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बड़े खतरे हैं इस राह में..

– भावना पाठक||
बाबू जी धीरे चलना … बड़े धोखे हैं इस राह में. ये गाना बड़ी तेज़ी से लोकप्रिय होती जा रही वर्चुअल दुनिया के वर्चुअल रिश्तों पर सटीक बैठता है. खुल जा सिमसिम की तरह इंटरनेट पर महज़ एक क्लिक करके आप इस जादुई दुनिया में पहुँच सकते हैं. जहाँ आपके पास ऑनलाइन शॉपिंग, चैटिंग, गेम खेलने से लेकर सोशल मीडिया के ज़रिये हज़ारों लोगों तक पहुचने के ढेरो रास्ते खुले हैं. इन सभी विकल्पों में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हो रहा है वर्चुअल रिश्ता. जहां इंटरनेट के ज़रिये आप अपने देश के साथ साथ विदेश में भी बैठे किसी भी शख़्स से दोस्ती कर सकते हैं. वर्चुअल रिश्तों की ये दुनिया १२-१८ साल के बच्चों और युवाओं को बड़ी रास आ रही है. खासकर छोटे शहर, कस्बों और गावों के युवाओं को. पर शहरी युवाओं का एक तबका ऐसा भी है जिसका वर्चुअल दुनिया और वर्चुअल रिश्तों से मोह भंग होता जा रहा है. उनकी नज़र में वर्चुअल रिश्ते फ़र्ज़ी होते है. वो दोस्त ही कैसा जो वक़्त पर काम न आये और मदद की उम्मीद आप वर्चुअल दोस्त से नहीं कर सकते. लेकिन बच्चे चाहे गांव के हो या शहर के अगर इंटरनेट उनकी पहुंच में है तो इस दुनिया के लिए उनकी दीवानगी देखते ही बनती है.social_media

हाल ही में इंदौर में हुए एक सर्वे में ये सामने आया कि १४-१८ साल के बच्चे १८-२० घंटे ऑनलाइन रहते हैं और कई बच्चों के फेसबुक पर अकाउंट हैं. हालांकि कई स्कूलों में फ़ोन ले जाना मना है लेकिन फिर भी बच्चे चोरी-छुपे फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं. स्कूल में फ़ोन पर प्रतिबन्ध लगाने से भी क्या होगा, बच्चे घर आकर फ़ोन से चिपक जाएंगे. बच्चों को सोशल साइट्स पर अपनी फोटो अपलोड करना, अपनी गतिविधियों का स्टेटस अपडेट कर उसपर दोस्तों के लाइक्स और कमेंट्स देखना, नए नए लोगों से चैट करना अच्छा लगता है. अब तो बहुत जल्द प्रधानमंत्री जी ने भी अपने देश को डिजिटल इंडिया बनाने का वादा किया है यानि अब वर्चुअल दुनिया में हमारी हिस्सेदारी और भी ज़्यादा बढ़ जायेगी और हम वर्चुअल रिश्तेदारी बखूबी निभा सकते हैं.

अब सवाल ये उठता है कि आखिर वर्चुअल दुनिया के लिए इतना आकर्षण क्यों ? पहली बात हर नयी चीज़ के प्रति आकर्षण ज़्यादा होता है. दूसरी बात एकल परिवार में माँ-बाप दोनों के नौकरी पर जाने के कारण बच्चे एकदम अकेले हो जाते हैं ऐसे में वो वर्चुअल दुनिया में अपना दोस्त तलाशना शुरू कर देते हैं और उनसे अपनी बातें शेयर करने लगते हैं क्यूंकि मम्मी पापा के पास तो उनसे बात करने का वक़्त होता नहीं. तीसरी बात हमारे पारम्परिक रिश्ते जैसे दादा-दादी , मौसा-मौसी, मामा-मामी, बुआ फूफा , नाना-नानी के पास जाने के लिए वक़्त भी चाहिए और पैसे भी और पारम्परिक रिश्तों में ख़ुशी और ग़मी दोनों में ही सामने वाले के घर हाजरी लगानी पड़ती है. आना जाना पड़ता है जबकि वर्चुअल रिश्ते में ऐसी किसी रस्मअदायगी की ज़रुरत नहीं इसलिए भी इस ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है. चौथी बात लोगों खासकर बच्चों को नए नए दोस्त बनाना, उनसे बातें करना अच्छा लगता है. ऑडियो और वीडियो शेयरिंग उनके लिए एकदम ही नया और रोमांचक अनुभव है. पांचवी बात स्मार्टफोन के ज़रिये इंटरनेट घर घर पहुंच गया है. आज सोशल साइट्स और व्हाट्स-अप, वाइबर, हाइक जैसे सोशल ऍप्स का इतेमाल स्टेटस सिंबल हो गया है. टीवी पर आने वाले विज्ञापन भी हमें इनकी ओर खींचते हैं.

इस बेतार वर्चुअल दुनिया से अपराधों के तार तेज़ी से जुड़ते जा रहे हैं. चोरी, डकैती, अपहरण, हत्या जैसे अपराधों को अंजाम देने के लिए फेसबुक जैसी सोशल साइट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है. ब्रिटेन, अमेरिका जैसे कई देशों में फेसबुक बच्चों और बड़ों की आत्महत्या का कारण बन चुका है. वे लोग जो घंटों सोशल साइट्स पर सक्रिय रहते हैं वे धीरे धीरे अपने आसपास की दुनिया से अलग-थलग होते जाते हैं और एक समय ऐसा आता है जब वो डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं. इस वर्चुअल दुनिया में कोई भी फेक आई. डी. बनाकर आपको दोस्ती के जाल में फंसा सकता है. सोशल साइट पर आपकी प्रोफाइल पर जाकर आपकी पसंद-नापसंद के बारे में जानकर वो आपके मुताबिक़ आपसे बाते करके आपकी गुड बुक में शामिल हो सकता है और जब आप उसपर पूरी तरह से भरोसा करने लगे, उससे अपनी हर बात शेयर करने लगें यहां तक की पर्सनल फोटो और अपनी ज़िन्दगी के राज़ भी तब वो आपको इनके आधार पर ब्लैकमेल कर सकता है. आपकी पर्सनल फोटो और आपके सीक्रेट्स आपके जानने वालों को बताने की धमकी देकर आपसे रुपयों की मांग कर सकता है, आपका शोषण कर सकता है. हो सकता है आप जिसे लड़की समझकर घंटों बतियाती हों वो असल में लड़का हो जो अब आपके और आपके परिवार के बारे में सब कुछ जानता है और कभी भी आपको नुक्सान पहुंचा सकता है. यह भी हो सकता है की जिससे आपकी मुलाक़ात ऑनलाइन हुयी हो धीरे धीरे बातें करते करते वो आपको बहुत अच्छा लगने लगा हो और आप तो उसको लेकर सीरियस हों पर वो आपसे फ़्लर्ट कर रहा है और जब आपको इस सच्चाई का पता चले तो आपका दिल टूट जाए आप डिप्रेशन में चली जाएं, या फिर आत्महत्या की कोशिश करें. इस तरह की घटनाएं आये दिन सुनने को मिलती हैं.

यकीन मानिए ये सब बताकर मेरा मक़सद आपको ख़ौफ़ज़दा करना कतई नहीं है बल्कि मेरा इरादा आपको इस वर्चुअल दुनिया के खतरों से सचेत करना है. बड़ों को समझाना तो फिर भी आसान है पर बच्चों को समझाना ज़रा मुश्किल है पर इस डर से आप उन्हें इस दुनिया से ही रूबरू न होने दें ये ठीक नहीं है. वैसे भी आप उनपर बंदिश नहीं लगा सकते क्यूंकि अगर आप उन्हें स्मार्टफोन नहीं देंगे तो भी वो अपने दोस्तों के फोन या साइबर कैफ़े में जाकर इंटरनेट यूज़ कर सकते हैं. उनपर बंदिश लगाने के बजाये आप उन्हें इसके अच्छे बुरे दोनों पहलुओं से परिचित कराएं. आये दिन जो साइबर क्राइम के केस आ रहे हैं उनका उदाहरण देके समझाएं. बच्चों के दोस्त बन जाएँ. उनको ये यकीन दिलाएं की अगर उनसे कोई गलती हो भी गयी हो, कोई उन्हें सोशल साइट्स पर परेशान कर रहा हो, कोई उनकी मॉर्फ करके अश्लील फोटो लगा रहा हो तो वो उस बात को आपसे छुपाये नहीं बल्कि किसी नयी मुसीबत में पड़ने के बजाये आपसे अपनी प्रॉब्लम खुलकर बताएं. बच्चे बड़े ही जिज्ञासू होते है और वो बड़ी जल्दी बहकावे में आ जाते हैं इसलिए वो साइबर क्राइम का सॉफ्ट टारगेट होते हैं. इंटरनेट के ज़रिये मानव तस्करी को भी अंजाम दिया जा सकता है. संभव है की कोई आपके बच्चे का दोस्त बनकर उससे मिलने और घूमने के बहाने आपके शहर आये और मौका पाकर आपके बच्चे को अगवा कर ले जाए. परमाणु बमों के हमले से ज़्यादा खतरनाक है साइबर हमला. ऐसे में मीडिया लिटरेसी की भूमिका और भी बढ़ जाती है. क्यूंकि बच्चे और युवा साइबर अटैक के सॉफ्ट टारगेट होते हैं इसलिए मीडिया लिटरेसी की शुरुआत स्कूलों से ही हो जानी चाहिए. आपका मीडिया लिटरेट होना और भी ज़रूरी है क्यूंकि तभी आप अपने बच्चों को इस वर्चुअल दुनिया के अच्छे बुरे नतीज़ों से वाक़िफ़ करा पाएंगे.

 

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