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कभी झंडा तो कभी ट्रांजिस्टर..

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-तारकेश कुमार ओझा||
पाक कला के कुशल कलाकार सब्जियों के छिलकों को मिला कर एक नई सब्जी बना देते हैं, जिसे खाने वाला अंगुलियां तो चाटता ही है, समझ भी नहीं पाता कि उसने कौन सी सब्जी खाई है. इसी तरह मिठाइयों के सृष्टिकर्ता यानी हलवाई बची हुई मिठाइयों के अवशेष से भी एक अलग मिठाई बना कर बेच लेते हैं. जो खाने में बड़ी स्वादिष्ट लगती है.pk-poster

बाजार के कुशल हलवाई भी एेसे ही कारीगर होते हैंं. बाजार का चर्चित फंडा ब्रांडिंग , पैकेजिंग और मार्केटिंग के जरिए एेसे बाजीगर कूड़ा – करकट भी सोने के भाव बेचने का माद्दा रखते हैं. नए जमाने की फिल्मों को देखते हुए तो एेसी ही लगता है. सिनेमा रिलीज हुई नहीं कि सौ करोड़ क्लब में शामिल.

model650_081611114025चैंपियन घोषित करने को आतुर रहने वाले चैनल्स इन फिल्मों को दो से तीन सौ करोड़ क्लब में शामिल कराने को भी बेचैन नजर आते हैं. बाजार के दबाव का आलम यह कि हमारे कलाकार हमेशा अपने कप़ड़े उतार फेंकने को आतुर रहते हैं. इस राह में कभी झंडा तो कभी ट्रांजिस्टर बाधा बन कर खड़ा हो जाता है.

एक नायिका अपने नग्न शरीर पर महज झंडा लपटेने की वजह से मुकदमे झेल ही रही थी कि आमिर खान ने भी अपने कपड़े उतार फेंके. तिस पर तुर्रा यह कि सब कुछ कला और कथानक की मांग के नाम पर कर रहे है. एक ट्रांजिसटर बाधा बन गया, वर्ना खान साहब अपनी कला औऱ प्रतिभा की चरम सीमा तक अवश्य पहुंच जातेहैं .

असली कलाकारी यही है कि फिल्म बनी भी नहीं , लेकिन उसकी जबरदस्त मार्केटिंग पहले ही हो गई. नंगेपन के चलते फिल्म को इतना जबरदस्त प्रचार मिल गया जो शायद करोड़ो रुपए फूंकने के बावजूद संभव नहीं हो पाता. इसी राह पर चलते हुए फिल्में बनाते – बनाते अपने महेश भट्ट बुढ़ा गए. उन्हें आजीवन यह गम सालता रहा कि भारतीय समाज औऱ सरकार की कुपमंडुकता के चलते वे अपनी प्रतिभा का पूरा प्रदर्शन नहीं कर पाए. अब आमिर खान अपनी प्रतिभा दिखाने पर तुले हैं.

अभी जबरदस्त प्रचार के बाद उनकी फिल्म बनेगी इसके बाद पैकेजिंग – मार्केटिंग तो अभी बाकी ही है. लगता है जल्द ही बालीवुड का सौ करोड़ क्लब का ट्रेंड हजार करोड़ क्लब मे तब्दील होने वाला है. देश की सौ करोड़ जनता को भला और क्या चाहिए. उनके चहेते अभिनेताओं की फिल्में बनें और करोड़ों कमाए तो क्या यह कोई कम बड़ी उपलब्धि है.

लोगों के एक और चहेते यानी क्रिकेट की दुनिया के बाजीगर फिक्सिंग औऱ अाइपीएल के जरिए पहले ही धनकुबेर बने बैठे हैं. नए जमाने की असली प्रतिभा यही है कि कुछ करने से पहले ही उसका इतना ढिंढोरा पीट डालो कि दुनिया उसकी मुरीद हो जाए. यानी सफलता के लिए चीजों की गुणवत्ता से ज्यादा जरूरी झंडा, ट्रांजिसटर , विरोध तथा मुकदमे दायर करने वाले हो गए हैं.

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. mahendra gupta on

    नंगापन भी क्या चीज है कि इंसान बेशक खुद के नंगेपन से घृणा करता है लेकिन दूसरे को नंगा देखना पसंद करता है ,जनता खान साहब के नंगेपन को देखने जरूर सिनेमा हॉल जाएगी ,और वे पैसा कमा जायेंगे चाहे हज़ार करोड़ कमाए या दो हज़ार करोड़ जनता को तो नंगेपन के अलावा कुछ मिलना नहीं भट्ट साहब ने भी नंगेपन व फूहड़ता पन को दिखा पैसा कम नहीं कमाया है फिर भी उन्हें शिकायत है तो कोई इलाज नहीं

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