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सूरजगढ़ उप चुनाव से जुड़ी है भाजपा की प्रतिष्ठा..

By   /  September 5, 2014  /  No Comments

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-रमेश सर्राफ धमोरा||
झुंझुनू, 5 सितम्बर. राजस्थान के झुंझुनू जिले की सूरजगढ़ विधानसभा सीट से दिसम्बर 2013 में भाजपा टिकट पर विजयी हुयी संतोष अहलावत के सांसद बन जाने से रिक्त हुयी सीट पर आगामी 13 सितम्बर को उप चुनाव होने जा रहा है. भाजपा के लिये जहां आगामी उप चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल है वहीं कांग्रेस के लिये भी खोयी प्रतिष्ठा को फिर से पाने का सुनहरी मौका है.02-09-14 SURAJGARH CHUNAW

भाजपा ने यहां से पूर्व चिकित्सा मंत्री व 2013 के विधानसभा चुनाव में भरतपुर जिले के डीग-कुम्हेर से चुनाव हार चुके डा. दिगम्बर सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया है वहीं कांग्रेस ने गत विधानसभा चुनाव में भाजपा की संतोष अहलावत से 50 हजार 219 वोटो से हार चुके श्रवण कुमार को ही फिर से प्रत्याशी बनाया है. इनके साथ ही अब मैदान में कुल 9 उम्मीदवार बचे है जिनमें भाजपा के डॉ. दिगम्बर सिंह, कांग्रेस के श्रवण कुमार, मेघदेशम पार्टी की उर्मिला मेघवाल, सीपीआई (एमएल, लिब्रेशन ) के रामचन्द्र कुल्हरी, निर्दलीय उम्मीदवार अनिता, ईश्वर सिंह, नीता यादव, सुभाष खान्दवा तथा सुरेन्द्र है.

सूरजगढ़ विधानसभा क्षेत्र का इतिहास देखें तो यह क्षेत्र पहली बार 1962 अनुसूचित जाति के लिये सुरक्षित क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में आने के बाद से अब तक कुल बारह बार चुनाव हो चुके हैं. 1962 से 2003 तक यह अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित क्षेत्र रहा था. 1962 के प्रथम चुनाव में यहां से स्वतंत्र पार्टी के शिवनारायण छाछिया,1967 में स्वतंत्र पार्टी के सूरजमल,1972 में कांग्रेस के सुन्दरलाल,1977 में जनता पार्टी के सुभाषचन्द्र आर्य, 1980 में निर्दलिय सुन्दरलाल, 1985 में कांग्रेस के सुन्दरलाल, 1990 में जनता दल के बाबूलाल खाण्डा,1993 में निर्दलिय सुन्दरलाल, 1998 में कांग्रेस के हनुमान प्रसाद,2003 में भाजपा के सुन्दरलाल विजयी हुये. 2008 के विधानसभा चुनाव में सूरजगढ़ को सामान्य विधानसभा क्षेत्र घोषित कर दिया गया था. तब यहां से कांग्रेस के श्रवणकुमार विजयी हुये थे. 2013 में यहां से भाजपा की संतोष अहलावत जीती.

इस क्षेत्र से सर्वाधिक आठ बार चुनाव लडक़र पांच बार सुन्दरलाल विजयी रहे हैं. 1951 व 1957 के विधानसभा चुनाव में यह क्षेत्र खेतड़ी विधानसभा के साथ जुड़ा हुआ था व उस समय खेतड़ीव सूरजगढ़ क्षेत्र के सभी मतदाता मिलकर दो विधायक का चुनाव करते थे. एक सामान्य वर्ग का व दूसरा अनुसूचित जाति वर्ग का. 1951 व 1957 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के महादेव प्रसाद बंका इस क्षेत्र से अनुसूचित जाति वर्ग से विधायक के रूप में निर्वाचित हुये थे.

सूरजगढ़ विधानसभा क्षेत्र में फिलहाल 2 लाख 34 हजार 271 मतदाता है जिनमें एक लाख 12 हजार 962 महिला व एक लाख 21 हजार 309 पुरूष हैं. इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक जाट मतदाता हैं. उसके बाद यहां अनुसूचित जाति, राजपूत,यादव, बा्रम्हण,कुम्हार, बनिये,नाई,खाती,गुर्जर जाति के मतदाताओं की निर्णायक भूमिका है. यहां से चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी डा. दिगम्बर सिंह हालांकि जिले से बाहर के हैं, मगर वो दो बार कुम्हेर से विधायक रह चुके हैं तथा 2003 से 2008 तक भाजपा सरकार में प्रभावशाली मंत्री रहें हैं. डा. सिंह वर्तमान में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के अति निकटतम लोगों में शुमार होते हैं, इस लिये कयास लगाये जा रहें हैं कि यहां से चुनाव जीतने पर वो राजस्थान सरकार में केबीनेट मंत्री बनेगें. डा. दिगम्बर सिंह की व्यक्तिगत छवी साफ-सुथरी होने के चलते व उनके पक्ष में तीन दर्जन विधायक,आठ सांसद ,कई मंत्रियों के साथ भाजपा नेताओं की लम्बी -चौड़ी फौज प्रचार में लगी होने का लाभ उन्हे मिलता नजर आ रहा है. सांसद बनने पर सूरजगढ़ सीट छोडऩे वाली सांसद संतोष अहलावत भी पूरी ताकत से डा. दिगम्बर सिंह को चुनाव जीताने में जुटी हुयी है.

जहां भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में सैकडों नेता जुटे हैं वही कांग्रेस प्रत्याशी श्रवणकुमार को अकेले ही संघर्ष करना पड़ रहा है. उनके पास नेता तो क्या कार्यकर्ताओं तक का टोटा बना हुआ है. लगातार चार बार विधायक रह चुके श्रवणकुमार के सूरजगढ़ से पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा की संतोष अहलावत से 50219 वोटों से हार जाने के कारण उनकी छवी को काफी नुकसान पहुंचा हैं. गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रही राजबाला ओला ने श्रवण कुमार पर लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा के पक्ष में प्रचार करने का आरोप लगाया था. जब श्रवणकुमार अपना नामांकन दाखिल करने गये तो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह को छोड़ कर कोई भी कांग्रेस का बड़ा नेता उनके साथ नहीं था. जिले में कांग्रेस के एकमात्र विधायक विजेन्द्र ओला, लोकसभा में कांग्रेस प्रत्याशी रही डा.राजबाला ओला, जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष सहित कोई भी पदाधिकारी, जिले के मंडावा से पिछला चुनाव हारे हुये पूर्व प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष डा. चन्द्रभान,खेतड़ी से विधायक रहे पूर्व मंत्री डा. जितेन्द्र सिह,पूर्व विधायक प्रतीभा सिंह, जिला प्रमुख हनुमान प्रसाद भी अनुपस्थित थे. जबकि झुंझुनू जिला प्रमुख हनुमान प्रसाद 1998 व 2003 में दो बार कांगेस टिकट पर सूरजगढ़ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं व 1998 से 2003 तक सूरजगढ़ से कांग्रेस के विधायक रह चुके हैं.

निर्दलिय चुनाव लड़ रही नीता यादव 2004 से 2010 तक कांग्रेस टिकट पर प्रधान रह चुकी है. उन्होने 2008 का विधानसभा चुनाव बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़ा था तथा वर्तमान में कांग्रेस के सहयोग से जिला परिषद सदस्य है. नीता यादव ने 2013 के विधानसभा चुनाव व 2014 के लोकसभा चुनाव में खुलकर भाजपा प्रत्याशी संतोष अहलावत का साथ दिया था. 2008 के विधानसभा चुनाव में नीता यादव ने बसपा टिकट पर 28738 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रही थी,मगर उनके बार-बार पार्टी बदलने से क्षेत्र के मतदाताओं पर उनकी पकड़ कमजोर हुयी है. उनका वैसे भी कोई निजी वोट बैंक नहीं हैं बस अपनी जाति के यादव मतदाताओं के भरोसे ही जीत के सपने देख रही हैं. उनके काक स्वसुर हरियाणा में चौटाला के इनेलो पार्टी के विधायक हैं. नीता यादव के पक्ष में ओला गुट जुट सकता है. क्योंकि शीशराम ओला गुट में रह चुकी है नीता यादव. मगर वर्तमान में नीता यादव के साथ मजबूत कार्यकर्ताओं का साथ नजर नहीं आ रहा है.
इस क्षेत्र में मुख्य मुकाबला डा. दिगम्बर सिंह, श्रवण कुमार व नीता यादव के बीच ही होता नजर आ रहा है ,बाकी के अन्य छ: उम्मीदवारों का कोई प्रभाव नजर नहीं आता हैं. अब देखना है कि सूरजगढ़ विधानसभा क्षेत्र की जनता किसे अपना विधायक बनाती है प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा या कांग्रेस को या फिर निर्दलिय नीता यादव को यह भविष्य के गर्भ में है.

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  • Published: 6 years ago on September 5, 2014
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  • Last Modified: September 5, 2014 @ 1:18 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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