Loading...
You are here:  Home  >  प्रतिभा  >  Current Article

संगीत से सजा संख्याओं का जादुई सिद्धांतकार (भाग -1)..

By   /  August 16, 2014  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

भारतीय मूल के मंजुल भार्गव उन चार गणितज्ञों में शामिल हैं जिन्हें इस साल गणित के नोबल कहे जाने वाले फील्ड मैडल पुरस्कार के लिए चुना गया है.

manjul--621x414

“कलात्मक सत्य और निहित सुन्दरता ने मुझे अपनी  सबसे बड़ी खोज में से एक के लिए प्रेरित किया” ये कहते हुए मंजुल भार्गव की आँखों की चमक देखते बनती है.

भारतीय मूल के अमरीका – कनाडा  निवासी भार्गव को तीन अन्य गणितज्ञों समेत प्रख्यात और सर्वाधिक प्रतिष्ठित फील्ड मैडल से पुरस्कृत किये जाने की घोषणा की गयी है.

मंजुल के लिए संख्याएं दिखावटी पंक्ति में नहीं खड़ी होती हैं, बल्कि स्पेस में अपना अपना स्थान ग्रहण करती जाती हैं. चाहे वो रूबिक्स क्यूब के किनारे पर हों, संस्कृत के अक्षर हों या सुपरमार्केट से ख़रीदे हुए संतरों का ढेर. संख्याएं  मंजुल को हर जगह दिखती हैं. उस वक़्त भी जब वोई तबला बजा रहे होते हैं और उस वक़्त भी जब वो संस्कृत में श्लोक पढ़ रहे होते हैं.

गणित की तरफ रुझान तो बचपन से ही था, लेकिन भार्गव की संगीत और काव्य में उतनि ही रूचि है जितनी संख्याओं में. जब वो कहते हैं, “तीनो का संसार में ध्येय एक ही है, सत्य को सामने लाना. मैं ऐसी ही कोशिश में हूँ”, तो सहसा यकीन हो जाता है उनके विचारों पर.

देखने से किसी अंडरग्रेजुएट छात्र की तरह दिखने वाले भार्गव, स्वाभाव से बेहद मिलनसार और मृदुभाषी है जो सामने आपने पर आपको एक पल के लिए सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या ये वही विश्व विख्यात गणितज्ञ है जो अब तक गणित का लगभग हर बड़ा पुरस्कार जीत चुका है.

प्रिन्सटन विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर भार्गव की गणित में रूचि ने उन्हें इस विषय की कुछ बेहद महत्वपूर्ण और बड़ी खोजों की तरफ बढ़ाया.

उनके बारे में एटलांटा यूनिवर्सिटी में संख्याविद निमो ओरो कहते हैं, “उनका काम विश्व स्तर से कहीं आगे है और वो अपने आप में एक युग हैं. गणित का युग.”

बचपन से ही मंजुल अपनी माता, जो स्वयं हैम्पस्टेड की होफ्स्ट्रा यूनिवर्सिटी में गणित की प्रोफ़ेसर हैं, को और अधिक गणित सिखाने के लिए परेशान किया करते थे. मंजुल की माँ, मीरा भार्गव बताती हैं, “जब ये छोटा था तो बड़ी बड़ी संख्याएँ ही इसे शांत रख पाती थी. ऐसे में मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था क्योंकि एक तीन साल ले बच्चे के लिए गणित दीवार से टकरा कर सर फोड़ने से बेहतर था.”

बचपन की एक घटना याद करते हुए भार्गव बताते हैं कि एक बार घर में संतरों का ढेर पिरामिड के आकार में रखा था. मैंने उस ढेर में कितने संतरे हैं ये जानने के लिए एक सूत्र खोजना शुरू किया और कुछ समय में खोज भी लिया. उस वक़्त मेरी उम्र आठ साल के आस पास थी और वो सूत्र था,  n(n+1)(n+2)/6 जहां nत्रिभुजाकार पिरामिड की भुजा की लम्बाई है. इसके बाद मंजुल का मन गणित में कुछ ऐसा रमा कि वो अपनी माँ के साथ उनके कॉलेज जाने लगे. वहां अगर उनकी माँ पढ़ने में कोई गलती करती तो आठ वर्षीय मंजुल उसे सुधारते और ये देखना उस कक्षा के विद्यार्थियों के लिए खासा रोचक होता था.

मंजुल ने बताया कि माँ उन्हें प्रत्येक तीन-चार वर्ष में एक बार उनके ननिहाल ले कर आती थी. उनका ननिहाल जयपुर में है. यहाँ उनके नाना पुरुषोत्तम लाल भार्गव Manjul2राजस्थान विश्वविद्यालय में संस्कृत के विभागाध्यक्ष थे. मंजुल को उनके साथ संस्कृत काव्य पढना बेहद भाता था. यहाँ पर उन्होंने ये देखा कि संस्कृत काव्य में भी ढेर सारा गणित समावेशित है और इसका सीधा सम्बन्ध  फैबोनाक्की सीरीज से है. मंजुल आगे बताते हैं कि मैंने ये भी देखा की पहले 25 व्यंजन 5 गुना 5 का व्यूह बनाते हैं जहां एक आयाम शारीरिक संरचना को दर्शाता है तो दूसरा उनसे पनपने वाली ध्वनि से सम्बन्ध रखता है.

यही नहीं, मंजुल तबला वादन में भी गहरी रूचि रखते है और कई मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन भी कर चुके हैं. मंजुल ने बहुत छोटी उम्र में ही उस्ताद जाकिर हुसैन से उनके अमेरिका प्रवास के दौरान तबला वादन भी सीखा था. प्रिन्सटन के संगीत प्रोफ़ेसर डेनियल ट्रूमैन के शब्दों में, वो एक ऐसे शानदार संगीतज्ञ हैं जिसने तकनीक में महारत हासिल की है. मंजुल गणित की समस्याओं में उलझने पर अक्सर तबले का सहारा लेते हैं और अपने दिमाग की थकान मिटाते हैं.

माँ मीरा भार्गव याद करते हुए कहती हैं, “मेरे साथ कॉलेज जाने, भारत आने जाने और गणित में व्यस्त होने की वजह से  मंजुल ने काफी समय स्कूल छोड़ा, लेकिन उस समय में भी वो गणित से जुदा रहता था और अपने दोस्तों के साथ टेनिस और बास्केटबॉल खेला करता था. अपने विलक्षण दिमाग के बावजूद उसने कभी भी अलग व्यव्हार नहीं किया. वो हमेशा से एक सामान्य बच्चे की तरह रहा.”

(क्रमश:)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 3 years ago on August 16, 2014
  • By:
  • Last Modified: August 16, 2014 @ 10:13 pm
  • Filed Under: प्रतिभा

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

विदेशी निवेश की सीमा और नया नाम प्रेसटीट्यूट..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: