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मैं मर जाऊं तो मातम नहीं, उत्सव मनाना..

By   /  September 14, 2014  /  1 Comment

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 पत्नी से कहा, मेरे मरने के बाद श्रृंगार और ज्यादा करना.. कुम्हारी के एक ही परिवार के 8 लोगों ने किया देह दान..  परिवार का मानना, अंतिम संस्कार करने से नहीं जाता कोई स्वर्ग में..

-प्रतीक चौहान||

रायपुर. मैं मर जाऊं, तो घर में मातम ना मनाना, बल्कि खुश होना, ढोल नगाड़े बजवाना, क्योंकि मैं मरने के बाद भी जिंदा रहूंगा. यहीं तुम्हारे आस-पास रहूंगा, पत्नी से कहा तुम और श्रृंगार करना, सफेद साड़ी नहीं बल्कि रंगबिरंगी साड़ी पहनना. बेटों से कहा, तुम लोग भी रोना नहीं, मेरे मरने के बाद मृत्यु भोज न करना. यह कहना हैं कुम्हारी में रहने वाले बाबूभाई राठौड़ का. दरअसल छत्तीसगढ़ में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के मेडिकल कॉलेज में चिकित्सकीय प्रयोग के लिए इसी परिवार के आठ सदस्यों ने अपना शरीर दान किया है.IMG_2715

कुम्हारी में खेती बाड़ी करने वाले राठौड़ परिवार के सभी आठ सदस्यों ने एक साथ देह दान कर पूरे देश में एक मिसाल कायम की है. परिवार के मुखिया बाबूभाई राठौड़ का कहना है कि आज इस अंधविश्वास की दुनिया में लोग स्वर्ग की लालसा में अपना अंतिम संस्कार करवाते है. मरने के बाद समाज में अपनी प्रतिष्ठा दिखाने के लिए हजारों लोगों को भोजन करवाया जाता हैं, लेकिन वह इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि जिस किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार होता है तो उसे स्वर्ग की प्राप्ति ही हो. श्री राठौड़ ने अपनी पत्नी गौरी बेन से यह साफ कह दिया हैं कि मेरे मरने के बाद घर में मातम नहीं बल्कि उत्सव मनाया जाए. श्री राठौड़ ने बातचीत में बताया कि 1995 में जब वे नागपुर में रहते थे तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ देहदान की शपथ ली थी. उसके बाद उनका पूरा परिवार कुम्हारी में बस गया. बच्चे के बड़े हुए और उनकी शादी के बाद बाबूबाई ने देहदान का महत्व समझाया, तो पिता की राह पर चलते बड़े बेटे कार्तिक उनकी पत्नी शीतल, मंझले बेटे अमित, उनकी पत्नी ज्योति और छोटे बेटे शशांक और उनकी पत्नी ईशा ने भी शरीरदान की घोषणापत्र करते हुए एम्स में शपथपत्र दे दिया है.

जन्मदिन में गिफ्ट मांगते है
यदि घर में किसी का जन्मदिन हो तो घर के मुखिया उसे जन्मदिन का तोहफा देते हैं, लेकिन कुम्हारी के इस राठौड़ परिवार में गिफ्ट देने की नहीं लेने की प्रथा है. बाबूभाई ने बताया कि घर में जब किसी भी सदस्य का जन्मदिन होता है तो उससे वह देह दान करने का गिफ्ट मांगते है. हालांकि इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी या बच्चों पर कभी दबाव नहीं बनाया.

 मां कहती थी मैं नास्तिक हूं
बाबूभाई बताते हैं कि जब वह छोटे थे और अपनी मां से अंधविश्वास के प्रति तर्क करते थे तो उनकी मां उन्हें काफी चिल्लाती थी और हमेशा कहती थी कि तू नास्तिक है. उनका कहना है कि यदि आज इस दुनिया में उनकी मां होती तो गर्व से साथ कहती कि मेरा बेटा नास्तिक नहीं दुनिया का सबसे बड़ा आस्तिक है.

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  • Published: 3 years ago on September 14, 2014
  • By:
  • Last Modified: September 14, 2014 @ 7:18 pm
  • Filed Under: देश

1 Comment

  1. mahendra gupta says:

    देह त्याग, सबसे बड़ा त्याग ,देह दान, सबसे बड़ा दान पूरे परिवार का यह दान सब के लिए प्रेरणादायी है ,नमन है इस परिवार को

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