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कुश्ती के महान खिलाड़ी थे गुरू हनुमान..

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-रमेश सर्राफ धमोरा||
झुंझुनू, भारतीय कुश्ती के पितामह गुरू हनुमान के कुश्ती अखाडे को सरकार ने 29 अगस्त को खेल दिवस के दिन राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार से सम्मानित कर भारतीय कुश्ती के पितामह गुरू हनुमान को सच्ची श्रृधांजली दी है. खेल मंत्रालय के अनुसार गुरू हनुमान अखाड़े को खेल अकादमियों और प्रबंधन के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने के लिए इस वर्ष राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किया गया . राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी खेल दिवस के दिन यह पुरस्कार अन्य राष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ राष्ट्रपति भवन में प्रदान किया.GURU HANUMAN-1

भारत में कुश्ती गांव-गांव में प्रचलित है. हर गांव में सुबह और शाम नवयुवक अखाड़े में व्यायाम करते मिल जाते हैं, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की इसमें कोई पहचान नहीं थी. इस पहचान को दिलाने का श्रेय गुरु हनुमान को है. उनका असली नाम विजय पाल था. भारतीय मल्लयुद्ध के आदर्श देवता हनुमान जी से प्ररित होकर विजय पाल ने अपना नाम बदल कर हनुमान रखा और आजीवन ब्रह्मचारी रहने का प्रण कर लिया. उनके स्वयं के कथन के अनुसार उनकी शादी तो कुश्ती से ही हुई थी. इस बात में कोई अतिशयोक्ति भी नहीं थी क्योंकि जितने भी पहलवान उनके सानिध्य में आगे निकले उनमें शायद ही किसी को उतना सम्मान मिला हो, जितना गुरु हनुमान को मिला.
गुरू हनुमान जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिले के चिड़ावा में 15 मार्च, 1901 को एक निर्धन परिवार में हुआ था. निर्धनता और परिवार में शिक्षा के प्रति जागरूकता के अभाव में उनकी स्कूली शिक्षा बिल्कुल नहीं हुई, पर गांव के अखाड़े में कुश्ती के लिए वे नियमित रूप से जाते थे. 1920 में गुरू हनुमान रोजगार की तलाश में दिल्ली आकर उन्होंने सब्जी मंडी में बिड़ला मिल के पास दुकान खोली. उनके कसरती शरीर को देखकर 1925 में मिल के मालिक व झुंझुनू जिले के पिलानी कस्बे के मूल निवासी श्री कृष्ण कुमार बिड़ला ने उन्हें एक भूखण्ड देकर कुश्ती के लिए नवयुवकों को तैयार करने को कहा. इस प्रकार स्थापित हुयी बिड़ला मिल व्यायामशाला ही आगे चलकर गुरु हनुमान अखाड़ा के नाम से लोकप्रिय हुई.

गुरु हनुमान देश के प्रख्यात कुश्ती प्रशिक्षक तो थे ही, स्वयं बहुत अच्छे पहलवान भी थे. उन्होंने सम्पूर्ण विश्व् में भारतीय कुश्ती को महत्वकपूर्ण स्थान दिलाया. अपने शिष्यों को ही वे पुत्रवत स्नेह करते थे. वे पूर्ण शाकाहारी थे तथा इस मान्यता के विरोधी थे कि मांसाहार से ही शक्ति प्राप्त होती है. वे प्रात: तीन बजे उठ कर शिष्यों के प्रशिक्षण में लग जाते थे. उनके अखाड़े के छात्र अपना भोजन स्वयं बनाते थे. अनुशासनप्रिय गुरु जी दिनचर्या में जरा भी ढिलाई पसंद नहीं करते थे. गुरू हनुमान स्वाधीनता संग्राम में भी सक्रिय थे. अनेक फरार क्रांतिकारी उनके पास आश्रय पाते थे. 1940 में एक क्रांतिकारी की तलाश में पुलिस ने अखाड़े में छापा मारा, पर गुरु जी ने उसे पुलिस को नहीं सौंपा. इससे चिढकऱ पुलिस उन्हें ही पकडकऱ ले गयी. उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गयीं. कई घंटे तक कुएं में उल्टा लटका कर रखा गया, पर गुरु जी विचलित नहीं हुए.

1947 के बाद उनका अखाड़ा उत्तर भारत के पहलवानों का तीर्थ बन गया, पर गुरु जी ने उसे कभी व्यावसायिक नहीं होने दिया. धीरे-धीरे उनके शिष्य खेल प्रतियोगिताएं जीतने लगे, पर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के नियम अलग थे. वहां कुश्ती भी रबड़ के गद्दों पर होती थी. गुरु हनुमान ने उन नियमों को समझकर अपने पहलवानों को वैसा ही प्रशिक्षण दिया. इससे उनके शिष्य उन प्रतियोगिताओं में भी स्थान पाने लगे.

गुरु जी ने कलाई पकड़ जैसे अनेक नये दांव भी विकसित किये. विपक्षी काफी प्रयास के बाद भी जब कलाई नहीं छुड़ा पाता था, तो वह मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाता था. इसी समय वे उसे चित कर देते थे. उनका यह दांव बहुत लोकप्रिय हुआ. उनके अखाड़े को विशेष प्रसिद्धि तब मिली, जब 1972 के राष्ट्रमंडल खेलों में उनके शिष्य वेदप्रकाश, प्रेमनाथ और सुदेश कुमार ने स्वर्ण पदक जीता. इसी प्रकार 1982 के एशियायी खेलों में उनके शिष्य सतपाल एवं करतार सिंह ने स्वर्ण पदक जीता. 1986 में भी उनके शिष्य दो स्वर्ण पदक लाये. सात शिष्यों ने भारत की सर्वश्रेष्ठ कुश्ती प्रतियोगिताएं जीतीं. उनके आठ शिष्यों को भारत में खेल के लिए दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ अर्जुन पुरस्कार मिला. 1988 में भारत सरकार ने उन्हें खेल प्रशिक्षकों को दिये जाने वाले द्रोणाचार्य पुरस्कार से तथा 1983 में पदम श्री से सम्मानित किया.
भारतीय कुश्ती के पितामह गुरू हनुमान को 1960 में राष्ट्र गुरू, 1982 में राजस्थान श्री, 1983 में पद्मश्री, 1987 में द्रोणाचार्य,1989 में भीष्म पितामह और 199. में छत्रपति साहू अवार्ड प्रदान किया गया था. इसके अलावा गुरू जी को फ्रांस में 1980 में डिप्लोमा आफ आनर, जापान ने 1981 में लार्ड बुद्धा अवार्ड,पाकिस्तान ने 1989 में कुश्ती खुदा पुरस्कार, जपान ने 199. में मास्टर डिग्री ब्लैक बेल्ट, अमेरिका ने 199. में कुश्ती किंग अवार्ड और इंग्लैंड ने 199. में शहीद उधम सिंह अवार्ड प्रदान किया था.
गुरू हनुमान और उनके परम शिष्य तथा.982 के एशियाई खेलों के स्वर्ण विजेता महाबली सतपाल को 1983 में एक साथ पद्मश्री से सम्मानित किया गया था जबकि करतार सिंह को 1986 में पद्मश्री सम्मान मिला था. इस अखाडे से सुखचैन को 2003, महासिंह राव को 2005, जगमन्दर सिंह को 2007, सतपाल को 2009 में द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला था जबकि राज सिंह को 2013 में लाइफटाइम द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला था.

गुरु हनुमान एक गुरु ही नहीं बल्कि अपने शिष्यों के लिए पिता तुल्य थे. कुश्ती का जितना सूक्ष्म ज्ञान उन्हें था शायद ही किसी को हो! गुरु हनुमान ने जब ये देखा की उनके पहलवानों को बुढ़ापे में आर्थिक तंगी होती है तो उन्होंने सरकार से पहलवानों के लिए रोजग़ार के लिए सिफारिश की परिणामस्वरुप आज बहुत से राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतने वाले पहलवानों को भारतीय रेलवे में हाथों हाथ लिया जाता है. इस तरह उन्होंने हमेशा अपने शिष्यों की सहायता अपने बच्चो के समान की. उनका रहन सहन बिल्कुल गाँव वालों की तरह ही था. उन्होंने अपने जीवन के तमाम वर्ष एक धोती कुरते में ही गुजर दिए. भारतीय स्टाइल की कुश्ती के वे माहिर थे, उन्होंने भारतीय स्टाइल और अंतर्राष्ट्रीय स्टाइल का मेल कराकर अनेक एशियाई चैम्पियन दिए.

गुरू हनुमान को शायद अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था. इसी कारण उन्होने अपने जीते जी अपनी कर्मस्थली दिल्ली के गुरु हनुमान अखाड़ा व अपनी जन्म भूमि चिड़ावा में अपनी आदमकद प्रतिमा लगवा दी थी. चिड़ावा में तो उनकी मृत्यु से एक सप्ताह पूर्व ही 16 मई 1999 को पूर्व केन्द्रीय मंत्री शीशराम ओला व डा.गिरिजा व्यास के हाथों उनकी मूर्ति का अनावरण किया गया था.

24 मई, 1999 को गुरु जी गंगा स्नान के लिए हरिद्वार जा रहे थे. मार्ग में मेरठ के निकट उनकी कार का टायर फटने से वह एक पेड़ से टकरा गयी. इस दुर्घटना में ही उनका देहांत हो गया. उनके शिष्य तथा नये पहलवान आज भी उस अखाड़े की मिट्टी को पवित्र मानकर माथे से लगाते हैं. गुरू हनुमान की स्मृति में हर वर्ष सरकारी स्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय कुश्ती दंगल स्पर्धा आयोजित की जानी चाहिये ताकि आने वाली पीढ़ी के खिलाड़ी भी गुरू हनुमान से प्ररणा लेते रहें व उनके बताये मार्ग पर चलकर दुनिया में देश का नाम गौरवान्वित कर सकें.

गरू हनुमान की इच्छा थी कि दिल्ली के गुरु हनुमान अखाड़ा की तरह ही चिड़ावा में भी कुश्ती के खिलाड़ी तैयार हो इस लिये उन्होने चिड़ावा में भी कुश्ती अखाड़ा स्थापित किया था व चिड़ावा में बड़े स्तर पर कुश्ती दंगल का आयोजन भी करवाया था जिसमें उस वक्त के राजस्थान के खेल मंत्री भंवरलाल शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में आये थे. मगर गुरू हनुमान की आकस्मिक मौत हो जाने के बाद उनके शिष्यों का पूरा ध्यान दिल्ली के अखाड़े तक ही सिमट कर रह गया फलस्वरूप चिड़ावा का गुरू हनुमान अखाड़ा बनने से पूर्व ही बदतर स्थिति में पहुंच गया है. यदि समय रहते इस अखाड़े पर ध्यान नहीं दिया गया गुरू हनुमान का अपनी जन्म भूमि चिड़ावा में एक बड़ा कुश्ती अखाड़ा स्थापित करने का सपना टूट जायेगा.

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