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भारतीय मीडिया में खबरों का ज्वार – भाटा..

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-तारकेश कुमार ओझा||
पता नहीं क्यों मुझे भारतीय मीडिया का मिजाज भारत – पाकिस्तान सीमा की तरह विरोधाभासी व अबूझ प्रतीत होता है. भारत – पाक की सीमा में कब बम – गोलियां बरसने लगे और कब दोनों देशों के सैन्य अधिकारी आपस में हाथ मिलाते नजर आ जाएं, कहना मुश्किल है. अभी कुछ दिन पहले तक चैनलों पर सीमा में तनाव की इतनी खबरें चली कि लगने लगा कि दोनों देशों के हुक्मरान लड़ाई करा कर ही मानेंगे. फिर पता चला कि नवाज शरीफ ने अपने देश के हुक्मरानों के लिए रसीले आम भिजवाएं है.new (1)

अपने मीडिया का मिजाज भी कुछ एेसा ही है. समुद्र की अनंत लहरों की तरह भारतीय मीडिया में भी खबरों का ज्वार – भाटा निरंतर चलता ही रहता है. हालांकि कुछेक विरोधाभास के चलते यह समझना मुश्किल होता है कि एेसा खबरों के महत्व के चलते होता है या मीडिया अपनी सुविधा से यह ज्वार – भाटा तैयार करता रहता है. प्रादेशिक हो या राष्ट्रीय मीडिया. हर जगह यह विरोधाभास नजर आता है.

लोग भूले नहीं होंगे कि एक दौर में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल लंबे समय तक सारे चैनलों के सुपरस्टार बने रहे. लेकिन अब उनसे जुड़ी खबरें लगभग न के बराबर ही दिखाई पड़ती है. इसी तरह पश्चिम बंगाल के बंगला चैनलों पर अचानक जानलेवा इंसेफेलाइटिस रोग से जुड़ी खबरें सुर्खियां बनती है. इस विषय पर अस्पतालों की बदहाली के दृश्य. राजनेताओं और स्वास्थ्य अधिकारियों के बयान. जगह – जगह सुअर पकड़ते सरकारी कर्मचारी और सुअरों के मच्छरदानी में विचरण के दृश्य प्रमुखता से नजर आते हैं. अचानक परिदृश्य बदला और इंसेफेलाइटिस की खबरें गायब.

अब एेसा तो नहीं कि जो लोग सुअरों को पकड़ रहे थे, खबरें बंद हो जाने पर वे अपने घर चले गए. या फिर सुअरों को मच्छरदानी से निकाल कर पूर्ववत स्थिति में आजाद कर दिया गया. अगर कहीं समस्या हुई होगी तो जरूर लगातार कई दिनों तक इस पर धमा चौकड़ी मची होगी. लेकिन मीडिया के अपने कायदे हैं. कुछ दिनों की चुप्पी के बाद फिर इसेफेलाइटिस से जुड़ी चंद खबरों का डोज. कुछ एेसा ही हाल कथित राष्ट्रीय मीडिया का भी है. अभी कुछ दिन पहले तक चैनलों पर रात – दिन लव जेहाद और रांची के रंजीत कोहली या रफीकुल बनाम तारा की खबरें रहस्यलोक तैयार करने में लगी थी. रंजीत या रफीकुल के घर से इतने सिम मिले, उसके तार कई बड़े – बड़े लोगों से जुड़े हैं… वगैरह – वगैरह. फिर एकाएक इससे जुड़ी खबरें गायब.

इस मामले में भी यह तो संभव नहीं कि चैनलों ने दिखाना बंद कर दिया तो रंजीत या रफीकुल का रहस्यलोक भी एकाएक गायब हो गया. लेकिन कुछ दिनों तक आसमान पर बिठाए रखने के बाद मीडिय़ा हर किसी को जमीन पर पटकने का अादी हो चला लगता है. लिहाजा लव जेहाद के मामले में भी हुआ. कभी रात – दिन रफीकुल का रहस्यलोक तो एकाएक सब कुछ गायब. उसकी जगह पर धोनी सेना और मास्टर मोदी के कारनामे ने ले ली. बेहतर होगा कि मीडिया जिस मसले को पकड़े तो उसे अंजाम तक पहुंचा करके ही दम ले. किसी को आसमान पर बिठा देना और फिर एकदम से जमीन पर पटक देना भी उचित नहीं कहा जा सकता.

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2 Comments

  1. mahendra gupta on

    ख़बरों की ज़िंदगी कम से कम एक दिन, ज्यादा से ज्यादा सात दिन होती है,आजकल खबरिया चैनल मसाला चैनल हो गएँ हैं ,इनकी विश्वसनीयता भी बहुत बार पचास से सत्तर प्रतिशत ही होती है , इसलिए सुनने वालों को पूरा मार्जिन रख कर विश्वास करना चाहिए , कभी कभी यह प्रतिशत इस से भी कम होता है

  2. ख़बरों की ज़िंदगी कम से कम एक दिन, ज्यादा से ज्यादा सात दिन होती है,आजकल खबरिया चैनल मसाला चैनल हो गएँ हैं ,इनकी विश्वसनीयता भी बहुत बार पचास से सत्तर प्रतिशत ही होती है , इसलिए सुनने वालों को पूरा मार्जिन रख कर विश्वास करना चाहिए , कभी कभी यह प्रतिशत इस से भी कम होता है

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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