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फर्जी खबर छापने के लिए “पर्वतजन” के संपादक और चीफ ऑफ ब्यूरो को सजा..

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-नारायण परगाईं||
उत्तराखंड की मीडिया में  पत्रकारिता का लगातार गिरता पैमाना और खबरों को छाप कर कोर्ट में साबित न कर पाना मीडिया के लिए काफी अफ़सोस जनक बनता जा रहा है.
हमेशा से ही विवादों का दामन थाम कर अपनी कलम को धारदार बताने वाली एक पत्रिका के संपादक को कोर्ट ने सजा का फरमान सुना दिया है. राजनैतिक विरोधी के इशारे पर इसी संपादक को इस्तेमाल कर कोश्यारी को बगुला भगत के नाम से समाचार को प्रकशित किया गया था. यहाँ ये भी बता दें कि इस समाचार को उस समय अमली जामा 1399633_710593282367482_7782394983892613105_o 1493524_710588902367920_57339581601110560_oदिया गया था जब कोश्यारी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल थे.
लगातार कोर्ट से गलत समाचार लिखने वालो के खिलाफ कार्यवाही  होनी शुरु हो गयी है, वही उत्तराखंड में कई जनपदो में अभी कारवाही होनी बाकी है.
खबर है कि देहरादून से प्रकाशित एक मासिक पत्रिका ‘पर्वतजन’ के सम्पादक शिव प्रसाद सेमवाल तथा पत्रिका के चीफ ऑफ ब्यूरो (कुमाऊॅ) महेश चन्द्र पन्त को मानहानि के एक मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम श्रेणी, डीडीहाट ने आईपीसी की धारा 500 के अन्तर्गत एक-एक साल की कैद तथा 5000-5000 रूपये अर्थदण्ड की सजा सुनाई है. न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपने फैसले में कहा कि पत्रिका के सम्पादक शिव प्रसाद सेमवाल व चीफ ऑफ ब्यूरो (कुमाऊॅ) महेश चन्द्र पन्त के प्रश्नगत प्रकाशन में महिलाओं के लिए कार्यरत एक स्वयंसेवी संस्था महिला आश्रम मुवानी की “मानहानि किया जाना साबित पाया गया है.”
जज ने अपने फैसले में कहा है कि प्रश्नगत प्रकरण सत्य नहीं है क्योंकि अभियुक्तगण द्वारा कोई भी ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिससे यह स्पष्ट हो कि परिवादी संस्था महिला आश्रम मुवानी की जमीन या सम्पत्ति भगत सिंह कोश्यारी द्वारा हड़प की गयी है. विद्वान न्यायाधीश ने फैसले में आगे कहा है कि पर्वतजन में “प्रश्नगत लेख के प्रकाशन के पूर्व यदि अभियुक्तगण ने सुसंगत दस्तावेजों की छानबीन की होती तो निश्चित रूप से यह प्रकाशन नहीं किया गया होता, जिससे स्पष्ट है कि अभियुक्तगण द्वारा सद्भावपूर्वक प्रकाशन नहीं किया गया है‘”
अब प्रश्न उठता है कि पत्रिका के सम्पादक व चीफ ऑफ ब्यूरो ने आखिर क्यों सुनी-सुनाई और तथ्यहीन बातों के आधार पर उक्त लेख छाप कर एक संस्था जो लम्बे समय से निराश्रित महिलाओं के आश्रय व पुनर्वास के कार्य में संलग्न है को बदनाम किया.
कहीं यह महिला आश्रम के बहाने प्रदेश के जनप्रिय नेता भगत सिंह कोश्यारी को बदनाम करने की साजिश तो नहीं थी. स्मरण रहे कि मानहानि का प्रकरण सितम्बर 2010 का है जब पर्वतजन पत्रिका में प्रदेश के नेता  भगत सिंह कोश्यारी को निशाना बनाते हुए महिला आश्रम मुवानी को ढ़ाल के रूप में इस्तेमाल किया गया. तब पत्रिका ने “आवरण कथा” छाप कर श्री भगत सिंह कोश्यारी की निन्दा में पॉच पेजों की एक कहानी छापी थी. इस कहानी में श्री कोश्यारी को निशाना बनाया गया था. श्री कोेश्यारी को बदनाम करने के लिए लेख में निम्न स्तरीय भाषा का उपयोग तो किया ही गया ऐसे असत्य आरोप भी लगाये गये कि जिन्हें पढ़ कर हृदय छलनी हो जाये.
पत्रिका का मकसद साफ था कि कैसे भी भगत सिंह कोश्यारी की लोकप्रियता समाप्त कर दी जाय. श्री कोश्यारी को झूठे तथा मनगढ़ंत  आरोप लगा कर इतना बदनाम कर दिया जाय कि उनकी राजनीति ही प्रश्नों के घेरे में आ जाये. यह श्री कोश्यारी के खिलाफ एक बड़ा षड़यंत्र भी माना गया, जिसे अन्जाम देने में कोश्यारी विरोधी खेमे की बड़ी भूमिका थी.
जानकार मानते हैं कि पर्वतजन पत्रिका के सम्पादक/चीफ ऑफ ब्यूरो को तो सिर्फ ‘इस्तेमाल‘ किया गया और इस में धन की भी बड़ी भूमिका रही.  यदि यह माना जाय कि अभियुक्तगणों (शिवप्रसाद सेमवाल व महेश चन्द्र पन्त) ने किसी प्रभाव में आकर उक्त प्रश्नगत प्रकाशन किया तो वह और भी मानहानिकारक कृत्य था जो निश्चित तौर पर दण्डनीय अपराध है. इसीलिए इस प्रकरण में विद्वान न्यायाधीश ने अभियुक्तगणनें के विद्वान अधिवक्ता के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि “विवेचना में स्पष्ट हो चुका है कि प्रश्नगत प्रकाशन सत्य नहीं है क्योंकि अभियुक्तगण द्वारा कोई भी ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया” जो उनके आरोप सिद्ध कर सके.
बहरहाल जो भी हो, सच अब सामने आ गया है. पत्रिका में प्रकाशित प्रश्नगत प्रकरण के एक-एक बिन्दु को माननीय न्यायाधीश द्वारा सद्भावपूर्वक नहीं किया गया कृत्य माना है तथा फैसले में कहा है कि “अभियुक्तगण ने प्रश्नगत प्रकाशन जिन व्यक्तियों के कथनों के आधार पर किया है वे हैं भागीरथी देवी, आश्रम संचालिका सुनील मेहता, चन्दन सिंह कार्की, सामाजिक कार्यकर्त्ता सोबन सिंह विष्ट, सामाजिक कार्यकर्ता, आनन्द मोहन कार्की, गुरूजी के भतीजे, माधवी, निवासी पीपलतड़, प्रेमानन्द शर्मा, संस्था के पूर्व सदस्य व डी0के0 भट्ट सामाजिक कार्यकर्ता.
अभियुक्तगण को पूर्ण अवसर प्राप्त था कि इन व्यक्तियों को न्यायालय के समक्ष परीक्षित कराकर वे साबित कर सकते थे कि उनके द्वारा जो प्रकाशन किया गया है वह सत्य है परन्तु न्यायालय के द्वारा स्वविवेक से भागीरथी देवी आश्रम संचालिका को परीक्षित कराया गया जिसने स्पष्ट रूप से कथन किया है कि जो प्रकाशन किया है वह झूठा है तथा उसकी फोटो भी धोखे से खींची गयी थी.
अन्य व्यक्तियों को अभियुक्तगण द्वारा न्यायालय के समक्ष न तो परीक्षित कराया गया और न ही परिवादी की ओर से इस सम्बन्ध में दाखिल दस्तावेजी साक्ष्यों का कोई खण्डन किया गया है.  अतः उपरोक्त समस्त विवेचना के आधार पर न्यायालय के अभिमत में अभियुक्तगण के विरूद्ध अधिरोपित अभियोग धारा-500 भारतीय दण्ड संहिता संदेह से युक्तियुक्त परे साबित होता है तथा अभियुक्तगण धारा-500 भारतीय दण्ड संहिता के अभियोग के अन्तर्गत दोषसिद्ध किये जाने योग्य है.”
दरअसल, पत्रिका द्वारा छापी गई पूरी कहानी ही मनगढ़न्त व कपोलकल्पित थी. पत्रिका में जिन व्यक्तियों के कथनों के आधार पर कहानी गढ़ी गई उन में से अधिकांश नाम फर्जी थे जो वास्तविक थे उन्होंने भी अभियुक्तगणों को साफ-साफ बता दिया कि वे कोर्ट में गवाही नहीं देंगे. अगर देंगे भी तो वही कहेंगे जो सच है. इससे डर कर अभियुक्तगण ऐसे व्यक्तियों को न्यायालय के समक्ष परीक्षित नहीं करा सके.
कहते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते, इसीलिए देर से ही सही महिला आश्रम मुवानी के बहाने श्री भगत सिंह कोश्यारी को बदनाम करने की कोशिश नाकाम हो गई. न्यायालय ने दूध का दूध, पानी का पानी कर इन्साफ किया, जिसकी समाज को दरकार है. ताकि लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बना रहे.
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