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पढ़ी लिखी लड़की, रोशनी है स्लोगन नदारद..

By   /  August 20, 2014  /  2 Comments

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लक्ष्मीपुर खुर्द/महराजगंज, निचलौल विकास खंड के क्षेत्र के परिषदीय विद्यालयों में पढ़ी लिखी लड़की, रोशनी है घर की, शिक्षा है अनमोल रतन, पढ़ने का कुछ करो जतन.. जैसे स्लोगन सर्व शिक्षा अभियान को मुंह चिढ़ाते नजर आ रहे हैं. आलम यह है कि शासन के निर्देश के बावजूद विद्यालयों में कहीं शिक्षक नदारद हैं तो कहीं बच्चों की उपस्थिति ही नगण्य.

school chalo

इसका जीता जागता उदाहरण शुक्रवार भरवलिया गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय में देखने को मिला. विद्यालय में लगभग १०० बच्चों का नामांकन किया गया है. नामांकन के सापेक्ष बच्चों की उपस्थित हालांकि कम ही रही किंतु विद्यालय में तैनात शिक्षा मित्र अपने कार्य के प्रति सचेत दिखे. प्रधानाध्यापक का कहीं अता-पता नहीं था. पूछने पर विद्यालय के बच्चों ने बताया कि सर जी कभी-कभार ही आते हैं.

उन्हें कौन पढ़ाता है के सवाल पर कहा कि शिक्षा मित्र सर पढ़ाते हैं. बच्चों का कहना रहा कि दूसरी कक्षा में पढ़ाने के कारण उन्हें कक्षा में बैठकर इंतजार करना पड़ता है. दोपहर के भोजन के सवाल पर कहा कि भोजन समय से मिलता है. अभिभावकों ने बताया कि शिक्षा मित्र नहीं होते तो स्कूल ही बंद हो जाता. और तो और नियम का कोई यहा पर को महत्व नहीं दिया जाता है जब चाहे विद्यालय खोले जब चाहे बंद करके घर चले जाये ऐसी है यहा के नियम अध्यापक महोदय का मोबाइल नम्बर विद्यालय के दीवार पर अंकित नही है .

सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी महेंद्र प्रसाद के दूरभाष पर बात करने पर बात नहीं हो पायी.

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  • Published: 3 years ago on August 20, 2014
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  • Last Modified: August 20, 2014 @ 2:48 pm
  • Filed Under: शिक्षा

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. स्लोगन से ही कुछ हुआ होता तो अब तक मुल्क में न जाने कितना परिवर्तन आ जाता , पिछले साठ सालों में जनता ने स्लोगन ही सुने हैं आज भी नए स्लोगन सुन रहे हैं "गरीबी हटाओ" भी एक स्लोगन सुना था कितने ही नेताओं , अधिकारीयों की गरीबी तो हट गयी पर आम जनता की वहीँ खड़ी है , बल्कि कुछ बढ़ी ही है ऐसे ही अनेक स्लोगन आपको पिछली सरकारों के कार्यकाल में देखने को मिल जायेंगे नारी सुरक्षा के नाम पर नारे लगाने वाले देश में सबसे ज्यादा बलात्कार होते हैं सबसे ज्यादा वे अभी भी असुरक्षित हैं इसलिए स्लोगन से कुछ होने वाला नहीं इनका काम तो आजादी मिलने के बाद खत्म हो गया स्लोगन देने वाले लोग ही सबसे ज्यादा इनकी अनदेखी करते हैं

  2. स्लोगन से ही कुछ हुआ होता तो अब तक मुल्क में न जाने कितना परिवर्तन आ जाता , पिछले साठ सालों में जनता ने स्लोगन ही सुने हैं आज भी नए स्लोगन सुन रहे हैं “गरीबी हटाओ” भी एक स्लोगन सुना था कितने ही नेताओं , अधिकारीयों की गरीबी तो हट गयी पर आम जनता की वहीँ खड़ी है , बल्कि कुछ बढ़ी ही है ऐसे ही अनेक स्लोगन आपको पिछली सरकारों के कार्यकाल में देखने को मिल जायेंगे नारी सुरक्षा के नाम पर नारे लगाने वाले देश में सबसे ज्यादा बलात्कार होते हैं सबसे ज्यादा वे अभी भी असुरक्षित हैं इसलिए स्लोगन से कुछ होने वाला नहीं इनका काम तो आजादी मिलने के बाद खत्म हो गया स्लोगन देने वाले लोग ही सबसे ज्यादा इनकी अनदेखी करते हैं

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