/परिवार का समाजवाद…

परिवार का समाजवाद…

-तारकेश कुमार ओझा||
भारतीय राजनीति में कांग्रेस के स्वर्णकाल के दौरान विभिन्न नामों के साथ कांग्रेस जोड़ कर दर्जनों नई पार्टियां बनी. बाद में भी इसी तरह एक पार्टी बनी. जिसका नाम था तृणमूल कांग्रेस. पहले नाम को लेकर लोगों में भ्रम रहा. फिर समझ में आया कि तृणमूल कांग्रेस का मतलब है जिसका मूल तृण यानी जमीन पर उगने वाला घास है. करीब 10 साल के संघर्षकाल के बाद 2009 में इस पार्टी के अच्छे दिन शुरु हुए. 2011 तक इस पार्टी का अपने प्रदेश यानी पश्चिम बंगाल में पूर्ण वर्चस्व कायम हो गया.

बात चाहे लोकसभा की हो या राज्यसभा की. या नौबत कहीं उपचुनाव की अाई हो. देखा जाता है कि इसके ज्यादातर उम्मीदवार विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित हस्तियां ही होते हैं. यह परिवर्तन पिछले कई सालों से देखने को मिल रहा है. इसी तरह 90 के दशक में एक पार्टी हुआ करती थी. जिसका नाम समाजवादी जनता पार्टी था. पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर इसके मुखिया हुआ करते थे. केंद्र में चार महीने इसकी सरकार भी रही. लेकिन कुछ अंतराल के बाद इसका एक हिस्सा अलग हो गया, और फिर एक नई पार्टी का जन्म हुआ, जिसका नाम समाजवादी पार्टी रखा गया.sp

इस तरह एक नाम की दो पार्टियां कुछ समय तक अस्तित्व में रही. फर्क सिर्फ एक शब्द जनता का रहा. एक के नाम के साथ जनता जुड़ा रहा तो दूसरी बगैर जनता के समाजवादी पार्टी कहलाती रही. शुरू में मुझे भ्रम था कि शायद इन पार्टियों के नेता समाजवादी विचारधारा को लेकर एकमत नहीं रह पाए होंगे. इसीलिए अलग – अलग पार्टी बनाने की जरूरत पड़ी. बहरहाल समय के साथ समाजवादी जनता पार्टी भारतीय राजनीति में अप्रासांगिक होती गई, जबिक समाजवादी पार्टी का दबदबा बढ़ता गया. इस दौरान कईयों के मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता रहा कि आखिर समाजवादी भी और पार्टी भी होते हुए क्यों कुछ लोगों को अलग दल बनाना जरूरी लगा. वह भी पुराने दल से जनता हटा कर .

आहिस्ता – आहिस्ता तस्वीरें साफ होने लगी. समाजवादी पार्टी में फिल्मी सितारों से लेकर पूंजीपतियों तक की पूछ बढी. यही नहीं समाजवादी पार्टी में इसके मुखिया मुलायम सिंह यादव के परिवार का वर्चस्व पूरी तरह से कायम हो गया. इस पार्टी के साथ जुड़ने वाले नामों में पाल और यादव का जिक्र होते ही मैं अंदाजा लगा लेता हूं कि ये जरूर मुलायम सिंह यादव के भाई होंगे. रामगोपाल, शिवपाल या जयगोपाल वगैरह – वगैरह. यही नहीं ये पाल नामधारी पार्टी के किस पद पर हैं यह जानना पता नहीं क्यों निरर्थक सा लगने लगा है. इतना मान लेना पड़ता है कि नाम के साथ पाल और यादव जुड़ा है तो जरूर लोकसभा अथवा राज्यसभा या फिर किसी सदन के सदस्य होंगे. एक दौर बाद अखिलेश – डिंपल व धर्मेन्द्र के साथ कुछ अन्य यादव नामधारी भी चर्चा में आए. इनमें एक देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, तो अन्य किसी न किसी सदन की गरिमा बढ़ा रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान एक और यादव प्रतीक का नाम भी चर्चा में आ गया. सुनते हैं कि यादव वंश से कुछ नए चेहरे जल्द ही राजनीति में दस्तक देने वाले हैं. शायद यह परिवार का समाजवाद हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.