/मंदिरों से हटाई जाने लगी है साईं बाबा की मुर्तियां, साईं भक्त नाराज़..

मंदिरों से हटाई जाने लगी है साईं बाबा की मुर्तियां, साईं भक्त नाराज़..

साईं को भगवान न मानने के धर्मसंसद का फैसला और उनकी मूर्तियों को मंदिरों से हटाए जाने के ऐलान का असर दिखने लगा है. साईं की प्रतिमा को मंदिरों से हटाया जाने लगा है. गाजियाबाद से लेकर उत्तराखंड के धौलेस्वर महादेव मंदिर तक से साईं की मूर्ति को हटा दिया गया है. कई और जगहों पर ऐसी ही तैयारी है. इसे लेकर साईं भक्तों ही नहीं, दूसरे आस्थावानों में भी गुस्सा है.saibaba

साईं की पूजा न करने और इसे मंदिरों से हटाकर नदियों में विसर्जित करने की अपील का असर अब अमल में लाया जाने लगा है. गाजियाबाद के मुरादनगर में गंगनहर के पास बने मंदिर से आज साईं की प्रतिमा हटा दी गई. छत्तीसगढ़ के कवर्धा में हुई धर्म संसद से 6 महीने के भीतर सभी सनातन मंदिरों से साईं मूर्ति हटाने की अपील की गई थी. अब कमेटी ने फैसला किया है कि सनातन धर्म मंदिरों की जांच की जाएगी और जहां भी मूर्तियां होंगी उसे हटा दिया जाएगा.

मुरादनगर से पहले उत्तराखंड के धौलेस्वर महादेव मंदिर से साईं की मूर्ति को हटा दिया गया. मध्य प्रदेश के बैतूल में रुक्मिणी बालाजीपुरम से साईं मूर्ति हटाने का ऐलान हो चुका है. वहीं गुजरात के वलसाड में मूर्ति हटाने को लेकर विवाद शुरू हो गया है.

13 अखाड़ों और चारों शंकराचार्य भले ही साईं को भगवान न मानने पर एकमत हों लेकिन कई आस्थावान साईं पूजा पर रोक लगाने और मूर्तियों को मंदिर से हटाने से सहमत नहीं. तभी तो, देहरादून से 20 किलोमीटर दूर शिवमंदिर से जैसे ही साईं की प्रतिमा हटी, गांव वालों के साथ ही मंदिर के लिए जमीन दान करने वाले तिरलोक सिंह रावत भी नाराज हो गए.

मंदिर से साईं की मूर्ति हटाने वाले संतों का कहना है कि और भी मंदिरों से साईं की मूर्तियां हटाई जाएंगी. शिव मंदिर से प्रतिमा हटाने के बाद संतों ने एक आयोजन करके साईं की मूर्ति उनके भक्तों को दान कर दी. लेकिन जिस तरह से मंदिर से मूर्ति हटाए जाने को लेकर साईं भक्त और गांववालों में नाराजगी है वो एक नए विवाद को जन्म दे सकता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.