/सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अटक सकता है महान कोल का भविष्य..

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अटक सकता है महान कोल का भविष्य..

सिंगरौली, सुप्रीम कोर्ट द्वारा आज कोयला घोटाले की सुनवाई करते हुए दिए गए एक फैसले ने महान कोल के भविष्य पर भी तलवार लटका दी है. आज कोयला घोटाले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से 2010 तक किये गए सभी कोल ब्लॉक आवंटन को अवैध घोषित कर दिया है. वहीं इनके आवंटन को रद्द करने पर फैसला 1 सितम्बर को सुनाया जाएगा.Mahan

ग्रीनपीस ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि कोयला घोटाले की अवधि में हुए सभी आवंटन को रद्द कर देना जाना चाहिए.

ग्रीनपीस की कैंपेनर अरुंधती मत्थु ने कहा, “काफी समय से ग्रीनपीस कोयला खदान आवंटन में बरते गये अनियमिततओं पर सवाल उठाता रहा है. दुर्भाग्य से इन परियोजनाओं को देर से पर्यावरण मंजूरी मिलने पर इसे व्यवस्थागत बाधा माना गया लेकिन आज यह साबित हो गया कि इस देश में कोयला संकट भ्रष्टाचार और औद्योगिक नीतियों का नतीजा है.”

सुप्रीम कोर्ट ने स्क्रीनिंग कमिटी के द्वारा दिये गए सारे आवंटन को अवैध बताया है. सिंगरौली के महान कोल ब्लॉक को भी इसी अवधि में आवंटित किया गया था. महान कोल के मामले में भी कोयला मंत्रालय के स्क्रीनिंग कमिटि के मिनट्स और सीएजी कागजात बताते हैं कि महान का आवंटन एस्सार और हिंडाल्को को 1 मार्च 2005 में 27वें स्क्रीनिंग कमिटि बैठक में लिया गया, लेकिन आरटीआई से मिले कॉपी से पता चलता है कि एस्सार महान के पक्ष में नहीं था.

मुत्थु बताती हैं, “सिर्फ हिंडाल्कों महान के पक्ष में था. मध्यप्रदेश सरकार ने ऑन रिकॉर्ड कहा था कि यह खदान मध्यप्रदेश खनिज विकास कॉर्पोरेशन को दिया जाना चाहिए. हमारे पास उस बैठक की मिनट्स है. हमारे उस आरटीआई का जवाब नहीं दिया गया जिसमें हमने जानना चाहा कि आखिर क्यों मध्यप्रदेश सरकार ने एस्सार के पक्ष में अपने फैसले को बदला.”

औद्योगिक समूहों को फायदे पहुंचाने के लिए महान क्षेत्र के 54 गांव के 50 हजार से अधिक लोगों की जीविका को खत्म किया जा रहा है. मुत्थु ने कहा कि, “इन सबमें फायदा एस्सार और हिंडाल्कों को ही होगा. इसलिए जबतक आवंटन को लेकर कोई फैसला नहीं आ जाता हमें नये कोयला खदानों के आवंटन तथा उनके पर्यावरण मंजूरी पर तत्काल रोक लगाने की जरुरत है.”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.