/तो क्या व्हाट्स एप्प और वाइबर आदि के लिए देने होगी फीस..

तो क्या व्हाट्स एप्प और वाइबर आदि के लिए देने होगी फीस..

जिस तरह तेज़ी  से व्हाट्स एप्प, वाइबर और अन्य इंस्टेंट मैसेज सेवाओं का जाल फ़ैल रहा है ऐसे में टेलिकॉम कंपनियों के कान खड़े होना स्वाभाविक है और अगर वो शोर मचा कर नियमावली में कुछ फेर बदल  करवाते हैं तो आश्चर्य नहीं होगा. खबर है कि सरकार जल्दी ही इन इंस्टेंट मैसेज सेवाओं पर चार्ज लगा सकती हैं. टेलिकॉम रेगुलैरिटी अथौरिटी ऑफ़ इंडिया (ट्राई) ने अप्रैल में खिलाडियों जैसे के विषय में चर्चा करने की बात कही थी.  ऐसा लगता है ट्राई ने इनके लिए कोई हल खोज लिया है. शायद वो हल इन पर शुल्क लगाने से निकले.Apps-ban-in-Sindh

एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्राई ने एक  सेमिनार आयोजित किया था जिसमें  व्हाट्स एप्प, वाइबर और अन्य इंस्टेंट मैसेज सेवाओं पर कनेक्टिविटी शुल्क और मुनाफे को सरकार के साथ बाँटने के लिए नए नियम लागू करने पर चर्चा की गयी. इस चर्चा के मुख्य बिंदु थे : ओवर द टॉप  के सम्बन्ध में नए सुधार, टेलिकॉम प्रदाताओं पर ओवर द टॉप  का असर और रोकथाम और ओवर द टॉप  को लेकर क़ानूनी दांव पेंच. हालाँकि रिपोर्ट के अनुसार इन एप्लीकेशनों पर कोई बड़ी कार्यवाही की सम्भावना नहीं है. इन्हें राजस्व के दायरे में लाना मूल समस्या थी. आशा की जा रही है सरकार इस बारे में जल्दी ही कोई घोषणा करेगी.

इन एप्लीकेशनों की वजह से फोन सेवा से लेकर एसएम्एस जैसी पुरानी सेवाएं भी प्रभावित हुयी हैं. भारती एयरटेल, रिलायंस, वोडाफोन जैसे प्रदाता चाहते हैं कि ये एप्लीकेशन उन्हें कनेक्टिविटी शुल्क दें जिससे  इन एप्लीकेशनों की वजह से उन्हें होने वाले नुकसान की भी भरपाई की जा सके. चूंकि कई एप्लीकेशनों ने मुख्य आय स्रोत जैसे एसएम्एस  और वैल्यू एडेड सेवाओं को लगभग ख़त्म कर दिया है, इसलिए इन कंपनियों का कहना है कि कनेक्टिविटी शुल्क उनका अधिकार है.

रिपोर्ट के अनुसार कंपनियों को इन एप्लीकेशन की वजह से  फ़िलहाल 5000 करोड़ का नुकसान हो रहा है जो अगले दो सालों में उपभोक्ताओं  की गिनती बढ़ने के साथ 16,400 करोड़ तक जा सकता है.

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