/टीम अन्ना करेगी UP विस चुनाव में ‘साफ छवि’ के उम्मीदवारों के लिए प्रचार, असर से होगा आकलन

टीम अन्ना करेगी UP विस चुनाव में ‘साफ छवि’ के उम्मीदवारों के लिए प्रचार, असर से होगा आकलन

टीम अन्ना ने अपनी भ्रष्टाचार की मुहिम को जमीनी स्तर पर आजमाने की ठानी है। यही वजह है कि अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में जनता का रुख जानने की कोशिश की जाएगी। विस चुनाव से पहले अन्ना हजारे क्षेत्रों में जगह-जगह सभाएं कर योग्य, बेदाग और इमानदार उम्मीदवारों को जिताने की अपील करेंगे। इसकी तैयारी भी शुरू कर दी गई है। सब कुछ ठीक रहा, तो नवंबर में कार्यक्रम की पूरी रूप रेखा तैयार कर ली जाएगी।

 

महाराष्ट्र में अन्ना के गांव रालेगन सिद्धि मे टीम अन्ना के कोर कमेटि के सदस्यों के सामने सुलतानपुर जिले से आए संजय सिंह ने इस संदर्भ में एक प्रस्ताव पेश किया, जो सबकी राय से पास हो गया। अन्ना के प्रचार अभियान में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाएगा कि इसमें किसी विशेष पार्टी का नाम नहीं आने पाए। मुहिम के दौरान जनलोकपाल बिल का विरोध करने वालों की पोल-पट्टी भी खोली जाएगी। खासकर ऐसे नेता निशाने पर होंगे, जो जनलोकपाल बिल का खुलकर विरोध कर रहे थे।

दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में टीम अन्ना

 

टीम अन्ना को भी पता है कि किसी भी मुहिम या फिर आंदोलन की सफलता की कसौटी मतदान होता है। आंदोलन के दौरान जुटने वाली भीड़ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी असर दिखाएगी। ये आजमाने के लिए सबसे नजदीक उत्तर प्रदेश का विस चुनाव है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वाले विशेषकों का हालांकि इसमें संदेह है कि अन्ना की मुहिम कोई रंग ला पाएगी। क्योंकि आंदोलन का असर शहरों में दिखा, लेकिन गांव में रहने वाली 80 प्रतिशत आबादी को टीम अन्ना के आंदोलन का कुछ अता-पता ही नहीं लग पाया।

 

यह भी एक सच्चाई है कि जब तक अन्ना का आंदोलन न्यूज चैनलों ने कवर किया, तब तक जनता भी साथ रही, लेकिन टीम अन्ना की भूख हड़ताल खत्म होते ही न तो शहरों में मोमबत्ती रैली निकल रही है और न ही नारे। कहने का मतलब जनमानस जोश में था या अखबारों और टीवी चैनलों में दिखनी की चाह, लेकिन अब वह गायब है।

जिस प्रदेश में सामानिक न्याय की लड़ाई और जातीय आधार पर मतदान की परंपरा सी रही हो, वहां अन्ना का कामयाब होना संदेह को जन्म देता है। संजय सिंह ने स्वीकार किया कि अगर जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर काम नहीं किया जाएगा, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ बना माहौल ठंडा पड़ सकता है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.