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उत्तराखंड के एक प्रबुद्ध नागरिक की मार्मिक अपील वहां के मुख्यमंत्री से..

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-चन्द्रशेखर करगेती।। बल हर दा, आज की प्रेस कांफ्रेस में आपका बयान सूना, आप कह रहे थे कि राज्य की जनता को कड़वे घूट पीने को तैयार रहना चाहिए ! राज्य का एक आम नागरिक होने के नाते मैं भी राज्य के उन तमाम आम नागरिकों के साथ राज्य स्थापना के दिन से ही कड़वा घूँट पी रहा हूँ, और महसूस कर रहा हूँ कि इन तेरह सालों में हम ग्याडूओं के हिस्से में सरकारों ने केवल कड़वे घूँट ही रख छोड़े हैं !rawat” बल दीदा, आप जमीन से जुड़े हुए नेता है, आपने भी बहुत से कड़वे घूँट पीये थे, अब जाकर कुछ मनवांछित फल पाया है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि आपके रहते हम ग्याडूओं को कड़वे घूँट पीने से मुक्ति मिल ही जायेगी ! क्या अब कड़वे घूँट पीने की बारी आपके मंत्रियों-विधायकों और अफसरों की नहीं है ? राज्य की बिगड़ी माली हालात के चलते क्या आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती ? अगर नहीं बनती है तो हम ग्याडू उत्तराखण्ड को अपनी नीयती मानकर कड़वा घूँट पी ही लेते हैं ! अगर आप अपनी सरकार की थोड़ी बहुत जिम्मेदारी मानते हैं तो फिर कल ही घोषणा कर दीजिये कि आगे से आपके विधायक मंत्री कोई वेतन भत्ते नहीं लेंगे ? आपके मंत्री भी अपने स्वयं के व्यक्तिगत घर में ही रहेंगे, वे अब सरकारी कोठियों का मोह त्याग देंगे, अपनी व्यक्तिगत गाड़ियों के रहते सरकारी गाड़ियों का उपयोग नहीं करेंगे ? अब वे हेलिकॉप्टर का प्रयोग तो कतई नहीं करेंगे, राज्य का दौरा अब वे कारों से ही करेंगे ? उनकी भारी भरकम सरकारी गाड़ियों को अब सार्वजनिक बोली में नीलाम कर दिया जाएगा, जिससे अच्छा दाम भी सरकार को मिल जाएगा ? आगे से अब मंत्री विधायक बीमार पड़ने पर विदेशों में इलाज कराने के बजाय राज्य के ही सरकारी अस्पतालों में अपना व् अपने परिजनों का इलाज करवाएंगे ! आपके द्वारा राज्य के खजाने पर अनावश्यक रूप से बोझ बनाये सभी संसदीय सचिवों के पद भी खत्म कर दिए जायेंगे ? रिटायरमेंट के बाद सरकार में विभिन्न पदों पर पिस्सुओं की तरह चिपके रिटायर अफसरों को घर का रास्ता दिखाया जायेगा ? विधायकों की पेंशन भी आप खत्म कर ही दोगे ? राज्य के खजाने पर भार बने पूर्व मुख्यमंत्रियों की सभी सुविधायें भी आप खत्म कर ही दोगे ? कल से विधायकों-मंत्रियों के आगे पीछे च्यांय-प्यांय करती अनावश्यक रूप से दौड़ने वाली पुलिस की गाड़ियां भी नहीं होंगी ? बल दीदा, आप से ज्यादा की उम्मीद तो नहीं है बस इतना ही कर दोगे तो हम ग्याडू कोइ भी कड़वा घूँट पीने को तैयार हैं ? तो कर दोगे ना दाज्यू ?

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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