/बीस सालों बाद भी सुधार की कोशिश ही कर रही है मिड डे मील योजना..

बीस सालों बाद भी सुधार की कोशिश ही कर रही है मिड डे मील योजना..

मध्य प्रदेश के करुलिहाई में जाने वाली उस धूल भरी सड़क एक हिचकोले खाती यात्रा का अनुभव देते हैं. गाडी की विंडस्क्रीन पर जब धीरे धीरे धूल का गुबार बैठता है, उस एक कमरे के स्कूल को रास्ते में नज़रंदाज़ किये जाने की सम्भावना बढ़ जाती है. अन्दर से आती पहाड़ा रटते हुए बच्चों की आवाजें हवा में तैरती हैं. गाडी की आवाज़ सुन कर अध्यापक और करता धर्ता सोनपाल जी बहार निकल आते हैं और पूछ बैठते हैं, “क्या आप ब्लाक ऑफिस से हैं? क्या आप दोपहर भोजन के लिए सामान लाये हैं?”midday-meal-india

एक बेहद दूर दराज के इलाके में स्थित इस सरकारी स्कूल में मध्याह्न भोजन योजना के अंतर्गत दोपहर में भोजन देने की व्यवस्था है. लेकिन नवम्बर 2013 से आज तक भोजन नहीं बंटा है. यहाँ रहने वाले ज़्यादातर बच्चों के लिए, जिनके अभिभावक दो सौ रुपये प्रति सप्ताह की मजदूरी कमा पाते हैं या खेती करते हैं,  अक्सर ये दोपहर भोजन ही उन्हें दिन भर में मिलने वाला इकलौता भोजन होता है.  सोनपाल इस पंद्रह बच्चों के स्कूल के अकेले टीचर हैं लेकिन उन्हें स्टाफ की कमी की शायद ही परवाह हो.

भारत की मिड डे मील योजना दुनिया की सबसे बड़ी स्कूल में दिए जाने वाले भोजन की व्यवस्था है जिसके प्रशंसक पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन जैसी शख्सियतें हैं. 1995 में जब इसकी नींव रखी गयी, थी तब इसका एकमात्र लक्ष्य भूख की वजह से बच्चों को पढाई से मुंह मोड़ने से रोकना और तकरीबन सवा बारह करोड़ से कुछ अधिक संख्या में बच्चों को कम से कम एक समय का भोजन मुहैया करवाना था. लेकिन भ्रष्टाचार के जाल में फंस कर और अव्यवस्था का शिकार हो कर ये मुहीम अपने लक्ष्य से भटकती नज़र आ रही है. पिछले महीने बिहार में विषाक्त मध्याह्न भोजन खाने से 23 बच्चों के मरने की घटना को साल भर पूरा हो गया लेकिन नियम और सावधानियों का आलम पहले से बदतर होता जा रहा है. अभी भी पूरे देश में अलग अलग जगहों से ख़राब खाना खा कर बीमार पड़ने वाले बच्चों के अस्पताल में भर्ती किये जाने की खबरें आती रहती हैं.

एक और स्कूल के टीचर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, “ पहले बच्चे बहुत शोर करते थे, लेकिन स्कूल आते थे. इनकी संख्या ठीक ठाक थी. लेकिन सामान के आभाव में जबसे मिड डे मील बंद हुयी है, ये शांत रहने लगे हैं. कुछ ने तो आना भी छोड़ दिया है.”  2013-14 में भारत सरकार ने इस स्कीम के तहत तीन हज़ार करोड़ रूपए आवंटित किये थे. शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले इस कार्यक्रम में तकरीबन एक तिहाई शिक्षा बजट का आवंटन होता है. आकंड़ों के विशेषज्ञ पत्रकार गोविन्दराज कहते है, “ शिक्षा मंत्रालय का इस कार्यक्रम को चलाना कहाँ तक सही है, मुझे समझ में नहीं आता. क्यों इसे स्वस्थ्य मंत्रालय नहीं चला रहा? लोगों के पोषण का ख्याल स्वस्थ्य मंत्रालय को रखना चाहिए और यही इसकी मूल वजह है विफलता की.”

सरकार ने इस योजना  में गैर सरकारी सगठनों को सहयोगी बनाया है. ऐसा एक गैर सरकारी संगठन “अक्षय पात्र फाउंडेशन” है जो कि केंद्रीयकृत रसोई चलाता है और इसका बनाया हुआ खाना स्कूलों में दिया जाताहै. जहां किचन स्थापित करने की व्यवस्था नहीं हो सकती है वहाँ ये स्थानीय महिलाओं के समूह बना कर उन्हें ये कार्य सौंपता है. “हालाँकि नियमों के चलते गैर सकरारी संगठन ग्रामीण इलाकों में भोजन नहीं परोस सकते और ऐसे इलाकों में केन्द्रीयकृत रसोई स्थापित करने में खासी दिक्कत होती है. कही कहीं तो ये संभव भी नहीं है. रोड की खस्ता हालत और परिवहन व्यवस्था  को देखते हुए उन्हें रोज़ ताज़ा खाना पंहुचाना संभव नहीं है. इसके अलावा उन सभी लोगों को ट्रेनिंग देना भी अपने आप में एक विषम कार्य है” अक्षय पात्र के बिनाली सुहान्दानी ने कहा.  रिसर्च से पता चला है कि इस योजना से स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति में वृद्धि तो हुयी है, खास तौर से दूर दराज़ के ग्रामीण इलाकों में. बिहार की दुखद घटना के बाद अक्षय पात्र ने अपने 200 कर्मचारियों को सावधानी और सफाई के बारे में ट्रेनिंग भी दी है. लेकिन अगर पूरी योजना के आंकड़ों से इसकी  तुलना करेंगे तो ये कुछ भी नहीं है. अभी इससे कई गुना अधिक सुधार की सम्भावना है. योजना में कहीं अधिक ज़िम्मेदारी से जुड़ाव की ज़रूरत है.

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