/पत्रकार अकरम हत्याकांड का मुख्य आरोपी गिरफ्तार, कैमरे के बैग को समझा था नोटों की थैली

पत्रकार अकरम हत्याकांड का मुख्य आरोपी गिरफ्तार, कैमरे के बैग को समझा था नोटों की थैली

उत्तर-पूर्वी दिल्ली पुलिस ने ई-टीवी के पत्रकार अकरम लतीफ की हत्या के मुख्य आरोपी आसिफ उर्फ लंबू को गिरफ्तार कर लिया है। अकरम की 5 अगस्त को जाफराबाद थाने से कुछ ही दूरी पर गोली मारकर  हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने पहले ही छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था, परन्‍तु इस हत्या को अंजाम देने वाला मुख्य आरोपी आसिफ अली उर्फ लंबू उर्फ मुल्ला (27 वर्ष) पुलिस पकड़ से बाहर था। सोमवार को पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर आसिफ को भी गिरफ्तार कर लिया, उसके पास से एक जिंदा कारतूस और देसी कट्टा मिला है।

पुलिस ने बताया कि आसिफ को एक सूचना के बाद जाफराबाद इलाके से पकड़ा गया। वह दरियागंज का रहने वाला है। पुलिस ने बताया कि आसिफ ही  हत्याकांड का मुख्य आरोपी था। गौरतलब है कि यूपी के अमरोहा के रहने वाले ईटीवी उर्दू के पत्रकार अकरम लतीफ 5 अगस्त को एक राजनेता के यहां इफ्तार की कवरेज करने दिल्ली आए हुए थे, वेलकम थाना क्षेत्र के जाफराबाद में अज्ञात बदमाशों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी।

पुलिस ने बताया कि यह हत्या पत्रकार के पास पैसा होने के भ्रम में की गई। दरअसल अकरम अमरोहा के एक बड़े कारोबारी परिवार से थे और इस सिलसिले में सौदों की बातचीत से भी जुड़े रहते थे। पुलिस के अनुसार अकरम जब अमरोहा से बस में आ रहे थे तो फोन पर वह किसी से लाखों रुपयों की बात कर रहे थे। उस दिन बस में आसिफ के साथ कई अन्य बदमाश भी सफर कर रहे थे। उन्होंने फोन पर लाखों रुपये की बातें सुनी थी। अकरम के पास मोटी रकम होने के संदेह में इन बदमाशों ने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर जाफराबाद थाने के पास अकरम को गोली मार दी थी तथा उनका बैग लेकर फरार हो गए थे। अकरम को जीटीबी अस्‍पताल पहुंचाया गया परं‍तु उनकी मौत हो गई थी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.