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मनुवादी-आर्य शुभचिन्तक नहीं, शोषक हैं..

By   /  August 10, 2014  /  3 Comments

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-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’||

‘‘9 अगस्त, 2014 को पूरे विश्‍व में विश्‍व आदिवासी दिवस मनाया गया. यदि इस अवसर पर कोई मौन रहा तो वो थी हिन्दुओं की तथाकथित संरक्षक विचारधारा की पोषक भारतीय जनता पार्टी की भारत सरकार, जिसकी ओर से इस असर पर एक शब्द भी आदिवासियों के उत्थान के लिये या आदिवासियों के बदतर हालातों के बारे में नहीं कहा गया. बल्कि भाजपा अपने राष्ट्रीय आयोजन के माफर्र्त देश को गुमराह करने में मशगूल दिखी. इससे एक बार फिर से यह बात सच साबित हो गयी कि हिन्दूवादी ताकतें, जिन पर आर्यों और मनुवादियों का शिकंजा कसा हुआ है, वे आदिवासियों को आदिवासी तक मानने को ही तैयार नहीं हैं. बल्कि इसके ठीक विपरीत मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें आर्यों को ही इस देश के मूल निवासी सिद्ध करने में लगी हुई हैं और भारत के असली मालिक और यहॉं के मूल निवासी आदिवासियों को वनवासी कहकर नष्ट करने का सुनियोजित षड़यंत्र चलाया जा रहा है.’’IMG-20140809-WA0050

विश्‍व में विश्‍व आदिवासी दिवस के अवसर पर यह सारांश भारत के विभिन्न राज्यों के आदिवासियों के आक्रोश और विचारों का देखने को मिला है. जो विभिन्न माध्यमों से 09 अगस्त, 2014 को आयोजनों, सभाओं और संदेशों के मार्फ़त विश्‍व आदिवासी दिवस को प्रकट हुआ है.

इसके अलावा अन्तरजाल पर मोबाइल के मार्फत तकनीक का अब आदिवासी भी उपयोग करना सीख रहा है, जहॉं पर मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें पूरी तरह से हावी हैं और वो देश और समाज को बरगाले में पीछे नहीं हैं. ये अहसास अब अनार्यों को भी हो रहा है. इस बात का जवाब भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न कारणों से फैले राजस्थान और मध्य प्रदेश के आदिवासियों ने विश्‍व आदिवासी दिवस पर देने का प्रयास किया है. इस दौरान आदिवासियों की ओर से विश्‍व आदिवासी दिवस तो हजारों स्थानों पर चर्चा, बैठक, रैली, सभा, गोष्ठी आदि के जरिये बढचढकर मनाया तो गया ही, इसके साथ-साथ जागरूक आदिवासियों की और से जो सन्देश आपस में प्रसारित किये गये, वे इस देश और इस देश के मूल निवासी आदिवासियों तथा अनार्यों के आने वाले कल के बारे में बहुत कुछ बयां करते हैं. यहॉं ऐसे ही कुछ संदेशों का सारांश और भावार्थ प्रस्तुत हैं :-IMG-20140809-WA0048

1. ‘‘पे बेक टू सोसायटी-एक सामाजिक जिम्मेदारी है.’’ : यह एक विचारधारा है, जिसके अनुसार हम जिस समाज के कर्जदार हैं, उसके प्रति हमारी कुछ नैतिक जिम्मेदारी है. जिसका निर्वाह करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति का अनिवार्य कर्त्तव्य है. यह विचारधारा किसी संगठन की मोहताज नहीं है. हम में से कोई भी किसी भी संगठन से जुड़ा हो पर हमारा प्रथम कर्त्तव्य है कि भारत के असली मालिक और यहॉं के मूल निवासी आदिवासी जो आर्यों की नजर में अनार्य हैं, वे सब मिलकर आपास में एक दूसरे की मदद और सहयोग करें. जिसकी शुरुआत हम इस ग्रुप से जुड़े लोगों का सहयोग करके कर सकते हैं. पे बेक टू सोसायटी ग्रुप में अगर किसी भी सदस्य को परेशानी हो या समाज के किसी भी सदस्य की परेशानी का पता चले तो सभी उसका तत्काल सहयोग करें. सहयोग की ये भावना ही हम सभी को एक सूत्र में जोड़ेगी और हमारे आदिवासी प्रेम को प्रमाणित करेगी. सभी आदिवासी चाहे वो किसी भी जाति के हो या किसी भी राज्य में रहते हों, हम सभी एक दूसरे के सहयोग की कसम खाते हैं. सभी भाइयों से अनुरोध है की वो सभी अपनी-अपनी जगह विश्‍व आदिवासी दिवस को “पे बेक टू सोसायटी-एक सामाजिक जिम्मेदारी” के नाम से अपने मित्र सगे सम्बन्धी और मिलने वाले सभी लोगों के साथ हर्षोल्लास के साथ अपने घरों पर दीप जलाकर मनायें और उसकी फोटो एक दूसरे को भेजें तथा आदिवासी समाज के विकास और एकता पर चर्चा करें. आज का दिन हम सभी के आने वाले भविष्य के लिए ऐतिहासिक दिन होने वाला है. हम सभी का आपसी सहयोग और कड़ा परिश्रम आदिवासी समाज तथा देश की एकता के लिए मिसाल बने. जय अदिवासी एकता.IMG-20140809-WA0052

2. आदिवासी युवा शक्ति का आह्वान : ‘‘वक्त आने दे बता देंगे, तुझे ऐ आसमां…हम अभी से क्या बताएँ, क्या हमारे दिल में है.’’ विश्‍व आदिवासी दिवस के मौके पर आर्यों के वंशज शोषकों को ज्ञात हो जाना चाहिये कि भारत का मूल निवासी अब जाग गया है. अब हम गॉंव-गॉंव ढाणी-ढाणी घूम-घूम कर लोगों को इस बात को बतायेंगे कि मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें हिन्दुत्व के नाम पर आदिवासियों को और अनार्यों को किस प्रकार से आर्यों की गुलाम बनाये रखने के लिये काम कर रही हैं? हम प्रतिज्ञा करते हैं कि इस देश में मनुवाद अधिक दिन तक चलने वाला नहीं है. इस देश को आर्यों के चंगुल और मनुवाद की मानसिक गुलामी से मुक्त करवाना ही होगा. इस आह्वान को जमीनी स्तर पर प्रमाणित करने वाले आयोजन जैसे सभा, रैली आदि भी देशभर में देखने को मिले.

3. जयस संगठन का आह्वान : सभी साथियों को विश्‍व आदिवासी दिवस की बहुत सारी शुभकामनावों के साथ आज 9 अगस्त को जयस घोषणा करता है की जो भी आदिवासिओं के जल, जंगल, जमीन और आदिवासियों आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ आदिवासियों की संस्कृति के साथ खिलावाड़ करेगा जयस (मध्य प्रदेश से संचालित संगठन) उनके खिलाफ खुली लड़ाई लड़ेगा और आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावो में उन सभी राजनैतिक पार्टियों का खुला विरोध करेगा. जिनकी नीतियां आदिवासियों के हितों के खिलाफ बनाई जा रही हैं. जिनकी नीतिओं में आदिवासी बच्चों को भूख और कुपोषण से मरने को मजबूर किया जा रहा है. आज जयस घोषणा करता है कि देश के उन सभी आदिवासी जनप्रतिनिधियों का भी खुल्लम खुल्ला विरोध करेगा जो विधायक और सांसद बनने के बाद पूरे पांच साल तक आदिवासी मुद्दों पर चुप रहकर अपनी अपनी राजनैतिक पार्टियों की गुलामी करते हैं. जयस देश के सभी आदिवासी युवाओं से अनुरोध करता है कि आप किसी भी राजनैतिक पार्टी का समर्थन करने की बजाय आदिवासी समुदाय के उन पढे-लिखे आदिवासी युवाओं को चुनकर विधानसभा और लोकसभा में भेजें जो आदिवासिओं के संवैधानिक अधिकारों के जानकार होने के साथ साथ संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ने वाले हों. दोस्तों यही बदलाव की सच्ची शुरुआत है और इसके लिए हम आप सभी को मिलकर लड़ना है, तभी हम यह लड़ाई जीत पाएंगे.

4. आरक्षण भीख नही है : जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू की रिपोर्ट से भी ये साबित हो चुका है कि भारत के असली उतराधिकारी आठ फीसदी आदिवासी ही हैं तो फिर आरक्षण पर सवाल उठाने वाले षड़यंत्रकारी मनुवादी लोगों को खुद की गिरवान में झांकना चाहिये कि वो कितने बड़े गुनेहगारों के वंशज है. जिन्होंने देश के मूल निवासियों को इन बदतर हालातों में पहुंचा दिया है. इस बात को एक उदाहरण के जरिये समझ सकते हैं कि-कोई आपके पास आपके मकान में किराये से रहने के लिए आता है और आप उसे मकान किराया पर दे देते है, लेकिन वो आपके मकान पर कब्जा कर लेता है, आप मकान खाली कराने को प्रयास करते हैं तो किरायेदार मकान मालिक को उसके ही मकान के 10 कमरों में से एक कमरा रहने को दे

देता है. मकान मालिक इतना प्रताड़ित आतंकित किया जाता है कि सब कुछ भूलकर उस एक कमरे में जीवन बिताने को मजबूर हो जाता है, लेकिन मकान पर जबरन काबिज आपराधिक प्रवृत्ति के लोग, मकान के मालिक को उस एक कमरे में से भी बेदखल करके बाहर निकालने के षड़यंत्र लगातार रचते रहते हैं. क्या यह न्याय है??????? आज इस देश में हमारे साथ यही नहीं हो रहा है? जिस देश की आदिवासियों का शतप्रतिशत हक था, उस हक को साढे सात फीसदी पर सीमित कर दिया गया और अब उसको भी छीने जाने के नये-नये कुचक्र चले जा रहे हैं. इस उदाहरण से कोई भी समझ सकता है कि सम्पूर्ण मकान अर्थात् पूरा भारत देश हमारा है, जिसमें आर्य लोग आकर ऐसे घुसे कि पूरे देश पर ही कब्जा कर लिया और हमारे सभी हकों छीनकर उन पर काबिज हो हो गये. एक कमरा अर्थात् जो संवैधानिक आरक्षण हमें डॉ. अम्बेड़कर के साथ गॉंधी द्वारा किये गए के धोखे के बाद दिया गया, अब उस आरक्षण को भी हटाने की मुहिम अन्य मूल आरक्षित वर्गों के साथ-साथ आदिवासियों के विरुद्ध भी तेजी से चलाई जा रही है. यह कितनी मनमानी और कितनी अन्याय पूर्ण बात है, इसे कोई भी इंसाफ पसन्द व्यक्ति आसनी से समझकर महसूस कर सकता है. इस प्रकार मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें आदिवासियों को उनके बचे कुचे हकों से भी वंचित करने जा रही हैं. हमें इसका साहसपूर्वक सामना करना होगा. अन्यथा मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें हमें कुचल देंगी, हमें नेस्तनाबूद कर देंगी. क्योंकि संविधान द्वारा बनाये गये सभी निकायों पर इनका एक छत्र कब्जा है. इसे हटाने के लिये सभी अनार्य जिनकी आबादी 90 फीसदी से अधिक है को एकजुट और संगठित होना होगा.

5. जयपुर में संयुक्त जनजाति संस्थान की सभा : इस अवसर पर अनुसूचित जनजाति संयुक्त संस्थान जयपर की सभा में आदिवासियों के साथ किये जा रहे भेदभाव के प्रति आक्रोश व्यक्त करने के साथ-साथ, संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव व यूनिसेफ के महानिदेशक के संदेशों को बैठक में पढकर सुनाया गया. इन संदेशों में आदिवासियों के हितों के लिए दिए गए सुझावोंं के क्रियान्वयन के लिए वृहद रूप रेखा तैयार की गई. जिसमें मुख्य रूप से यह संकल्प लिया गया कि राज्य के सभी आदिवासी एकजुट होकर अपने हितों की रक्षा के लिये आवश्यक कदम उठायेंगे. सरकार द्वारा फिर भी उदासीनता बरती गयी तो संस्थान को आन्दोलनात्मक कदम उठाने को मजबूर होना पड़ेगा.

6. निराशा भी दिखी : मोबाइलों पर देखने को मिला कि दोस्तों नेट, मोबाइल, फेसबुक और व्हाट्सअप पर कई सन्देश डालने के बाद भी सभी आदिवासी युवा उनके प्रचार-प्रसार करने में आगे नहीं आ रहा है. विश्‍व आदिवासी दिवस के मौके पर फालतू बातें डिस्कस करने की बजाय अपने संवैधानिक अधिकारों के बारे में चर्चा करें. ताकि आदिवासी समुदाय के पढेे लिखे लोगों में अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता आये. लेकिन जयादातर पढेे लिखे आदिवासी युवा फालतू बातें करने में और भेड़ चाल चलने में आगे रहते हैं, जबकि अपने आदिवासी समुदाय की बात करने में उनको शर्म आती है जो कि आदिवासी समुदाय के अस्तित्व के लिए ठीक नहीं है. ऐसे लोगों को आदिवासियों की मूल जागरूक धारा के साथ जोड़ने के सन्देश भी जारी किये गए.

7. दीप, सभा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया आदिवासी दिवस : राजस्थान और मध्य प्रदेश सहित देश के तकरीबन सभी आदिवासी बहुल राज्यों में और जहां-जहां भी आदिवासी वर्ग के लोग किसी भी वजह से निवास करते हैं, उन सभी ने विश्‍व आदिवासी दिवस को व्यक्तिगत रूप से अपने-अपने घरों में दीप जलाकर और बैठक व सभाओं में आपसी चर्चा करके हर्षोल्लास के साथ मनाया. पढेलिखे आदिवासियों ने वाटसेप, मेल और फेसबुक के जरिये भी विश्‍व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएँ एक-दूसरे को ज्ञापित की. जिसे प्रस्तुत फोटोग्राफ से बखूबी समझा जा सकता है. यह अपने आप में आदिवासियों में तकनीक के इस्तेमाल के जरिये एक बड़ा बदलाव देखा जा सकता है.

8. हम हिन्दू नहीं, हम आदिवासी हैं, धार्मिक कोड की मांग : विश्‍व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासियों के अनेक समूहों की ओर से इस बात को भी ताकत से उठाया गया कि आदिवासी हिन्दू नहीं है, बल्कि मनुवादी-आर्यों द्वारा उसे जबरन हिन्दू बनाये रखने के अनैतिक प्रयास और षड़यंत्र किये जाते रहते हैं. आदिवासियों को अलग से आदिवासी धर्म के रूप में धार्मिंक कोड प्रदान किये जाने की आवाज भी उठायी गयी. जिसका देश के अनेक राज्यों के आदिवासियों की ओर से पुरजोर समर्थन किया गया.

9. आदिवासियों में सभी सरकारों के प्रति आक्रोश : सारे देश के आदिवासियों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश और गुस्सा देखा गया कि भारत की केन्द्र सरकार सहित तकरीबन सभी राज्य सरकारों ने विश्‍व आदिवासी दिवस का सरकारी स्तर पर आयोजन नहीं किया और इस दिन की कोई परवाह नहीं की और सभी सरकारों की ओर से इस प्रकार से आदिवासियों को सरेआम अपमानित करने का प्रयास किया गया. जो आदिवासियों के बीच गहरी चिन्ता का विषय बन गया है. आदिवासियों की परवाह करने के बजाय सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अपने राष्ट्रीय जलसे के आयोजन में मशगूल रही. भाजपा सहित प्रधानमंत्री या किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री ने विश्व आदिवासी दिवस के दिन आदिवासियों के हिट में कोई कदम नहीं उठाया. इससे आदिवासियों को इस बात का अहसास हो गया की उनकी औकात राजनैतिक दलों की नजर में वोट बैंक के आलावा कुछ भी नहीं है. आदिवासियों ने इस मौके पर तय किया है कि हमें हमारे सच्चे नेतृत्व तथा समर्पित को आगे लाना होगा और आदिवासियों की राजनैतिक ताकत को दलितों तथा अन्य कमजोर अनार्य जातियों के साथ मिलकर दिखाना होगा.

10. मनुवादी-आर्य शुभचिन्तक नहीं, शोषक और दुश्मन हैं : विश्‍व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासियों के सभी समूहों में यह एक बात समान रूप से सामने आयी है कि आदिवासी जो इस देश का असली मालिक है, उसे इस अब बात का अहसास होने लगा है कि मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें उनकी मित्र या शुभचिन्तक नहीं, बल्कि उनकी असली दुश्मन और शोषक हैं. जिनका आम आदिवासियों और अनार्यों के पर्दाफाश किया जाना समय की मांग है. जिसके लिये सभी उम्र के आदिवासी समूहों को जागरूक किये जाने की सख्त जरूरत है. इसके लिये पे-बैक टू सोसायटी ग्रुप की ओर से सभी अनार्यों जातियों और वर्गों के सहयोग से एक मुहिम चलाने के लिये अलग-अलग ग्रुप तैयार किये जाने की बात भी कही गयी है. यदि आदिवासी इस मुहिम को चलाने में सफल हो पाते हैं तो आने वाले कुछ ही वर्षों में इस देश के मनुवाद के धार्मिक शिकंजे में कैद आदिवासी और अनार्यों की तकदीर में क्रान्तिकारी बदलाव की शुरूआत हो सकती है.

11. आदिवासियों को तकनीक का उपयोग समझ में आया : विश्‍व आदिवासी दिवस के अवसर पर, देशभर में सबसे बड़ी और उल्लेखनीय बात यह देखने में आयी कि तकनीक के जरिये आदिवासियों द्वारा विचार विनिमय किये जाने की शुरूआत हो गयी है, जो आने वाले भविष्य में आदिवासियों के सभी समूहों को एक दूसरे के करीब लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मुहिम सिद्ध हो सकती है.

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  • Published: 3 years ago on August 10, 2014
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  • Last Modified: August 10, 2014 @ 3:06 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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  1. अपनी दुकानदारी ज़माने के लिए कोई भी किसी के नाम पर उनके अधिकारों की की रक्षा का झंडा ले कर खड़ा हो जाता है ,यह देश में मिली स्वतंत्रता का नाजायज उठाने के समान है, समाज में फूट तथा उसका ताना बाना नष्ट पर रोक लगनी चाहिए

  2. अपनी दुकानदारी ज़माने के लिए कोई भी किसी के नाम पर उनके अधिकारों की की रक्षा का झंडा ले कर खड़ा हो जाता है ,यह देश में मिली स्वतंत्रता का नाजायज उठाने के समान है, समाज में फूट तथा उसका ताना बाना नष्ट पर रोक लगनी चाहिए

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