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खङीन से आबाद हैं थार..

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– सुमेर सिंह लौद्रवा।।
थार रेगिस्तान में प्राचीनकाल में विकसित एक ऐसी कृषि प्रणाली मौजूद हैं जो एक नखलिस्तान का एहसास करवाती है। खङीन पद्धति द्वारा रेगिस्तान में परम्परागत बाजरे, मोठ एवं ग्वार आदि के साथ-साथ गेंहू एवं चने की फसलों का उत्पादन भी किया जाता है। औसत बारिश होने पर उनाळू कृषि में बाजरा, ग्वार आदि का उत्पादन किया जाता है और अच्छी बारिश होने पर सियाळू कृषि में गेंहू व चने का उत्पादन होता है।DSC_0764

राजस्थान के रेगिस्तानी भाग में प्राचीन काल से प्रचलित यह कृषि प्रणाली आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जैसलमेर जिले में आज भी कईं खङीन मौजूद है। यहां पर इस प्रणाली की व्यवस्थित तरीके से शुरुआत का श्रेय पालीवाल ब्राह्मणों को जाता है जो अपने समय में धन-धान्य से परिपूर्ण एवं समृद्धशाली थे। उनके जैसलमेर से उजङने के बाद उनके द्वारा बनाये गये खङीनों का उपयोग स्थानीय लोगों द्वारा किया जा रहा है। खङीन जैसलमेर के रेगिस्तानी अर्द्धशुष्क भाग में स्थित ऊँचे भाग की ढालों में स्थापित किये गये है। इन ऊँचे भागों का बरसाती पानी ढलान में इकट्ठा किया जाता है।

खङीन का निर्माण सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक तरीके द्वारा किया गया है। इसके मुख्य भाग- आगोर, खङीन, धोरा एवं नाला है। आगोर- आगोर वह भाग होता है जहां से पानी बहकर ढलान की ओर आता है। यह ऊँचा एवं पहाङी भाग होता है। खङीन- खङीन वह भाग होता है जहां आगोर का पानी इकट्ठा होता है। यह भाग सबसे महत्वपूर्ण होता है इसी भाग में फसल का उत्पादन होता है। धोरा- यह खङीन के तीन ओर बनी मिट्टी की दीवार होती है जो आगोर के पानी को खङीन में रोके रखती है। धोरे पर खेजङी व अन्य स्थानीय प्रजातियों के पेङों की बहूलता होती है। नाला- बुवाई के समय तक अगर खङीन में पानी भरा रहता है तो धोरे में ढलान वाले क्षैत्र में बने नाले से खङीन खाली करके बुवाई की जाती है। नाला खङीन के पानी की निकासी के लिए बनाया जाता है। खङीन के साथ- साथ छोटे खङीन स्थापित होते हैं उनकी सिंचाई मुख्य खङीन से निकाले गये पानी द्वारा की जाती है।

खङीन में उत्पादन की जाने वाले फसलों में किसी भी प्रकार की रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं किया जाता है। खङीन के खाद्यानों को पौष्टिकता के कारण तवज्जो दी जाती है। वर्तमान में नहर व नलकूपों की सुविधा होने बावजूद खङीन अपनी विशिष्टता के कारण जगह बनाये हूए है। खङीन कृषि प्रणाली जैसलमेर में ग्राम्य पर्यटन की संभावना का मुख्य आधार है। विषम परिस्थितियों में यहां के निवासियों द्वारा स्थापित यह कृषि प्रणाली दर्शनीय तो है ही और इनके द्वारा कृषि व्यवस्था को जानने एवं समझने में भी सहायता मिलती है कि किस तरह विषम परिस्थितियों में भी इस प्रकार की प्रणाली विकसित की गई जो रबी एवं खरीफ दोनों फसलों का उत्पादन करती है। इसके धोरों पर लगाये गये खेजङी, बोरङी, लवा आदि स्थानीय प्रजाति के पेङ-पौधे इसकी सून्दर छटा को विशिष्टा प्रदान करते है। जैसलमेर के खङीनों में तणूसर, लाखीणा, मसूरङी, रोहङीवाला एवं दोहटोंवाला प्रमुख है।

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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