुत भाषण दिए जाते है पर चुनाव के बाद क्या हमारे देश का प्रधानमंत्री इन झोपड़ियों में रात बिता सकता है। वो कूड़े के ढेर के बीच खाना खा सकता है ? अरे नहीं। उनका हाज़मा खराब हो जाएगा । वैसे भी उन्हें अब विदेश के दौरे से फुर्सत नहीं। अभी साहब सूट बूट और शाही भोजन का आनन्द का लेने व्यस्त है। भुखमरी ज़नता के बारे में सोचना के लिए अभी उनके पास वक्त नहीं। 4 – 5 साल बाद कुछ सोचा जाएगा जब फिर से वोट मांगने समय आएगा । लोग कहते है कि भारत को आज़ाद हुए 67 साल हो चुके है लेकिन इन झोपड़ियो को देखकर तो लगता है कि गुलामी आज भी बदस्तूर ज़ारी है। 

साथियो आपको बताते चले इन झोपड़ियो का आकार भले ही बहुत बड़ा न हो पर इनमे रहने वालो का हौसला बहुत बड़ा होता है तभी तो धूप, अंधी और पानी के बीच में भी ये कूड़ा बिनने के लिए निकल पड़ते है। इन झोपड़ियो में रहने वाला 2 साल का बच्चा हो या फिर 65 साल का बूढा सभी कूड़े की तलाश में सुबह 4 बजे घर से निकल जाते हैं। जिन हाथो में खेल खिलोने और पेन पेन्सिल होनी चाहिए वे धीरे धीरे चाकू और सिगरेट पकड़ना सीख जाते है। माँ के प्यार का तो पता नहीं हाँ माँ नाम की गाली ज़रूर इनके DSC03923मुख पर आ जाती है। पोषक और प्रोटीनयुक्त भोजन मिले या न मिले पर पेट की भूख मिटाने के लिए डस्टबिन में बचे हुए झूठन का निवाला जरूर मिल जाता है। सुविधाओं और संसाधनो का सामान बटँवारा न होने कारण इनके जैसे हज़ारों बच्चे कूड़े के ढेर के बीच नरग जैसा जीवन जीने को मज़बूर है। यही है गांधी का असली भारत ।

सच कहूँ तो इनका जीवन देखकर इंसानी जीवन से भी नफरत होने लगती है और जी करता है आग लगा दू , श्रृष्टि के उन नियमो और कायदे कानूनो को जो नैतिकता की दुहाई देते फिरते है। और सर्वशक्तिमान होने का दम्भ भरते है जब श्रृष्टि का रचयिता ही शोषक हो तो इंसानो से न्याय की क्या उम्मीद की जा सकती है। यदि सभी को जानवर ही बनाया गया होता तो शायद वो ज़्यादा बेहतर समाज होता ।

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