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मीडिया से धनपशुओं को निकालने की कवायद या एकाधिकार की कोशिश..

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टेलिकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई)  ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में राजनीतिक और व्यापारिक घरानों की एंट्री पर रोक लगाने की सिफारिश की है. मंगलवार  को परामर्श रिपोर्ट जारी करते हुए एक बयान में बताया गया कि रिपोर्ट में एक स्वतंत्र रेगुलेटरी बॉडी बनाने की सिफारिश की गयी है. इसमें मीडिया से बाहर की नमी गिरामी हस्तियो को शामिल करने का सुझाव दिया गया है. इनके पास ख़बरों की जांच और जुरमाना लगाने का अधिकार होगा. हालाँकि अंतिम फैसला सरकार को ही लेना है.Untitled

ट्राई ने अपनी सिफारिश में कहा है कि राजनीतिक दलों, धार्मिक संस्थाओं, शहरी, स्थानीय, पंचायती राज संस्थाओं और पब्लिक फंड से चलने वाली दूसरी संस्थाओं, केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्रालयों, विभागों, कंपनियों, उपक्रमों, संयुक्त उद्यमों और सरकारी धन से चलने वाली कंपनियों और सहायक एजेंसियों को प्रसारण और टीवी चैनल वितरण क्षेत्र में आने से रोका जाना चाहिए.

ट्राई ने पहले से मीडिया में आ चुकी ऐसी संस्थाओं को बाहर निकलने के लिए रास्ते उपलब्ध करवाने के भी प्रावधानों की बात कही. कॉर्पोरेट के मीडिया में प्रवेश और भागीदारी के सम्बन्ध में कहा कि इससे हितों में टकराव की सम्भावना बनती है और निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है . इसके साथ ही ट्राई ने प्रसार भारती की स्वतंत्रता का भी पक्ष लिया. अपनी सिफारिश में ट्राई ने कहा है कि सरकार और प्रसार भारती के बीच दूरी रखने के उपायों को मजबूत बनाना चाहिए और इसकी स्वतंत्रता और अटॉनमी बनाए रखने के उपाय किए जाने चाहिए.

इस सिफारिश के बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि ये सिफारिश अपने आप में विवाद खड़े करती है. सबसे पहले तो सवाल ये उठता है कि पहले तो अपनी पसंद के सभी लोगों को  बुला लिया अन्दर, अब दरवाज़े बंद क्यों ? क्या मीडिया पर एकाधिकार चाहती है सरकार? नियम तो बना दिया जायेगा, लेकिन आधार क्या है और इस नियम से जुड़े सह-नियमों की नियति क्या होगी. जो समिति बनेगी उसमें पत्रकार क्यों नहीं, गैर-मीडिया जन क्यों ? क्या ये बेहतर नही होगा कि मीडिया कर्मियों की एक समिति बनाई जाये तो पारदर्शी ढंग से स्वतंत्र हो कर सामूहिक ढंग से काम करे.

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