/मुलायम का अमर प्रेम..

मुलायम का अमर प्रेम..

-अब्दुल रशीद ||

जनेश्वर मिश्र पार्क के उदघाटन समाहरोह में शामिल होने के लिए मुलायम सिंह यादव का खुद फोन करके अपने पुराने साथी अमर सिंह को बुलाना अपने आप में बहुत कुछ बयां करता है.भले ही अमर सिंह बड़ी शालीनता से कहे के मैं आया हूँ, मैं न तो प्रार्थी हूँ और न ही अभिलाषी हूँ बस समारोह में शामिल होने आया हूँ. अपने भाषण में यह भी कहते हैं कि वे समाजवादी नहीं मुलायमवादी हैं. सियासी नजर से देखे तो अमर का मुलायामवादी कहना मुलायम के प्रति उनका सियासी प्रेम झलकाता है और उनके द्वारा कहे उन सारी बातों को गलत साबित करने की कोशिश है जो बाते सपा से अलग होने के बाद  अमर ने कही थीं. वहीँ सपा के कद्दावर नेता माने जाने वाले आज़म खान का कार्यक्रम में न आना इस  बात की तस्दीक करता है के पार्टी में सब कुछ समान्य नहीं. न आने को  महज़ इत्तेफ़ाक नहीं माना जा सकता. बहरहाल राजनीति अवसर का खेलamar_mulayam
है, सफल राजनीति के लिए अवसर को ही ज्यादा महत्त्व दिया जाता है. लोकसभा चुनाव के बाद जो परिस्थिति समाजवादी पार्टी की हुई है उस हालत में पार्टी का नए समीकरण तलाश करना स्वाभाविक है. नए समीकरण के संकेत कि रेखा जनेश्वर मिश्र पार्क के उदघाटन समाहरोह में मुलायम ने यह कह कर खींच दी के हमारे लोगों ने काम नहीं किया. इस समीकरण में अमर सिंह बखूबी फिट आते हैं. एक वक्त था जब पार्टी में अमर – मुलायम कि जोड़ी को बड़े और छोटे भाई का दर्जा हाँसिल था. अमर कि कही बातों का इतना महत्त्व था कि उनकी बात को पार्टी में नेता नकार नहीं सकते थे.दोनों कि जोड़ी ने सपा में कई इतिहास रचे थे.

अमर सिंह के पार्टी में वापसी होने कि अटकले तेज़ होने के साथ यह सवाल भी अहम हो गया है कि क्या आज़म खान को मना लिया जाएगा? क्योंकि सपा छोड़ कर गए आज़म खान कि वापसी की शर्त के कारण ही अमर सिंह को समाजवादी पार्टी से अलग कर दिया गया था न कि पार्टी में किसी विवाद के कारण. २०१० में पार्टी से अलग करने के बाद रामगोपाल यादव  ने कहा था कि अमर सिंह के कारण पार्टी कि छवि कलंकित हुई है. समारोह में भी अमर सिंह के विरोध में नारे लगे. सपा से अलग होने के बाद भी अमर सिंह के खिलाफ मुलायम सिंह यादव ने शायद ही कभी कुछ कहा हो लेकिन अमर ने मुलाय के लिए जहर उगलने में कोई कमी नहीं की, और आज खुद को  मुलायामवादी कह रहें हैं. खेल अवसर का है पिछले लोकसभा में आरएलडी के टिकट पर लोक सभा चुनाव में फतेहपुर सीकरी से चुनावी मैदान में उतरे लेकिन हार गए, दूसरी तरफ उनका राज्यसभा का कार्यकाल भी इसी साल नवंबर में समाप्त हो रहा है,तीसरा जो ख्याति उन्हें समाजवादी पार्टी में रह कर मिला वह बीते चार सालों में लगभग समाप्त हो गई, मिडिया में छाए रहने वाले अमर दरअसल अपने राजनैतिक वजूद कि लड़ाई लड़ रहें हैं ऐसे में यह आमन्त्रण जो मुलायम सिंह यादव ने खुद फोन करके दिया था राजनैतिक संजीवनी से कम नहीं.और यह संजीवनी पार्टी के लिए कितना कारगर होगा इस बात को तो भविष्य तय करेगा लेकिन सपा में वापसी कि अटकले यदि हकीक़त में बदल जाता है तो अमर सिंह के लिए फायदेमंद ही साबित होगा.  

पिछले लोक सभा में हुई करारी हार के बाद और लगातार प्रदेश सरकार पर हो रहे विपक्ष के हमले से समाजवादी पार्टी अपने को उबार कर उत्तर प्रदेश में मजबूती से स्थापित करने के लिए आज़म खान और अमर सिंह के बीच के गहराई को पाट कर साथ लाने कि कवायद एक अहम चुनौती होगी. सबसे अहम सवाल हार का विष्लेषण है या हार? भले ही उत्तर प्रदेश सरकार में दूसरे नंबर के नेता आज़म खान को कहा जाता हो लेकिन एक सच यह भी है कि लोकसभा में आज़म खान का जादू नहीं चला.पार्टी इस बात का विष्लेषण करने के बजाय हार को ज्यादा  महत्त्व देती दिखाई दे रही है,ऐसे में यदि पार्टी लोकसभा में हुई करारी हार को आधार बनाकर निर्णय लिया जाएगा तो आज़म खान का जाना और अमर सिंह का आना कि संभावना प्रबल है.

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