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धर्मनिरपेक्षता किसी भी राष्ट्र की अस्मिता की शान होती है..

By   /  August 27, 2014  /  1 Comment

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-शेष नारायण सिंह।।

धर्मनिरपेक्षता की राजनीति किसी भी समुदाय पर एहसान नहीं होता। किसी भी देश के नेता जब राजनीतिक आचरण में धर्मनिरपेक्षता को महत्वपूर्ण मुक़ाम देते हैं तो वे अपने राष्ट्र और समाज की भलाई के लिए काम कर रहे होते हैं। धर्मनिरपेक्षता का साधारण अर्थ यह है कि धर्म के आधार पर किसी को लाभ या हानि न पंहुचाया जाए। जब भी धर्म के आधार पर हानि या लाभ पंहुचाने की कोशिश शासक वर्ग करता है तो समाज को और राष्ट्र को भारी नुकसान होता है। भारत और पाकिस्तान को अंग्रेजों से आज़ादी एक ही साथ मिली थी . लेकिन भारत दुनिया में आज एक बड़ी ताक़त के रूप में उभर चुका है और अमरीका समेत सभी देश भारत को सम्मान की नज़र से देखते हैं लेकिन पाकिस्तान की हालत बिलकुल अलग है . वहाँ अगर अमरीका और पश्चिम एशिया के देशों से आर्थिक मदद न मिले तो बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी परेशानी पड़ सकती है. भारत को धमकाने के लिए चीन भी पाकिस्तान की मदद करता रहता है . ऐसा इसलिए है कि आज़ादी के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता अपनाया और पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिनाह की एक न चली और पाकिस्तान धर्म पर आधारित राज्य बन गया। और पाकिस्तान दुनिया के बाक़ी संपन्न देशों पर निर्भर हो गया। अमरीकी और चीनी मदद का नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान की निर्भरता इन दोनों देशों पर बढ़ गयी है . पूरे पाकिस्तान में चीन ने सडकों , बंदरगाहों और बिजली के उत्पादन केन्द्रों का ऐसा जाल बिछा दिया है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बुनियादी ढांचों का क्षेत्र लगभग पूरी तरह से चीन की कृपा का मोहताज है . अब तो पूरी दुनिया में यह कहा जाता है कि पाकिस्तान वास्तव में आतंकवाद की नर्सरी है . जब अमरीका के शासकों को पाकिस्तानी आतंकवाद का इस्तेमाल पुराने सोवियत संघ और मौजूदा रूस के खिलाफ करना होता था तो वह आतंकवादियों को हर तरह की सहायता देता था . अमरीका को मुगालता था कि पाकिस्तान में वह जिस आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा था वह केवल एशिया में ही अमरीकी लाभ के लिए इस्तेमाल होगा लेकिन जब अमरीकी ज़मीन पर अल कायदा ने आतंकी हमला कर दिया तब अमरीका की समझ में आया कि आतंकवाद का कोई क्षेत्र नहीं होता और आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता . वह संगठन के सरगना की मर्जी के हिसाब से चलता है और उसके अलावा उसका और कोई काम नहीं होता . बहरहाल आज पाकिस्तान के आतंकवाद का डर पूरी दुनिया में है . भारत के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को अपने जीवन से सबसे अहम मौके पर आमंत्रित करके यह साबित करने की कोशिश की थी कि वह पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते रखना चाहते हैं लेकिन सबको मालूम है कि आतंकवादी संगठन किसी भी सरकार के अधीन नहीं होते .इसीलिये पाकिस्तान से होने वाले आतंकवादी हमलों में कोई कमी नहीं आयी और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा कि पाकिस्तान की तरफ से भारत में प्राक्सी युद्ध चल रहा है . और दोनों देशों के बीच हुई लड़ाइयों में जितने सैनिक मारे गए हैं उससे बहुत ज़्यादा भारतीय सैनिक पाकिस्तानी प्राक्सी युद्ध में मारे गए हैं .अब भारत में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बनी सरकार को पता चल गया है कि पाकिस्तान में आतंकवाद के तामझाम पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ का नहीं वहाँ की फौज का हुक्म चलता है और फौज के सबसे बड़े अधिकारियों को अभी १९७१ के युद्ध का अपमान हमेशा याद रहता है क्योंकि सन ७१ के आस पास ही आज के सभी पाकिस्तानी जनरलों को कमीशन मिला था और उनका पहला काम पाकिस्तानी सेना की हार के मलबे को संभालना था. इसके पहले के सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज़ कयानी ने तो कई बार मीडिया से कहा था कि वे भारत से १९७१ का बदला लेने के लिए तड़प रहे थे. ज़ाहिर है उनकी फौज भारतीय सेना से ज़मीनी लड़ाई में १९७१ की गति को ही प्राप्त होती इसलिए पाकिस्तानी सेना भारत में आतंकवाद के सहारे परेशानी खड़ी करने की कोशिश करती रहती थी . पाकिस्तान में तथाकथित डेमोक्रेसी वाली सरकारों का पाकिस्तान की धार्मिक विचारधारा में पूरी तरह से घुल मिल चुकी फौज पर कोई असर नहीं पड़ता .i-day-_081513080925

भारत की मौजूदा सरकार अब आतंकवाद खत्म करने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पर निर्भर नहीं कर रही है . वह अंतर्राष्ट्रीय जनमत को पाकिस्तान में पलने वाले आतंकवाद के खिलाफ तैयार कर रही है . शायद इसी कूटनीतिक राणनीति के तहत अफगानिस्तान में भारत के राजदूत ने एक टी वी चैनल को बताया कि ,” यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि अफगानिस्तान में आतंक फैलाने वाले आतंकवादी पाकिस्तान से आते हैं “ . आज पाकिस्तान धार्मिक आधार पर आतंकवाद के मोबिलाइजेशन का सबसे बड़ा केन्द्र है . इसका कारण यह है कि पाकिस्तान ने एक राष्ट्र के रूप में शुरुआत तो सेकुलर तरीके से की थी लेकिन उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह की राजनीति को बाद के शासकों ने पूरी तरह से तबाह कर दिया और इस्लाम पर आधारित राजनीति की शुरुआत कर दी .धर्मनिरपेक्षता को भुला कर इस्लामिक राज्य की स्थापना करने के बाद पाकिस्तान को किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा है उसको जानने के लिए पाकिस्तान के पिछले पैंतीस वर्षों के इतिहास पर नज़र डालना ही काफी है . हमारे अपने देश में सेकुलर राजनीति का विरोध करने वाले और हिन्दुराष्ट्र की स्थापना का सपना देखें वालों को पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति से हुई तबाही पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए .

पकिस्तान की आज़ादी के वक़्त उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने साफ़ ऐलान कर दिया था कि पाकिस्तान एक सेकुलर देश होगा .ऐसा शायद इसलिए था कि १९२० तक जिन्नाह मूल रूप से एक सेकुलर राजनीति का पैरोकार थे . उन्होंने १९२० के आंदोलन में खिलाफत के धार्मिक नारे के आधार पर मुसलमानों को साथ लेने का विरोध भी किया था लेकिन बाद में अंग्रेजों की चाल में फंस गए और लियाकत अली ने उनको मुसलमानों का नेता बना दिया .नतीजा यह हुआ कि १९३६ से १९४७ तक हम मुहम्मद अली जिन्नाह को मुस्लिम लीग के नेता के रूप में देखते हैं जो कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी साबित करने के चक्कर में रहते थे . लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के पास था और उन्होंने कांग्रेस को किसी एक धर्म की पार्टी नहीं बनने दिया . लेकिन जब पाकिस्तान की स्थापना हो गयी तब जिन्नाह ने ऐलान किया कि हालांकि पाकिस्तान की स्थापना इस्लाम के अनुयायियों के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा .अपने बहुचर्चित ११ अगस्त १९४७ के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा के अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा कि ,” आप अब आज़ाद हैं . आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए . आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका पाकिस्तान के राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है .अब हम सभी एक ही देश के स्वतन्त्र नागरिक हैं . ऐसे नागरिक , जो सभी एक दूसरे के बराबर हैं . इसी बात को उन्होंने फरवरी १९४८ में भी जोर देकर दोहराया . उन्होंने कहा कि कि, “ किसी भी हालत में पाकिस्तान धार्मिक राज्य नहीं बनेगा . हमारे यहाँ बहुत सारे गैर मुस्लिम हैं –हिंदू, ईसाई और पारसी हैं लेकिन वे सभी पाकिस्तानी हैं . उनको भी वही अधिकार मिलेगें जो अन्य पाकिस्तानियों को और वे सब पाकिस्तान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें .” लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया . पहले चुनाव के बाद ही वहाँ बहुमतवादी राजनीति कायम हो चुकी थी और उसी में एक असफल राज्य के रूप में पाकिस्तान की बुनियाद पड़ चुकी थी. १९७१ आते आते तो नमूने के लिए पाकिस्तानी संसद में एकाध हिंदू मिल जाता था वर्ना पाकिस्तान पूरी तरह से इस्लामी राज्य बन चुका था. अलोकतांत्रिक धार्मिक नेता राजकाज के हर क्षेत्र में हावी हो चुके थे.

लेकिन असली धार्मिक कट्टरवाद की बुनियाद जनरल जियाउल हक़ ने डाली . उनको अपने पूर्ववर्ती शासक जुल्फिकार अली भुट्टो की हर बात को गलत साबित करना था लिहाजा उन्होंने पाकिस्तान की सभी संस्थाओं का इस्लामीकरण कर दिया . उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो की रोटी ,कपड़ा और मकान की राजनीति को साफ़ नकार दिया . उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की स्थापना ही इस्लाम के कारण हुई थी ,यह मुसलमानों के लिए बनाया गया था . जनरल जिया ने २ दिसंबर १९७८ को इस्लामी नववर्ष के मौके पर पाकिस्तान में इस्लामी सिस्टम को लागू कर दिया. उन्होंने तब तक के सभी पाकिस्तानी सेकुलर कानूनों को खत्म कर दिया और ऐलान किया कि वे निजामे-मुस्तफा लागू कर रहे थे . उन्होंने शरिया अदालतें स्थापित करने का ऐलान कर दिया . लेकिन सभी कानून तो फ़ौरन बदले नहीं जा सकते थे लिहाजा जनरल जिया ने आर्डिनेंस लागू करके अपनी गद्दी की सुरक्षा का बंदोबस्त कर लिया. इस दिशा में पहला कानून था हुदूद आर्डिनेंस . इसके ज़रिये ताजिराते पाकिस्तान में बताए गए संपत्ति कानूनों को बदलने की कोशिश की गयी . पूरी तरह बदल तो नहीं सके क्योंकि इस्लामी सबूत के नियमों के आधार पर सज़ा दे पाना असंभव था . दूसरा बदलाव बलात्कार और व्यभिचार के कानून में किया गया इसके ज़रिए तो पूरे पाकिस्तान में औरतों को गुलाम से भी बदतर बना दिया गया .अपनी इसी इस्लामीकरण की योजना के तहत ही धार्मिक शिक्षण के केन्द्रों का बड़े पैमाने पर विकास किया गया. पाकिस्तानी समाज में मदरसों के मालिकों का अधिकार और प्रभाव बहुत बढ़ गया . संगीत में भी भारी बदलाव किया गया . पाकिस्तानी रेडियो और टेलीविज़न पर केवल देशभक्ति के गाने ही बजाये जाते थे.कुल मिलकर ऐसा पाकिस्तान बना दिया गया जिसमें धार्मिक कट्टरता और बहुमतवाद का ही राज था . आज पाकिस्तान की जो दुर्दशा है उसमें जनरल जिया के उसी धर्मिक राज कायम करने के उत्साह को ज़िम्मेदार माना जा सकता है.

आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमत वाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है . भारत की सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेता भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते पाए जा रहे हैं . उनको भी ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती . अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं . लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये. जवाहरलाल नेहरू के युग तक तो किसी की हिम्मत नहीं पडी कि धार्मिक समूहों का विरोध करे या पक्षपात करे लेकिन उनके जाने के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति ने अपने देश में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ी और आज राजनीतिक प्रचार में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पक्षधरता की बात करना राजनीति की प्रमुख धारा बन चुकी है। कहीं मुसलमानों को अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जाती है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं का नेता बनने की होड़ लगी हुयी है। इससे बचना पडेगा। अगर न बच सके तो राष्ट्र और देश के सामने मुश्किल पेश आ सकती है।

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  • Published: 3 years ago on August 27, 2014
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  • Last Modified: August 27, 2014 @ 1:39 pm
  • Filed Under: दुनियां

1 Comment

  1. Kiran Yadav says:

    bada bachkana lekh hai kisi bhi wyakti ya rastra ko aage badane ke liye ek wichaar ki awashykta hoti hai hai jo ki dharmnirpekshta se nahi paya jaskat aur doosaron ko haani pahuchaaye bina apane ko mazboot karna hi asali dharmnirpekshta hai aur agar usame koi roda banta hai to usako samool nasht karane me hi desh aur samaaj ki bhalaayi hai

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