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कुशल खेल प्रशासक थे पुरूषोत्तम रूंगटा..

By   /  August 14, 2014  /  No Comments

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-रमेश सर्राफ धमोरा||
झुंझुनू, भारतीय क्रिकेट कंटोल बोर्ड एवं राजस्थान क्रिकेट संघ के पूर्व अध्यक्ष पुरूषोतम रूंगटा का दो वर्ष पूर्व मुम्बई में निधन हो गया था. उनके स्वर्गवास के साथ क्रिकेट प्रशासन के एक युग का अन्त हो गया.PURSHOTTAM RUNGTA

अपने परिजनो, मित्रों प्रशंसको व क्रिकेट जगत में भाई जी के नाम से लोकप्रिय पुरूषोतम रूंगटा ने भारतीय क्रिकेट कंटोल बोर्ड एवं राजस्थान किके्रट संघ के अध्यक्ष के रूप में क्रिकेट खेल के प्रचार- प्रसार और विकास में महत्वपुर्ण भूमिका निभायी . राजस्थान के शेखावाटी अंचल की विभूति पुरूषोतम रूंगटा सिर्फ एक नाम ही नही बल्कि एक कुशल खेल प्रशासक, सफल ओद्योगिक घराने के मुखिया और क्रिकेट की दुनिया के मील के पत्थर थे.
भारतीय क्रिकेट के पर्याय रहे पुरूषोतम रूंगटा का जन्म राजस्थान में झुंझुनू जिले के बगड़ कस्बे में 7 जुलाई 1928 को महावीर प्रसाद रूंगटा एवं नर्बदा देवी के घर में हुआ था. एक वणिक परिवार में जन्म लेनें के उपरान्त भी पुरूषोतम रूंगटा का मन व्यापार से अधिक खेल जगत में लगता था . क्रिकेट खेल के प्रति इसी कशिश के चलते पुरूषोतम रूंगटा ने अपना सम्पूर्ण जीवन न सिर्फ राज्य स्तर पर बल्कि अन्तर्राष्टीय स्तर के क्रिकेट आयोजन के लिये लगा दिया.

अपनी गरिमामयी क्रिकेट यात्रा के दौरान उन्होने जो उपलब्धिया हासिल की वह एक इतिहास बन चुकी है. भारतीय क्रिकेट जगत के वट वृक्ष पुरूषोतम रूंगटा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष तथा कोषाध्यक्ष भी रहे . पुरूषोतम रूंगटा 1952 से 1972 तक भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष सहित विभिन्न पदों पर रहे. 1972-73 व 1974-75 तक रूंगटा दो बार भारतीय क्रिकेट कंटोल बोर्ड के अध्यक्ष रहे. कोषाध्यक्ष के रूप में उनके द्वारा किये गये उत्कृष्ट कार्य को देखते हुऐे भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने उन्हे 18 वर्षाे तक बोर्ड की वित्तीय समिति का अध्यक्ष बनाकर उनकी प्रतिभा का लाभ बोर्ड के सफल संचालन के लिये उठाया . उनकी आयोजन क्षमता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक समय जब दिल्ली और उड़ीसा क्रिकेट संघो में विवाद चल रहा था तब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने रूंगटा को दिल्ली और कटक में अन्तर्राष्ट्रीय मैचों के आयोजन की जिम्मेदारी सौंपी जिसे उन्होने सफलता पूर्वक निभाया भी.

राजस्थान किके्रट संघ के अध्यक्ष की बागडोर भी उन्होने ऐसे समय में सम्भाली जब क्रिकेट से संघ को कोई आय नहीं होती थी . अपने स्वयं के खर्चे से वर्षो तक राजस्थान के क्रिकेट को चलाने वाले पुरूषोतम रूंगटा ने राज्य क्रिकेट संघ से जुडे खिलाडिय़ो, प्रशासको और अधिकारियो को पिता तुल्य स्नेह देकर देशभर में ख्याति अर्जित की . जयपुर को वर्ष 1987 में टेस्ट मैच खेलने वाले शहर का दर्जा दिलाने तथा गुलाबी नगर को एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मैचो का केन्द्र बनाने में पुरूषोतम रूंगटा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभार्र्ई . भारत में विश्वकप का पहला टूर्नामेंट भी रूंगटा के प्रयासों से ही संभव हो पाया था. क्रिकेट की मक्का माने जाने वाले आस्ट्रेलिया के मेलबोर्न क्रिकेट क्लब, एमसीसी के वो एशिया महाद्वीप से पहले सदस्य बने थे.
एक बेहद जिंदादिल और आदर्श व्यक्तित्व के धनी पुरूषोतम रूंगटा राँयल वेस्टर्न टर्फ क्लब (महालक्ष्मी रेसकोर्स, मुंबई) के भी अध्यक्ष रहे . रूंगटा 1948 में राजस्थान फुटबाल एसोसियेशन के उपाध्यक्ष, 1950-51 में बास्केटबाल संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और बैडमिंटन संघ के भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे. अनेक समाजसेवी और जनहित संस्थाओ के सरंक्षक पुरूषोतम रूंगटा द्वारा अपनी जन्मस्थली बगड़ में स्थापित संस्कृत महाद्यिालय आज देश के अग्रणीय संस्कृत महाविद्यालयो में से एक है . पुरूषोत्तम रूंगटा के पुत्र किशोर रूंगटा भी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के कोषाध्यक्ष तथा उनके भाई किशन रूंगटा दो बार भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की चयन समिमि के अध्यक्ष रहे हैं.

अपने विशाल व्यक्तित्व से उन्होने न सिर्फ खेल जगत से जुडे लोगो के दिलो में अपना प्रभाव छोडा बल्कि राजनैतिक, सामाजिक , सांस्कृतिक एवं व्यापारिक जगत से जुड़े लाखो लोग उनकी मेहमानवाजी और दरियादिली से प्रभावित थे .

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  • Published: 3 years ago on August 14, 2014
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  • Last Modified: August 14, 2014 @ 11:44 am
  • Filed Under: खेल

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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