/कॉफ़ी का बलात्कार..

कॉफ़ी का बलात्कार..

-सुखदीप सिंह||

अमरेन्द्र को अमेरिका आये दो साल हो गए थे अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन करने के लिए, कॉफ़ी उसकी शुरू से ही कमजोरी रही थी इसलिए उसने आते ही एक कॉफ़ी मशीन खरीद ली थी, रात के लगभग 11 बजे है, कल उसको अपना प्रोजेक्ट जमा करवाना है, पर उसका मन “कॉफ़ी” पीने का हो रहा है, वो उठता है किचन में जाता है, “कॉफ़ी” मशीन को ओन करता है, “कॉफ़ी” तैयार करता, इत्मीनान से “कॉफ़ी” को एन्जॉय करता है और वापिस आ कर अपने प्रोजेक्ट में मगन हो जाता है…coffee

अमरेन्द्र का बचपन के दोस्त दिनेश जिसने इंडिया में ही रहने का मन बना दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया और वो एक किराये का कमरा नीरज के साथ शेयर करता है, जो बहुत ही संस्कारी टाइप का है, बिना नहाए, पूजा पाठ किए कुछ खाता, पीता नहीं है. नीरज का अगले दिन फाइनल का इम्तिहान है। तैयारी करते करते रात के ग्यारह बजने को है. उसने अपनी किताब थोड़ी देर के लिए बाजू रख दी और तकिये के पास रखी भगवत गीता उठा ली. सोचा एक अध्याय पढ़ लूं, क्या पता कल भगवान् ही बेडा पार लगा दें. गीता पड़ते पड़ते उसके मन में “कॉफ़ी” पीने की तलब हुई, और ध्यान गीता पाठ से हट कर कॉफ़ी के बीच अटक गया. गीता का बचा पाठ बाद में पूरा कर लूं. पहले थोड़ी कॉफ़ी पी लूं. मगर यह तो पाप हो जाएगा. थोड़ी देर की ही तो बात है. अभी पाठ पूरा हो जाएगा फिर कॉफ़ी पी लूँगा. उसे अपने संस्कार याद आ गए, पर मन तो मन है, वो कहा टिकता है, उसे गीता में भी “कॉफ़ी” दिख रही है, पर मज़बूरी एक और भी है, “कॉफ़ी” बनाएगा कौन, नीरज को किचन के काम से शर्म भी आती थी ज़यादातर मर्दो की तरह और थोड़ा निठल्लापन भी है

खैर इसी कश्मकश में गीता के कई पन्ने पड़े जा चुके है, इतने में उसका रूम पार्टनर दिनेश कहीं बाहर से लौटा. शायद दूसरे शो की फिल्म देख कर आ रहा था. दिनेश ने नीरज को गीता का पाठ करते देख किचन में जा कर मशीन पर अपने लिए कॉफ़ी बनायी, कप में डाली, और टेबल पर रख बाथरूम की ओर बढ़ गया. लघु शंका निवारण के लिए. दिनेश का गीता का पाठ जारी है. मगर उसने नीरज को कॉफ़ी बनाते हुए और कॉफ़ी रख कर बाथरूम जाते हुए देख लिया. कॉफ़ी की मादक खुशबू उसके बर्दास्त के बाहर है. उसने गीता बाजू पर रख दी, नीरज का कप उठाया और कॉफ़ी गटक गया. और फिर से गीता का पाठ शुरू कर दिया

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सुखदीप सिंह

दिनेश वापस आया. उसने देखा कप खाली था. वह नीरज पर भड़का. “क्यों बे, मेरी कॉफ़ी क्यों पी?”
पहले तो नीरज ने ना-नुकर करनी शुरू की पर कोई चारा न देख बोला “पीता नहीं तो क्या उसे ठंडी करने छोड़ देता? आपने कॉफ़ी मेरे सामने क्यों रखी, और अगर रखनी थी तो इसको अच्छे से “ढक” कर रखना चाहिए था, ता के मेरी नज़र (बुरी) इस पे न पड़ती, चलो अगर आपने इतनी गलतिया की भी तो भाई आप इसको अकेले मेरे पास छोड़ क्यों गए, यह सब के लिए मैं नहीं आप जिम्मेवार हो, बल्कि आप ने तो एक और “पाप” कर दिया है, मेरा “पाठ” भंग कर दिया है, भगवान आपको कभी माफ़ नहीं करेंगे….” नीरज की आवाज में एक संस्कारी आत्मसम्मान से पूर्ण व्यक्ति की बुलंदी थी.

दिनेश ने “कॉफ़ी” का खाली कप उठाया और किचन में जाकर खाली कप की तरफ देखने लगा, नीरज की बातें उसके ज़ेहन में घूम रही थी,,, वो अपने आप को असहाए महसूस कर रहा था निर्भया के दोस्त की तरह जो ना अपने दोस्त को बचा पाया और न ही उसके पास नीरज के कुतर्को का कोई जवाब था.

(सुखदीप सिंह, IT व्यवसाय से जुड़े हुए है, और साथ ही मेंटर, लेखक और ब्लॉगर भी है।  चंडीगढ़ में जन्मे और पड़े बड़े हुए, सुखदीप को कॉलेज के दौरान ही लिखने का शोंक हुआ, लेकिन बिज़नेस में आने के बाद लिखना बंद कर बैठे, लेकिन पिछले कुछ समय में फेसबुक पे कुछ मित्तरो द्वारा प्रोत्साहित किये जाने के बाद, सुखदीप ने दुबारा लिखना शुरू किया है।  सुखदीप बहुत सारी सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों और संस्थाओ के साथ भी जुड़े हुए है>

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.