/अब न होंगे त्रिलोचन..

अब न होंगे त्रिलोचन..

-सुधेंदु पटेल||

[स्मृतियों के सरताज कवि त्रिलोचन तो उसी दिन अनंत की ओर बढ़ लिए थे, जिस दिन से उनकी स्मृति झपकने लगी थी. वे लौकिक तौर पर भले ही धरती पर उपस्थित रहे थे लेकिन सदा शब्द-सचेत त्रिलोचन की हतचेतावस्था में शब्दों पर से पकड़ जब जाती रही तभी वे हमारे लिए ‘स्मृति’ बन गये थे. 20 अगस्त, 1917 को जन्मे त्रिलोचन 9 दिसम्बर, 2007 को अनंत की ओर निकल लिए थे. यह स्मृति-लेख राजस्थान पत्रिका में 16 दिसम्बर, 2007 को छपा था.]trilochan shastri

मेरे लिए अकल्पनीय है कि त्रिलोचन की शिशु-सी मुस्कुराती आंखों की कौतुकता खो जाए. मेरी स्मृतियों में काशी की गलियों-सड़कों पर मस्ती से चरैवेति-चरैवेति सार्थक करते त्रिलोचन ही बसे हैं. विविध हलचलों से भरी आठवें दषक की ओर तेजी से बढ़ती काशी में त्रिलोचन का होना भी अनोखी हलचल से कम न था. वे शब्दों के लड़वैया थे. अपनी पहलवानी के विविध आयामों के लिए ख्यात काशी में जिन्होंने त्रिलोचन को शब्दों से जुझते, मस्ती से खंगालते सुना-देखा है, वे तो बरबस ही कहेंगे कि अब कभी न होंगे त्रिलोचन! वर्ष 2007 संप्रेषण संपादक चंद्रभानु भारद्वाज कनखल (हरिद्वार) से त्रिलोचन के दर्षन कर लौटे और उनके स्वास्थ्य का हाल बताया तो मेरी हिम्मत नहीं हुई. तमाम झंझावातों में भी जिन्दगी को तनकर झेलने वाले सदा ‘जाग्रत’ त्रिलोचन से हतचेतावस्था में मिलना मेरे बस की बात न थी.

मेरी स्मृतियों में तो हिन्दी साहित्य के ‘साॅनेट के सगरमाथा’ त्रिलोचन की लगभग चार दषक पुरानी बेतरतीब यादें स्थिर है. उनका सहसा चलते हुए ठिठक कर किसी दुकान के नाम-पट्ट के व्याकरण अशुद्धि पर दीर्घ टिप्पणी करना-दीर्घ इतना कि प्रसंग को खींचते-खींचते हिन्दी-सिंधी-बांग्ला से होते हुए रवीन्द्रनाथ ठाकुर, तुलसी, निराला से लगायत बाऊल संगीत पर ‘सम’ आता या फिर तार से तार मिला जयदेव के ‘गीत गोविन्द’ पर. आज के दौर की शब्दावली के सहारे अब कहूं तो शास्त्रीजी से भेंटना-टहलना-बतियाना-गपियाना इंटरनेट सरफिंग-सा ही लुत्फ देता रहा है. उन दिनों बहुत कुछ तो सिर से ही गुजर जाता था क्योंकि पकड़ पाने की कुव्वत नहीं थी. संस्कृत और कविताएं बीच-बीच में रोमांचक-गप्प भी गरिष्ठ इतनी कि मेरी बौद्धिक पाचन क्षमता जवाब दे जाती थी. फिर ‘शंकर बूटी’ की शरण में जाना पड़ता था. तम्बाकू के आदी शास्त्रीजी बहुत आग्रह के बाद ‘तरल बूटी’ लेने को तैयार होते थे. यूं बतकही का आनंद उससे बढ़ नहीं जाता था सिर्फ दीर्घता बढ़ जाती थी क्योंकि उनकी बातें ‘ग्रहण’ किए बगैर भी रससिक्त हुआ करती थीं. उसके लिये अतिरिक्त ‘जुगाड़’ की जरूरत ही नहीं पड़ती थी सिर्फ जिज्ञासु श्रोता बनना पड़ता था. वे जीवन की हलचल को ‘भाषा के राडार’ से बहुत ही सूक्ष्मता से पकड़ते रहे हैं.

बनारस की गंुजलक-सी गलियों को विविध गतिविधियों से सतत नापता जब विद्यार्थी जीवन से पत्रकारिता की बारादरी में कदम रख ही रहा था, तभी औघड़ संत सरीखे दिखने वाले त्रिलोचन से अनायास ही मुलाकात का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. इस अवसर के निमित्त बने थे दिवंगत छायाकार मित्र एस. अतिबल. फिर तो कभी भी, कहीं भी औचक त्रिलोचन से भेंट होने पर सचल-बतकही का लाभ लेता रहा. वे जब दैनिक जनवार्ता में थे, जहां ‘त्रिलोचन उवाच’ नामक उनका साप्ताहिक कविता-काॅलम भी छपता रहा था. तब कभी-कभी लोहटिया या मैदागिन पर अपनी बेफिक्र हंसी और चाल के साथ मिल जाते तो सहज ही गोदौलिया तक का पैदल सान्निध्य मिल जाता था. यहां यह भी पढ़ ले कि उन्हें तन कर पैदल चलते हुए के अलावा किसी सवारी पर बैठे देखना अपने आप में एक दुर्लभ क्षण हुआ करता था. ऐसे में राह चलते मुलाकात हो जाने पर गोदौलिया से अस्सी तक एक ही दिन में एकाधिक बार टहलने का मुझे सान्निध्य सहज ही प्राप्त होता रहा है. उस दौरान होने वाल बातचीत का फलक इतना व्यापक हुआ करता था कि उसमें पाणिनी से पतुरिया तक, एलेन गिंसवर्ग से औघड़ बाबा किनाराम तक, दुकानों के नाम पट्ट से लेकर ‘राम की शक्ति पूजा’ तक का सस्वर सोदाहरण भाष्य सुनने का सुअवसर मुझ जैसे अनाड़ी को मिलता रहा. मेरे लिए त्रिलोचन का साथ ज्ञान की नदी में किसी ‘बौड़म’ का तैरना सीखना सरीखा हुआ करता था. क्योंकि एक ही दिन में विविध प्रसंगों को अनेकानेक रूपों यानी दोहा, कविता, रोला, साॅनेट, कथा, किस्सा, लोकोक्ति, छंद के साथ-साथ व्याकरण पर ‘मेरा यह कहना है’ कि टिप्पणियों के साथ सहेजने की लालसा में मेरी बौड़ाने की सी स्थिति स्वाभाविक ही थी. यह भी कि त्रिलोचन शास्त्रीजी द्वारा उल्लेखित व्याख्यातित प्रसंगों में कई-कई संदर्भों के उद्गम तक की पूरी शोध माला हुआ करती थी. जाहिर है कि एक जिज्ञासु बटुक की तरह मैं कई दिनों तक पुस्तकालय खंगालता रहता था. हालांकि सुविधा यह थी कि फलां पुस्तक या पत्रिका कहां उपलब्ध हो सकती है. शास्त्रीजी उसका छोर भी साथ ही पकड़ा देते थे, बशर्ते आप उत्सुक और श्रम करने को तत्पर हों. मैं खरा श्रोता था और उनके साथ पैदल चलने और खडे़-खडे़ बतियाने में भी पारंगत हो गया था. यह हुनर बाद में पत्रकारिता में मेरे बहुत काम आया.

एक दिन चौक से गुजरते हुए तवायफों की गली ‘दालमंडी’ जिसके मुहाने पर ‘कामायनी’ वाले जयशंकर प्रसाद उर्फ सुंघनी साहू की दुकान स्थित है, के बहाने चर्चा छिड़ी तो बोले ‘भाईसाहब! आनंदवाद की प्रमुखता है कामायनी में और मुख्य पात्र ‘श्रद्धा’ है और सच्ची ‘श्रद्धा’ आनंदपूर्ण कृतज्ञता से ही व्यक्त होती है.’ उस दिन उनके श्रीमुख से आल्हा की तर्ज पर कामायनी की प्रारम्भिक पंक्तियों को सुनना और उस क्षण को स्मरण करना आज भी मुझे आल्हादित करता है. ‘और पंडित! गहराई से जिसको स्वीकारा जाए वह श्रद्धा है. कामायनी में इड़ा का संदर्भ बुद्धि से है और बुद्धि यानी बोध और सृष्टि के केन्द्र में बोध ही तो है. मौसम, पेड़, पक्षी सब बोध ही तो है.’ वे बोले. जहां तक मेरी स्मरण शक्ति साथ दे रही है शास्त्रीजी ने यह भी कहा था कि ‘प्रसाद जी छायावाद के नेता है.’

अक्सर बासुदेव सिंह उर्फ त्रिलोचन शास्त्री, सुल्तानपुर चिरानीपट्टी, कटघरा पट्टी की स्मृतियों में खो जाते- ‘मैं छह बरस का था तभी हमारे पिता नहीं रहे. मेरे पिताजी ने मुझे गायत्री मंत्र सिखाया था. मेरे कंठ एवं स्मृति में जब गायत्री मंत्र ठीक तरह से बैठा तो पिता ने मुझे अन्य संस्कृत श्लोक (लगभग 150) कंठस्थ कराये थें. पिता अवधि बोली बोलते थे. मां भोजपुर की थी. उनकी बोली गांव की औरतों के लिए मजाक का विषय थी. हमारी दादी तो विधवा थी ही, मां और काकी भी विधवा थीं. मैं 16 साल की उम्र तक दादी के पास ही सोता रहा. वे रोज मीरा के पद, सुर, तुलसी के पद सुनाया करती थीं. वे गांव वालों की प्रिय थीं. खेती का सारा काम वे ही देखतीं. कुछ समय खेती में मैंने भी मदद की तो लोगों ने कहा, ‘अरे यह तो अपने बाप जैसा ही मेहनती है.’ यह आकस्मिक नहीं है कि ‘उठ किसान ओ, उठ किसान ओ, बादल घिर आए’, ‘गाय करती है घमौनी’, गेहूं जौ के ऊपर सरसों की रंगीनी’ ‘धरती’ की ऐसी अधिकांश रचनाएं सहसा नहीं उपजी है.

एक प्रसंग याद आ रहा है, जिसमें मैं अनायास शामिल था. ‘दिनमान’ में ‘भाषा-परिचय’ स्तंभ के लिए शास्त्रीजी को तत्कालीन संपादक रघुवीर सहाय सतत आग्रह करते रहे थे लेकिन त्रिलोचन थे कि पकड़ में नहीं आ रहे थे और न लिखकर भिजवाने का भरोसा ही दे रहे थे. उन्हीं दिनों रघुवीर सहायजी बनारस आए. मुझ पर वे विशेष कृपालु रहे हैं. उन्होंने त्रिलोचनजी को कहीं से भी तलाश कर अवतरित करने का आदेश जब मुझे सुनाया तो वे भावुक थे. बोले, ‘पता लगाए तो मैं भी साथ चला चलूंगा उन्हें मनाने.’ स्वाभाविक ही था कि ऐसी स्थिति में साहित्यकारों के नाड़ी-नक्षत्र की खास पकड़ रखने वाले मित्र वाचस्पति शकंुतला याद आते. जहां तक याद पड़ता है उन्होंने त्रिलोचन जी के पाए जाने वाले ‘सचल-स्थलों’ की सूचना दी थी. त्रिलोचन जी को गोदौलिया स्थित एक होटल के कमरे में लगभग कैद कर ‘भाषा परिचय’ की पहली किस्त लिखवाने में संपादक रघुवीर सहाय सफल हुए थे, जिसे अंततः शास्त्रीजी निभा ले गए थे. वर्षों बाद ‘चैथी दुनिया’ में बतौर संपादक मैं कार्टूनिस्ट शंकर पर हिन्दी शंकर्स वीकली के संपादक रमेश बक्षी से स्मृति लेख लिखवाने में सफल रहा था. फार्मूला वही सहायजी वाला ही अपनाया था. इन दोनों ही प्रसंगों में त्रिलोचन शास्त्री और रमेश बक्षी का सहज स्नेहिल स्वभाव ही था जिससे साधिकार यह संभव हो पाया था.

मुझे यह सोचकर हैरत होती है कि इतनी भाषाओं के जानकार त्रिलोचन को काशी में लम्बा समय बिताने के बावजूद उन्हें काशी की बोली में बोलते हुए शायद ही किसी ने सुना हो. बनारसी मस्ती के साथ बिताए कई दशकों की बनारसी-जिन्दगी उनके साॅनेट और स्वभाव में तो झलकती रही है- ‘रोज-रोज ताजा है कभी नहीं है बासी. आन बान में, कबिरा तुलसी की यह काशी.’ कवि त्रिलोचन मन की तरंग पर थिरकने वाले विरल व्यक्ति रहे हैं. उनकी बेलाग टिप्पणियां, व्यंग्य की महीन धार, विनम्र हंसमुख स्वभाव, सदा चैकन्ना रहने वाले, पारदर्शी इतने कि मानों बहता हुआ निर्मल जल. अक्सर ठठाकर हंस पड़ने वाले त्रिलोचन को ‘सचल-विश्वकोष’ कहना अतिषयोक्ति नहीं होगी. यह दूसरी बात है कि अपनी जवानी में एक सेर भिगोया हुआ चना या सेर-सेर आटे की रोटियां अथवा शर्त पर साठ-साठ रोटियां खाने वाले .ित्रलोचन विश्वसनीय भले न लगे लेकिन उनकी कद-काठी से मुझे तो वे गप्पी कभी नहीं लगे. ऐसे में तत्कालीन शास्त्रीजी को कौन चुनौती देने का साहस करता. ‘राम की शक्ति पूजा’ की सस्वर आवृति त्रिलोचन के बूते की ही बात रही है. कवि निराला को मैंने कभी नहीं सुना.

मैंने चैताल के रचयिता गायक निर्बाध गति से बोलने वाले त्रिलोचन का सान्निध्य अल्पकाल के लिये भले ही पाया है, सौभाग्यशाली तो हूं ही. बनारस छूटा तो कायिक तौर पर त्रिलोचन भी छूट गये थे. और फिर त्रिलोचन से भी तो काशी छूट गई थी. अंततः धरती भी छूटी लेकिन ‘धरती’ की कविताएं ब्रह्माण्ड में गूंजती रहेंगी? अनंतकाल तक.

(सुधेंदु पटेल की फेसबुक वाल से)

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.