/एक भाषण और सवा अरब क़दम..

एक भाषण और सवा अरब क़दम..

क़मर वहीद नक़वी||

अब साम्प्रदायिकता की बात ले लें. नमो ने बड़ी मार्मिक अपील की कि चलिए दस साल के लिए हम हर प्रकार के जातीय, साम्प्रदायिक और प्रांतवादी तनाव व हिंसा को बन्द कर दें. बड़ी अच्छी बात है. इससे भला कौन असहमत हो सकता है! लेकिन इसे लागू कैसे करेंगे? साम्प्रदायिकता की परिभाषा क्या होगी, किस पर और कैसे लागू होगी? मुज़फ्फ़रनगर में दंगों को भड़काने में भाजपा के जो नेता आरोपी हैं, वह तो ‘ राष्ट्रवादी’ हैं! तो साम्प्रदायिक कौन हुए? दूसरी पार्टियों के नेता? तो पहले यह तय हो कि यह कैसे तय होगा कि साम्प्रदायिक तनाव भड़काने और दंगों की साज़िश रचने में किसका हाथ था और किसका नहीं?

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तो नमो का ‘मेगा प्लान’ आ गया. बहुतों के मन भा गया! वैसे तो जिनको अच्छा लगना था, उनको अच्छा लगता ही! किसी ने बड़ी दिलचस्प चुटकी ली कि भई मोदी जी अगर लाल क़िले पर जा कर चुपचाप खड़े हो जाते और कुछ न बोलते तो भी कहनेवाले कहते कि भई वाह, क्या ज़बर्दस्त भाषण था!

तो अंधभक्तों की और कट्टर आलोचकों की बात छोड़ दीजिए. जो भक्ति में आकंठ तल्लीन हैं, उन्हें अपने आराध्य में संसार की सारी महानताएँ दिखती हैं. इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है. संसार के सारे धर्म, सारे पंथ और सारे वैचारिक मठ इसी प्राणवायु से जीवन पाते हैं.

जो आस्तिक हैं और जो नास्तिक हैं, वह इसी बात पर अनन्त काल तक लड़ते रह जायेंगे कि ईश्वर है या नहीं. अब भले ही ईश्वर के होने या न होने का कोई सबूत किसी के पास न हो! आस्तिक की आस्था है कि ईश्वर है तो है! नास्तिक का तर्क है कि ईश्वर कपोल-कल्पना है तो है! चाहे जितनी बहस कर लीजिए, कोई किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचेगा! भक्तों और आलोचकों का मामला भी ऐसा ही आस्तिक-नास्तिक जैसा है. आस्था और तर्क का युद्ध! जहाँ आस्था होती है, वहाँ तर्क नहीं काम करते, वहाँ शंकाएँ नहीं हो सकतीं और जहाँ तर्क होते हैं, वहाँ आस्था के हर बिन्दु पर शंकाएँ की जाती हैं, उनके जवाब माँगे जाते हैं और जब तक जवाब मिल नहीं जाते, तब तक सवाल ख़त्म नहीं होते! आस्था और तर्क में मूल अन्तर यही है.

इसलिए आज मैं इस बहस में नहीं पड़ूँगा कि नमो का भाषण कैसा था? अच्छा था या बुरा? फुस्स था, बातों का बवंडर था, बिलकुल चुनावी टाइप था या लाजवाब था, मोहक था, मनमोहक था (अब बेचारे मनमोहन सिंह कभी मनमोहक भाषण नहीं दे पाये, कभी अपने नाम जैसी ‘बाॅडी लैंग्वेज’ नहीं दिखा पाये, तो पब्लिक क्या करे?). तो भाषण कैसा था, यह बहस अब तक बहुत लोग कर चुके, और इस पर चर्चा वही आस्तिक-नास्तिक टाइप वाली हो जायेगी, इसलिए कुछ और बात करें तो बेहतर!

जनता भी तो कुछ करे!

नमो ने अपने भाषण में एक बड़े गहरे मर्म को छुआ. पता नहीं सायास या अनायास? देखने में बात बड़ी मामूली है, बहुत-से लोगों को बिलकुल फ़ालतू भी लगी, लेकिन बात गहरी है और देश की बहुत सारी समस्याओं की जड़ भी यही है. यही कि देश नेताओं से और सरकारों से नहीं, जनता से बनता है. देश बनाना है तो जनता भी कुछ करे! अगर देश का हर नागरिक एक-एक क़दम उठाये तो सवा अरब क़दम उठ जायेंगे! सही बात है. जनता ख़ुद को बदलना न चाहे और देश को बदलने का सपना देखे तो वह भला कैसे पूरा हो सकता है? इसलिए नमो का सवाल बड़ा बुनियादी है! चाहे बलात्कार हो, भ्रूण हत्याएँ हों या सामान्य साफ़-सफ़ाई, क्या देश के नागरिकों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं? जो बलात्कार करते हैं, वह भी आख़िर किसी न किसी माँ-बाप के बेटे तो होंगे! क्या आप अपने बेटों पर वैसे बन्धन नहीं लगा सकते, जैसे कि अकसर अपनी बेटियों पर लगाते हैं? (वैसे प्रधानमंत्री की बन्धन लगाने वाली बात से मेरी घोर असहमति है. बन्धन किसी पर नहीं होना चाहिए, बेटियों पर भी नहीं. बेटों को ज़रूर यह बात सिखायी जानी चाहिए कि वह लड़कियों के प्रति संवेदनशील कैसे बनें और क्यों हर प्रकार की ज़ोर-ज़बर्दस्ती, हर हिंसा, हर उत्पीड़न, हर अत्याचार मानव-विरोधी है).

प्रधानमंत्री पूछते हैं कि क्यों आख़िर चन्द पैसों के लालच में डाक्टर भ्रूण हत्याएँ करते हैं? क्यों समाज बेटियाँ नहीं चाहता? क्यों लोग अपने आसपास सफ़ाई का ध्यान नहीं रखते, क्यों जहाँ बैठते हैं, वहाँ कचरा फैला कर चले जाते हैं. सवाल बहुत गम्भीर हैं. बहुत तीखे हैं. लोगों ने प्रधानमंत्री को बड़े जोशो-ख़रोश से सुना, ख़ूब तालियाँ बजायीं और भाषण के बाद जब भीड़ वहाँ से गयी तो पानी की ख़ाली बोतलों, बिस्कुट-चिप्स वग़ैरह के ख़ाली पैकेटों का ख़ूब सारा कचरा मैदान पर छोड़ गयी! अब आप समझ सकते हैं कि प्रधानमंत्री की अपील लोगों को दस मिनट भी याद नहीं रही, साफ़-सफ़ाई रखने की बेहद मामूली-सी बात भी लोग मान नहीं सके, तो बलात्कार और भ्रूण हत्याओं जैसे मुद्दों पर वे किसी की क्या सुनेंगे? लोगों को करना क्या था? किसी की जेब से कुछ जाना नहीं था. अपना कचरा ख़ुद समेट लेते, रास्ते में कहीं न कहीं कोई डस्टबिन दिखता, उसमें फेंक देते और घर चले जाते! लेकिन नहीं! क्यों? कचरा साफ़ करने वाला कोई होगा, वह करेगा, हमें क्या? प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में यही तो सवाल उठाया था कि सरकारी कर्मचारी कहता है, मुझे क्या? तो सिर्फ़ सरकारी कर्मचारी ही नहीं, यहाँ तो हर कोई कहता है, मुझे क्या?

क्या लोग एक भाषण से बदल जायेंगे?

अब आप कहेंगे, अरे यह तो बड़ी छोटी-सी बात है! इस पर काहे को कालम के कालम रंगे जा रहे हो? कोई और बात नहीं बची भेजे में क्या? अरे, इसमें क्या है? यह सब छोटी-छोटी बात तो लोग देर-सबेर सीख ही जायेंगे, कुछ गम्भीर विश्लेषण कीजिए महाराज! जी हुज़ूर, गाँधी जी तो सिखा-सिखा कर थक गये, आज़ादी मिले भी 67 साल हो गये, साक्षरता दर 1947 में महज़ 12 फ़ीसदी थी, जो आज बढ़ कर 75 फ़ीसदी के आसपास है. देश पढ़-लिख गया, लेकिन 67 साल में सफ़ाई का संस्कार नहीं सीख पाया! और कितना समय चाहिए आपको? इतनी छोटी-सी बात सीखने में दो-चार सदी लगेगी क्या?

बात छोटी नहीं, बहुत-बहुत बड़ी है, बहुत बड़ी चिन्ता की बात है. काफ़ी पहले से मैं कई-कई बार लिख चुका हूँ. जब तक हम एक नागरिक के तौर पर रहना नहीं सीखेंगे, तब तक देश में बुनियादी बदलाव कैसे होगा? प्रधानमंत्री का सन्देश यही है. इसीलिए उनकी तारीफ़ करनी पड़ेगी कि उन्होंने समस्या की जड़ को बिलकुल सही पहचाना. लेकिन क्या लोग एक भाषण से बदल जायेंगे? सवाल यह है कि क्या नमो के लिए यह बात महज़ एक लच्छेदार जुमला थी या सरकार सचमुच समझती है कि जनता में इसके लिए अलख जगाने की ज़रूरत है! और अगर अलख जगाना है तो इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व को एक बड़े नैतिक बल की ज़रूरत पड़ेगी? क्या वह नैतिक बल है कहीं?

और यह ज़हर उगलने वाली तोपें!

अब साम्प्रदायिकता की बात ले लें. नमो ने बड़ी मार्मिक अपील की कि चलिए दस साल के लिए हम हर प्रकार के जातीय, साम्प्रदायिक और प्रांतवादी तनाव व हिंसा को बन्द कर दें. बड़ी अच्छी बात है. इससे भला कौन असहमत हो सकता है! लेकिन इसे लागू कैसे करेंगे? साम्प्रदायिकता की परिभाषा क्या होगी, किस पर और कैसे लागू होगी? मुज़फ्फ़रनगर में दंगों को भड़काने में भाजपा के जो नेता आरोपी हैं, वह तो ‘ राष्ट्रवादी’ हैं! तो साम्प्रदायिक कौन हुए? दूसरी पार्टियों के नेता? तो पहले यह तय हो कि यह कैसे तय होगा कि साम्प्रदायिक तनाव भड़काने और दंगों की साज़िश रचने में किसका हाथ था और किसका नहीं? और जिसे दोषी पाया गया, उसे सज़ा दिलायी जायेगी और मंच पर अभिनन्दन करने के बजाय उसे अपनी पार्टी से बाहर तो आप करेंगे ही! इतना करने का नैतिक बल है कहीं? अगर है, तो शुरुआत घर से ही हो जाय. परिवार में ज़हर उगलनेवाली जितनी तोपें हैं, उन्हें ‘शान्तिदूत’ बना दीजिए. इसके बाद जहाँ भी, जो भी ख़ुराफ़ात करने की कोशिश करे, उससे पूरी कड़ाई से और पूरी निष्पक्षता से निबटिये. अगर ऐसा कर पाये तो वाह, वाह!

तो मूल बात यह है कि न जनता एक भाषण से सुधरेगी और न साम्प्रदायिकता केवल एक चाह भर से रुकेगी. इन दोनों के लिए बड़ी ईमानदार सद्च्छिाओं और पवित्र संकल्पों की ज़रूरत है. अगर ऐसा हो सका तो देश की आधी से ज़्यादा समस्याएँ अपने आप हल हो जायेंगी, वरना तो अगला पन्द्रह अगस्त आयेगा और तब हम उस दिन के भाषण के किन्ही और मुद्दों की चर्चा में दिमाग़ खपा रहे होंगे. जैसे लालन कालेज में पिछले पन्द्रह अगस्त को भ्रष्टाचार, काला धन, महँगाई, सीमा पार से होनेवाली साज़िशों और घुसपैठों का बड़ा शोर था, लेकिन इस साल लाल क़िले तक आते-आते वह सारे मुद्दे काफ़ूर हो चुके थे!

( रागदेश )

 

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