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दरगाह, जहाँ भरता है मेला जन्माष्टमी पर..

By   /  August 17, 2014  /  No Comments

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-रमेश सर्राफ धमोरा||
राजस्थान में एक दरगाह ऐसी भी हैं जहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर मेला भरता हैं. झुंझुनू जिले के नरहड़ कस्बे में स्थित पवित्र हाजीब शक्करबार शाह की दरगाह, जो कौमी एकता की जीवन्त मिशाल हैं. इस दरगाह की सबसे बड़ी विशेषता हैं कि यहां सभी धर्मो के लोगों को अपनी-अपनी धार्मिक पद्धति से पूजा अर्चना करने का अधिकार है . कौमी एकता के प्रतीक के रुप मे ही यहां प्राचीन काल से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशाल मेला भरता है. जिसमे देश के विभिन्न हिस्सों से हिन्दुओं के साथ मुसलमान भी पूरी श्रद्धा से शामिल होते हैं.Narhar Dargah

जनमाष्टमी पर यहां भरने वाले तीन दिवसीय मेले में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, दिल्ली, आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र के लाखों जायरीन शरीक होते हैं. कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर भरने वाले इस मेले में हिंदू धर्मावलंबी भी बड़ी तादाद में शिरकत कर अकीदत के फूल भेंट करते हैं. जायरीन यहां हजरत हाजिब की मजार पर चादर, कपड़े, नारियल, मिठाइयां और नकद रुपया भी भेंट करते हैं.

जन्माष्टमी पर नरहड़ में भरने वाला ऐतिहासिक मेला और अष्टमी की रात होने वाला रतजगा सूफी संत हजरत शकरबार शाह की इस दरगाह को देशभर में कौमी एकता की अनूठी मिसाल का अद्भुत आस्था केंद्र बनाता है. जहां हर धर्म-मजहब के लोग हर प्रकार के भेदभाव को भुलाकर बाबा की बारगाह में सजदा करते हैं. दरगाह के खादिम एवं इंतजामिया कमेटी करीब सात सौ वर्षों से अधिक समय से चली आ रही सांप्रदायिक सद्भाव को प्रदर्शित करने वाली इस अनूठी परंपरा को सालाना उर्स की माफिक ही आज भी पूरी शिद्दत से पीढ़ी दर पीढ़ी निभाते चले आ रहे हैं. भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की छठ से शुरू होने वाले इस तीन दिवसीय धार्मिक आयोजन में दूर-दराज से नरहड़ आने वाले हिंदू जात्री दरगाह में नवविवाहितों के गठजोड़े की जात एवं बच्चों के जड़ूले उतारते हैं. दरगाह के वयोवृद्ध खादिम हाजी अजीज खान पठान बताते हैं कि यह कहना तो मुश्किल है कि नरहड़ में जन्माष्टमी मेले की परम्परा कब और कैसे शुरू हुई? लेकिन इतना जरूर है कि देश विभाजन एवं उसके बाद और कहीं संप्रदाय, धर्म-मजहब के नाम पर भले ही हालात बने-बिगड़े हों पर नरहड़ ने सदैव हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल ही पेश की है. वे बताते हैं कि जन्माष्टमी पर जिस तरह मंदिरों में रात्रि जागरण होते हैं ठीक उसी प्रकार अष्टमी को पूरी रात दरगाह परिसर में चिड़ावा के प्रख्यात दूलजी राणा परिवार के कलाकार ख्याल ((श्रीकृष्ण चरित्र नृत्य नाटिकाओं)) की प्रस्तुति देकर रतजगा कर पुरानी परम्परा को आज भी जीवित रखे हुए है. नरहड़ का यह वार्षिक मेला अष्टमी एवं नवमी को पूरे परवान पर रहता है.

मान्यता है कि पहले यहां दरगाह की गुम्बद से शक्कर बरसती थी इसी कारण यह दरगाह शक्कर बार बाबा के नाम से भी जानी जाती हैं. शक्करबार शाह अजमेर के सूफी संत ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती के समकालीन थे तथा उन्ही की तरह सिद्ध पुरुष थे. शक्करबार शाह ने ख्वाजा साहब के 57 वर्ष बाद देह त्यागी थी. राजस्थान व हरियाणा मे तो शक्करबार बाबा को लोक देवता के रुप मे पूजा जाता है. शादी, विवाह, जन्म, मरण कोई भी कार्य हो बाबा को अवश्य याद किया जाता है इस क्षेत्र के लागो की गाय, भैंसों के बछड़ा जनने पर उसके दूध से जमे दही का प्रसाद पहले दरगाह पर चढ़ाया जाता हैं तभी पशु का दूध घर में इस्तेमाल होता है. हाजिब शक्करबार साहब की दरगाह के परिसर में जाल का एक विशाल पेड़ हैं जिस पर जायरीन अपनी मन्नत के धागे बांधते हैं. मन्नत पुरी होने पर गाँवो में राती जगा होता है जिसमें महिलाएं बाबा के बखान के लोकगीत जकड़ी गाती हैं.
दरगाह में बने संदल की मिट्टी को खाके शिफा कहा जाता हैं. जिन्हे लोग श्रद्धा से अपने साथ ले जाते. लोगो की मान्यता है कि इस मिट्टी को शरीर पर मलने से पागलपन दूर हो जाता हैं. दरगाह में ऐसे दृश्य देखे जा सकते हैं. हजरत के अस्ताने के समीप एक चांदी का दीपक हर वक्त जलता रहता हैं. इस चिराग का काजल बड़ा ही चमत्कारी माना जाता है. इसे लगाने से आंखो के रोग दूर होने का विश्वास हैं.

दरगाह के पीछे एक लम्बा चौड़ा तिबारा है जहां लोग सात दिन की चौकी भरकर वहीं रहते है नरहड़ दरगाह मे कोई सज्जादानसीन नही हैं. यहाँ के सभी खादिम अपना अपना फर्ज पूरा करते हैं. दरगाह मे बाबा के नाम पर देश -विदेश से प्रतिदिन बड़ी संख्या मे खत आते है जिनमे लोग अपनी-अपनी समस्याओं का जिक्र कर बाबा से मदद की अरदास करते हैं. दरगाह कमेटी के पूर्व सदर मास्टर सिराजुल हसन फारुकी ने बताया कि जिस प्रकार ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती को ‘सूफियों का बादशाह ‘ कहा गया है. उसी प्रकार शक्करबार शाह ‘बागड़ के धणी ‘ के नाम से प्रसिद्ध हैं.

नरहड़ गांव कभी राजपूत राजाओं की राजधानी हुआ करता था. उस समय यहां 52 बाजार थे. पठानों के जमाने यहां के लोदी खां गर्वनर थे. राजपूतों के साथ चले युद्घ में उनकी लगातार पराजय हुई. किंवदंति यह है कि एक बार हार से थक कर चूर हुए लोदी खां और उनकी सेना मजार के निकट विश्राम कर रही थी, तभी पीर बाबा की दिव्य वाणी हुई कि मेरी मजार तक घोड़े दौड़ाने वाले तुम कैसे विजयी हो सकते हो? यदि मजार से हटकर लड़ोगे तो तुम्हारी जीत होगी. इसके बाद लोदी खां ने फिर से आक्रमण किया, जिसमें उनकी जीत हुई. उसी समय से यहां हजरत शकरबार पीर बाबा का आस्ताना कायम है. उसी समय यहां मजार व दरगाह का निर्माण करवाया गया. जायरीन में प्रवेश करने वाले प्रत्येक जायरीन को यहां तीन दरवाजों से गुजरना पड़ता है. पहला दरवाजा बुलंद दरवाजा है, दूसरा बसंती दरवाजा और तीसरा बगली दरवाजा है. इसके बाद मजार शरीफ और मस्जिद है.

बुलंद दरवाजा 75 फिट ऊंचा और 48 फिट चौड़ा है. मजार का गुंबद चिकनी मिट्टी से बना हुआ है, जिसमें पत्थर नहीं लगाया गया है. कहते है कि इस गुंबद से शक्कर बरसती थी, इसलिए बाबा को शकरबार नाम मिला. नरहड़ के इस जोहड़ में दूसरी तरफ पीर बाबा के साथी दफन है, जिन्हें घरसों वालों का मजार के नाम से जाना जाता है.
इतना महत्तवपुर्ण स्थल होने के उपरांत भी राजस्थान वक्फ बोर्ड की उदासीनता के चलते यहां का समुचित विकास नही हो पाया है इस कारण यहां आने वाले जायरीनो को परेशानी उठानी पडती हैं. झुंझुनू जिला प्रशासन, राजस्थान वक्फ बोर्ड को इस प्रसिद्व दरगाह परिसर का योजनाबद्व ढ़ंग से समुचित विकास करवाना चाहिये ताकि यहंा आने वाले श्रृद्वालुओं को असुविधाओं का सामना नहीं करना पड़े.

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  • Published: 3 years ago on August 17, 2014
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  • Last Modified: August 17, 2014 @ 5:05 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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