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मंदिरों से हटाई जाने लगी है साईं बाबा की मुर्तियां, साईं भक्त नाराज़..

By   /  September 6, 2014  /  5 Comments

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साईं को भगवान न मानने के धर्मसंसद का फैसला और उनकी मूर्तियों को मंदिरों से हटाए जाने के ऐलान का असर दिखने लगा है. साईं की प्रतिमा को मंदिरों से हटाया जाने लगा है. गाजियाबाद से लेकर उत्तराखंड के धौलेस्वर महादेव मंदिर तक से साईं की मूर्ति को हटा दिया गया है. कई और जगहों पर ऐसी ही तैयारी है. इसे लेकर साईं भक्तों ही नहीं, दूसरे आस्थावानों में भी गुस्सा है.saibaba

साईं की पूजा न करने और इसे मंदिरों से हटाकर नदियों में विसर्जित करने की अपील का असर अब अमल में लाया जाने लगा है. गाजियाबाद के मुरादनगर में गंगनहर के पास बने मंदिर से आज साईं की प्रतिमा हटा दी गई. छत्तीसगढ़ के कवर्धा में हुई धर्म संसद से 6 महीने के भीतर सभी सनातन मंदिरों से साईं मूर्ति हटाने की अपील की गई थी. अब कमेटी ने फैसला किया है कि सनातन धर्म मंदिरों की जांच की जाएगी और जहां भी मूर्तियां होंगी उसे हटा दिया जाएगा.

मुरादनगर से पहले उत्तराखंड के धौलेस्वर महादेव मंदिर से साईं की मूर्ति को हटा दिया गया. मध्य प्रदेश के बैतूल में रुक्मिणी बालाजीपुरम से साईं मूर्ति हटाने का ऐलान हो चुका है. वहीं गुजरात के वलसाड में मूर्ति हटाने को लेकर विवाद शुरू हो गया है.

13 अखाड़ों और चारों शंकराचार्य भले ही साईं को भगवान न मानने पर एकमत हों लेकिन कई आस्थावान साईं पूजा पर रोक लगाने और मूर्तियों को मंदिर से हटाने से सहमत नहीं. तभी तो, देहरादून से 20 किलोमीटर दूर शिवमंदिर से जैसे ही साईं की प्रतिमा हटी, गांव वालों के साथ ही मंदिर के लिए जमीन दान करने वाले तिरलोक सिंह रावत भी नाराज हो गए.

मंदिर से साईं की मूर्ति हटाने वाले संतों का कहना है कि और भी मंदिरों से साईं की मूर्तियां हटाई जाएंगी. शिव मंदिर से प्रतिमा हटाने के बाद संतों ने एक आयोजन करके साईं की मूर्ति उनके भक्तों को दान कर दी. लेकिन जिस तरह से मंदिर से मूर्ति हटाए जाने को लेकर साईं भक्त और गांववालों में नाराजगी है वो एक नए विवाद को जन्म दे सकता है.

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  • Published: 3 years ago on September 6, 2014
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  • Last Modified: September 6, 2014 @ 9:05 pm
  • Filed Under: धर्म

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. Kiran Yadav says:

    Ashok Gupta sahi kah rahe hai aap par moorti ko mandir me lagaane ki jid kyon aap ghar me rakh bade sauk se poojiye alag se mandir banwaaiye sanatan dharm ke mandir ko kyon doosit karna chahte hai

  2. Kiran Yadav says:

    kuchh galat nahi jo ho raha hai sahi ho raha hai kahawat hai jab jago tabhi sawera itane samay se chale aa rahe adharm ko ab agar sudharane ki koshish ho rahi hai to kuchh galat nahi jinako sai namak muslim fakeer me aashtha hai wo alag mandir bana kar moorti sthapana kar sakte hai par unako saidhantik roop se sanatan dharm ke mandiro me jaana chhod dena chahiye

  3. Gour Ritambhara says:

    jo ho rha hai vah galat hai… hindustaan me aisa ho rha yha bahut hi samvedan sheel or vicharneeya vishya hai.. aap kisi bhi vyaktigat bhawnao se nhi khel skte.. sabki nishthha or aastha ka prashn hai yah…

  4. Ashok Gupta says:

    Jo ho raha hai vo galat hai har kisi ko apne eesth ko pujane kee aajadi hai us me antar virodh kyo ho

  5. गलत ही है, पहले स्थापित की,तो अब हटाना क्या?वैसे भी यह प्रवर्ति लोगों के बीच दूरियां बढ़ाएगी. परस्पर घृणा का भाव बढ़ेगा तो इसका अंजाम समाज के हित में नहीं होगा, हिन्दू संस्कृति सहनशीलता की संस्कृति रही है,बाहर से कितने भी लोग आये उनकी संस्कृति इसमें ही विलीन हो गयी,और यह नए रूप में निखर कर आई ,इसका भी हमारे धर्म,संस्कृति पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा , ये तो मंदिरों के चढ़ावे ने अब प्रतिस्पर्धा उत्पन्न कर दी , अन्यथा इस सनातन धर्म व हिन्दू संस्कृति से कोई टक्कर नहीं ले पाया शंकराचार्य का भी कुछ निहित स्वार्थ ही इस सदभाव को बिगड़ देगा , सभी को इस विषय पर निष्पक्ष भाव से सोचने की जरुरत है. शंकराचार्य किसी को भी पूजा के लिए विवश नहीं कर सकते,आस्था का यह मामला पूर्ण रूप से व्यक्तिगत है , अपने अपने विश्वास से जुड़ा है।मूर्ति हटा कर साईं साईं भक्तों को किसी अन्य देवता की पूजा के लिए मजबूर नहीं कर सकते

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