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न हादसे के पहले, न हादसे के बाद..

By   /  September 15, 2014  /  1 Comment

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हैरान मत होइए कि जम्मू-कश्मीर में आज जो बाढ़ आयी है, उसकी भविष्यवाणी वहाँ के बाढ़ नियंत्रण विभाग ने चार साल पहले कर दी थी. बिलकुल साफ़-साफ़! उन्होंने 2010 में कहा था कि अगले पाँच साल में श्रीनगर शहर में भयानक बाढ़ आ सकती है; झेलम नदी से डेढ़ लाख क्यूसेक पानी बह कर श्रीनगर के ज़्यादातर हिस्सों को अपनी चपेट में ले सकता है; अनन्तनाग से बारामूला के बीच के इलाक़ों में भारी बाढ़ आ सकती है; श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग बह सकता है और घाटी का सम्पर्क देश से कट सकता है!
ऐसा लग रहा है, जैसे यह रिपोर्ट बाढ़ आने के बाद आज लिखी गयी हो! इसे पेश करने वालों को तब ‘जोकर’ तक कह दिया गया था.

-क़मर वहीद नक़वी।।

टीवी की भाषा में इस लेख की टीआरपी शायद बहुत कम हो! क्योंकि असली मुद्दों में कोई रस नहीं होता! उन पर लोग लड़ते नहीं, न उन पर उन्हें लड़ाया जा सकता है! भला फीके, नीरस, बेस्वाद, बदरंग, बोझिल, उबाऊ, भारी-भरकम गम्भीर सच पर भी कोई लड़ सकता है? पहले के ज़माने में राजे-रजवाड़ों वाले लोग मज़े के लिए मेढ़े, मुर्ग़े और बटेर लड़ाया करते थे! आजकल राजनीति के लिए जनता को लड़ाते हैं! जनता फ़र्ज़ी मुद्दों पर ख़ूब लड़ती है! वह न गम्भीर बात पर लड़ती है, न गम्भीर बात पढ़ती है! इसलिए यह लेख ‘बोर’ लगे तो पढ़ने की कोई मजबूरी नहीं है! हालाँकि इसे पढ़ना बेहद ज़रूरी है!image1

पता नहीं, इतिहास में नास्त्रेदमस सचमुच हुए थे या नहीं! लेकिन अपने देश का कोई सरकारी विभाग अगर भविष्यवाणी करने में नास्त्रेदमस के भी कान काट ले तो? ऐसा हुआ! लेकिन फिर क्या हुआ? अरे होना क्या है? गम्भीर चीज़ है न! किसे इतनी फ़ुर्सत है इन ‘बेकार’ की बातों में पड़ने की? इसलिए हैरान मत होइए कि जम्मू-कश्मीर में आज जो बाढ़ आयी है, इसकी भविष्यवाणी वहाँ के बाढ़ नियंत्रण विभाग ने चार साल पहले कर दी थी. बिलकुल साफ़-साफ़! उन्होंने कहा था कि अगले पाँच साल में श्रीनगर शहर में भयानक बाढ़ आ सकती है; झेलम नदी से डेढ़ लाख क्यूसेक पानी बह कर श्रीनगर के ज़्यादातर हिस्सों को अपनी चपेट में ले सकता है; अनन्तनाग से बारामूला के बीच के इलाक़ों में भारी बाढ़ आ सकती है; श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग बह सकता है और घाटी का सम्पर्क देश से कट सकता है!

मतलब ‘विकास’ हो चुका है!

ऐसा लग रहा है, जैसे यह रिपोर्ट बाढ़ आने के बाद आज लिखी गयी हो! इसे पेश करने वालों को तब ‘जोकर’ तक कह दिया गया था. रिपोर्ट में कहा गया था कि 1892 की बाढ़ के बाद अंगरेज़ों ने श्रीनगर और आसपास के इलाक़ों में बाढ़ के पानी की निकासी के लिए नाले- नालियों की जो व्यापक व्यवस्था की थी और ‘वेटलैंड’ के नाम पर जो ज़मीनें छोड़ी थीं, वह सब आज लापता हैं. उन पर घर, बाज़ार, शापिंग काम्प्लेक्स बन चुके हैं. श्रीनगर से पानी बाहर निकलने का न कोई रास्ता बचा है, न कोई ऐसी जगह जहाँ यह पानी जमा हो सके. सोपोर और बारामूला के बीच झेलम की तली से कीचड़ की सफ़ाई आख़िरी बार चौंसठ साल पहले 1950 में हुई थी! आप चौंके कि नहीं! यही नहीं, छह साल पहले सन 2008 में राज्य की रिमोट सेन्सिंग और जीआइएस प्रयोगशाला ने भी सेटेलाइट तसवीरों के अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 1911 से 2004 के बीच के क़रीब 93 सालों में श्रीनगर के आधे से ज़्यादा जलाशय और ख़ाली पड़ी दलदली ज़मीनें ख़त्म हो चुकी हैं, वहाँ सड़कें और कालोनियाँ बन चुकी हैं, अवैध क़ब्ज़े कर उन्हें पाटा जा चुका है, बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हो चुका है! मतलब ‘विकास’ हो चुका है!

पर्यावरण से पैसा तो मिलेगा नहीं!

तीन साल पहले योजना आयोग ने पहाड़ी इलाक़ों में विकास, इन्फ़्रास्ट्रक्चर और पर्यावरण सन्तुलन को लेकर एक टीम गठित की थी. टीम ने उत्तराखंड त्रासदी का भी अध्ययन किया और साफ़-साफ़ चेतावनी दी कि पहाड़ों में बढ़ रही अन्धाधुन्ध भीड़ और अवैज्ञानिक तरीक़े से किये जा रहे निर्माण कार्यों के भारी दबाव से स्थानीय पर्यावरण को बहुत नुक़सान पहुँच रहा है, जिससे सम्भवतः दैवी आपदाओं की बारम्बारिता बढ़ती जा रही है! लेकिन यह ‘दैवी’ आपदाएँ कहाँ हैं? यह तो पर्यावरण बेच कर ख़रीदे गये दानवी विकास का अट्टहास है! हिमालय के ग्लेशियरों की नाज़ुक हालत और भविष्य में उससे होने वाले ख़तरों पर पिछले बीस-पच्चीस सालों में न जाने कितने शोध हो चुके हैं. लेकिन कौन सुनता है इन बातों को. मान लिया जाता है कि यह सब ‘विकास-विरोधी’ एनजीओवादी हल्लेबाज़ी और धन्धेबाज़ी है! और विकास बड़ा कि पर्यावरण? आख़िर पर्यावरण से पैसा तो मिलेगा नहीं! हाल के वर्षों में पहाड़ों में होनेवाली प्रकृतिक दुर्घटनाओं की संख्या तेज़ी से और लगातार बढ़ी है. उत्तराखंड की भयावह त्रासदी के बावजूद पहाड़ों में सब कुछ वैसा ही अन्धाधुन्ध चल रहा है! किसी ने कुछ नहीं सीखा! अभी दिल्ली के सेंटर फ़ार साइन्स ऐंड एनवायरन्मेंट (सीएसइ) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में बताया है कि देश में मौसम के अतिवाद की घटनाएँ भयावह रूप से बढ़ गयी हैं. 1900 के दशक में जहाँ मौसम की अति की केवल दो-तीन घटनाएँ हर साल होती थीं, वहीं अब साल में क़रीब साढ़े तीन सौ ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं, जहाँ हमें मौसम की अति झेलनी पड़ती है! इसी के चलते पिछले दस सालों में देश में चार विकराल हादसे हो चुके हैं. 2005 में मुम्बई, 2010 में लेह, 2013 में उत्तराखंड और अब जम्मू-कश्मीर में वर्षा की अति से आयी तबाही!

क्या आपको इससे भी बड़े कुछ और सबूत चाहिए, यह मानने के लिए कि कहीं कोई गड़बड़ है चेतावनियों को दुत्कारने की आदत गड़बड़ है, तो इसे नकारते रहिए क्योंकि इससे विकास और अर्थ का अश्वमेध रुकता है! इसलिए चेतावनियों को दुत्कारने की आदत पड़ गयी है हमको. और चेतावनी देनेवाले भी अकसर मुँह ढक कर सो जाते हैं. मौसम विभाग ने पिछले साल उत्तराखंड में भयानक वर्षा और भूस्खलन का अन्दाज़ लगा लिया था. लेकिन राज्य सरकार को ख़बर ही नहीं हो पायी. मौसम विभाग ने सरकार को फ़ैक्स भेज कर छुट्टी कर ली. किसी ने उसे देखा नहीं क्योंकि शनिवार के कारण दफ़्तर जल्दी बन्द हो गये थे! बाढ़ की स्थिति पर नज़र रखने वाले केन्द्रीय जल आयोग की ओर से भी कोई चेतावनी नहीं आयी. तो सारे तामझाम के बावजूद पता तब चला, जब उत्तराखंड में तबाही आ गयी! इस बार जम्मू-कश्मीर के मामले में भी मौसम विभाग ने भारी से लेकर बहुत घनघोर बरसात की भविष्यवाणी की थी. लेकिन केन्द्रीय जल आयोग जम्मू-कश्मीर की नदियों के जलस्तर की निगरानी ही नहीं करता है, इसलिए ऐसी भयानक स्थिति का अनुमान नहीं लग सका! तो उत्तराखंड के हादसे से क्या सबक़ सीखा गया? कुछ नहीं! वैसे, जम्मू-कश्मीर सरकार का कहना है कि उसने लोगों से सुरक्षित जगहों पर चले जाने की कई अपीलें कीं, पुलिस की गाड़ियों से और मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर बार-बार एलान कराये, लेकिन लोग अपनी जगहों से हिले ही नहीं. शायद उन्हें मौसम विभाग की चेतावनी पर भरोसा ही नहीं था! और राज्य सरकार को भी अपनी इस चेतावनी पर कितना भरोसा था? ख़ुद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एक इंटरव्यू में कहा कि बाढ़ के शुरू के 24-36 घंटों में तो कोई सरकार थी ही नहीं! वह एक कमरे में पाँच-छह अफ़सरों के साथ हालात से जूझ रहे थे. क्योंकि सरकार का सचिवालय, पुलिस के दफ़्तर, फ़ायर ब्रिगेड, अस्पताल सब बाढ़ से घिरे थे. फ़ोन बन्द थे. मंत्रियों तक का पता नहीं था कि कौन, कहाँ है. इसलिए राहत का काम शुरू होने में देरी हुई! सवाल यह है कि जब नागरिकों से सुरक्षित जगहों पर जाने की अपीलें की जा रही थीं तो सरकार ने पहले अपने आपको, अपने तंत्र को सुरक्षित जगहों पर ले जाने की ज़रूरत क्यों नहीं समझी? इसलिए कि चेतावनी को वैसी गम्भीरता से नहीं लिया गया, जितनी गम्भीर वह थी! बस कह कर निकल गये कि हम तो बरसात रोक नहीं सकते!

कल की ज़िम्मेदारी किसकी?

तो मौसम और पर्यावरण पर यह है हमारा रवैया. कोई चेतावनी, कोई त्रासदी हमें डराती नहीं, जगाती नहीं, झिंझोड़ती नहीं. न हादसे के पहले, न हादसे के बाद! सरकार महाराज में जो भी बैठे, पर्यावरण को लेकर काहे को चिन्ता करे. उसे आज जो करना है, कर ले. पर्यावरण बिगड़ेगा तो बिगड़े. उसका नतीजा सामने आते-आते बीस-तीस-चालीस साल लगेंगे. तब तक कौन कहाँ होगा, कौन कहाँ, कौन जानता है. इसीलिए पर्यावरण मंत्रालय आज ख़ुद अपनी पीठ ठोक रहा है. सरकार के पहले सौ दिनों में मंत्रालय ने 240 प्रोजेक्ट मंज़ूर कर दिये! इतनी तूफ़ानी रफ़्तार का नतीजा क्या होगा, समझ सकें तो समझ जाइए. आज तो अख़बार में यही छपेगा कि विकास हो गया. कल तबाही होगी तो हो. कल की ज़िम्मेदारी आज वालों की तो है नहीं!

(लोकमत समाचार, 13 सितम्बर 2014)

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  • Published: 3 years ago on September 15, 2014
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  • Last Modified: September 15, 2014 @ 4:51 pm
  • Filed Under: देश

1 Comment

  1. bilkul sahi lekh hai ye. pahle to kitna bhi bolo log samajhte hi nahi. bad me sir peete hi rah jate hai.

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