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चार सितंबर आर एन डी का जन्मदिन है..

By   /  September 4, 2014  /  No Comments

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-शेष नारायण सिंह||

आज ( ४ सितम्बर  ) आर एन द्विवेदी का जन्मदिन है . करीब डेढ़ दशक पूर्व हुए अपने स्वर्गवास के समय तक वे लखनऊ में समाचार एजेंसी यू एन आई के ब्यूरो चीफ थे . उनको उत्तर प्रदेश में नेता और पत्रकार आर एन डी कहकर संबोधित करते थे . उन दिनों टी वी  वालों का ज़माना नहीं था. प्रिंट के लोग ही होते थे.  आज के बहुत बड़े बड़े अखबार उन दिनों मामूली हैसियत के संगठन थे .RND PIC 2

आज यू एन आई एक खस्ताहाल एजेंसी के रूप में पंहुच चुकी है लेकिन उन दिनों यू एन आई और पी टी आई का वही जलवा होता था जो आजकल एबीपी न्यूज़ और आजतक का माना जाता है . मैंने उनको पहली बार उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री  स्व वीर बहादुर सिंह के यहाँ देखा था.  मुख्यमंत्री आवास पर कोई प्रेस कान्फरेंस थी.   पत्रकार वार्ता के घोषित समय के हिसाब से सभी पत्रकार और अफसर आ  चुके थे लेकिन वीर बहादुर सिंह इधर उधर की बातें कर रहे थे. कुछ देर बाद आर एन द्विवेदी आये और मुख्यमंत्री ने पत्रकार वार्ता में बोलना शुरू कर दिया . बाद में मैंने वीर बहादुर सिंह से पूछा कि किसका  इंतज़ार कर रहे थे .इतनी देर क्यों की? तो उन्होंने  रहस्य बताया . कहने लगे कि  बाकी अखबार वालों को कुछ नहीं पता . अगर यू एन आई नहीं लिखेगा तो कोई  नहीं छापेगा . यू एन आई की खबर हिंदी अंग्रेज़ी सब छापते हैं .वहीं मेरा उनसे औपचारिक परिचय हुआ था अ लेकिन एक बड़े पत्रकार से मुलाक़ात भर थी वह .

उसके बाद से मैं जब भी लखनऊ गया , उनसे मुलाक़ात हुई . किसी के साथ प्रेस क्लब जाना  होता तह और उनसे  दुआ सलाम हो जाती थी. आर एन डी को देखकर मुझे हमेशा लगता था कि  कितने भले आदमी थे वे. उनके पिता जी मध्य प्रदेश सरकार में बड़े अफसर थे, उनके ताऊ , पं मन्नू लाल द्विवेदी , जवाहरलाल नेहरू के साथ पहली,  दूसरी और तीसरी लोकसभा के सदस्य रह चुके थे . आर एन डी खुद भी  बी टेक पास  थे यानी क्वालीफाइड इंजीनियर . उन्होंने अच्छे पैसे वाली अफसरी की नौकरी को न करके पत्रकारिता का वरण किया था. उन दिनों , आज की तरह हर गली मोहल्ले में इंजीनियरिंग कालेज नहीं होते थे . बाक़ायदा मेहनत करके कठिन परीक्षा देकर बी टेक में एडमिशन मिलता  था. लेकिन उनके व्यक्तित्व में कहीं भी आभिजात्य का ठसका नहीं था. मेरे बहुत सारे दोस्त उनको बहुत सम्मान देते हैं . जब भी लखनऊ गया  उनसे  मुलाक़ात का मौक़ा लगा तो ज़रूर मिला. हिसाम सिद्दीकी, सुरेश बहादुर सिंह , अमान अब्बास , ज्ञानेंद्र शर्मा, कमर वहीद नकवी  , शैलेश जिस से भी उनकी चर्चा शुरू होती  है , सभी लोग  एक बेहतीन इंसान का ज़िक्र शुरू कर देते हैं . शायद यही वजह थी कि जब २००७ में जब हमारी दोस्त सलमा जैदी ने  बीबीसी के दिल्ली दफतर में   यह संभावना बताई कि उनकी बेटी से हमारे बेटे की शादी हो सकती है तो मुझे बहुत खुशी हुई. आर एन डी के बारे में सलमा जी ने जिस तरह से बातें कीं मुझे लगा कि इस दुनिया को छोड़  चुके अच्छे इंसान के बारे में उनके साथी कितनी मुहब्बत से बात करते हैं .   आर एन डी की बिटिया उन दिनों बीबीसी के दिल्ली कार्यालय मे काम करती थी और इंडिया बिजनेस हेड के पद पर तैनात थी .

 RND PICउत्तर प्रदेश के जिन नेताओं से भी उनका ज़िक्र हुआ सबने अच्छी बातें ही कीं . कल्याण सिंह ,मुलायम सिंह यादव , राजनाथ सिंह सभी उनको बहुत सम्मान देते थे. लेकिन इस आदमी ने सत्ता का कहीं भी लाभ नहीं लिया . अपनी दोनों बच्चियों की शादी के लिए चिंतित ज़रूर रहते थे लेकिन  उनके पुण्य का कमाल ही है कि उनके चले जाने के बाद भी दोनों ही लड़कियों की शादी बहुत अच्छे लड़कों से हो गयी है . एक लड़का आई आई एम का एम बी ए  है तो दूसरा आई आई टी का बी टेक.  उनके सद्कर्मों का फल है .

जब अपने दोस्त और उर्दू अखबार , सहाफत , के मालिक  अमान अब्बास की शादी के जश्न में शामिल होने के लिए लखनऊ गया तो  जो भी  बड़ा पत्रकार मिला सबने आर एन डी की बात की . उनकी याद की. उनके चाहने वाले आर एन डी की याद में कोई ऐसा काम करना चाह रहे हैं जो आने वाली पीढियां याद  रखेगीं . उनके कद के पत्रकार के लिए यह बिल्कल सही श्रद्धांजलि होगी 

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  • Published: 3 years ago on September 4, 2014
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  • Last Modified: September 5, 2014 @ 1:29 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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