Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

लेह और ‘लव जिहाद’ का अवलेह..

By   /  September 20, 2014  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

संघ परिवार पिछले शायद पन्द्रह-बीस सालों से ‘लव जिहाद’ के नाम पर लोगों को भड़का रहा है. इतने राज्यों में इतने वर्षों तक बीजेपी की सरकारें रहीं, लेकिन सरकारी तौर पर आज तक एक भी ऐसा मामला क्यों नहीं पकड़ा जा सका, जहाँ यह साबित हो कि कोई अन्तर्धार्मिक विवाह किसी ख़ुफ़िया साज़िश के तहत रचाया गया था!

-क़मर वहीद नक़वी||

लेह में चीनी सैनिक आये और दिल्ली में चीनी राष्ट्रपति आये! उपचुनाव के नतीजे भी आये. योगी आदित्यनाथ फ़िलहाल चुप बैठ गये हैं और ‘लव जिहाद’ वाली ‘घृणा ब्रिगेड’ भी फ़िलहाल कुछ दिनों के लिए शायद बेरोज़गार हो जाय! कश्मीर में बाढ़ का पानी उतार पर है तो उसके साथ देश में फैली गरम हवा भी मद्धिम पड़ रही है. कभी ‘मुल्ला’ मुलायम के क़सीदे पढ़ चुके साक्षी महाराज को अब मदरसे ज़हर बुझे नज़र आने लगे हैं. नरेन्द्र मोदी हालाँकि अब क़साईबाड़ों की बात नहीं करते, यह ज़िम्मा मेनका गाँधी ने सम्भाल लिया है! और अभी-अभी प्रधानमंत्री मोदी ने सीएनएन को दिये एक इंटरव्यू में कहा है कि भारतीय मुसलमान भारत के लिए जियेंगे और भारत के लिए मरेंगे!
क्या बीजेपी हिन्दुत्व को छोड़ सकती है?love jihad

यह देश की ताज़ा ख़बरें हैं! थोड़ी उलझी-गुलझी हुई! पता नहीं कौन-सी बात सही है? यह कि वह?कुछ लोगों को लगता है कि उपचुनाव में बीजेपी के सिर हिन्दुत्व का ही ठीकरा फूटा है! हो सकता है कि ऐसा हुआ हो, लेकिन  इससे अगर कुछ लोग उम्मीद करते हों कि उपचुनाव के नतीजों से घबरा कर परिवार हिन्दुत्व को पुरानी अालमारियों में रख देगा और देश में चैन की बंसी बजने लगेगी, तो यह शायद ज़रा ज़्यादा ही ख़ुशफ़हमी होगी! हालाँकि यह हो सकता है कि अगले कुछ महीनों तक हिन्दुत्व के कड़ाहों को भट्टी से उतार कर रखा जाये, क्योंकि कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं. हो सकता है कि बीजेपी फिर विकास की जय बोलने लगे! अगर ऐसा हुआ तो भी यह नितान्त मौसमी होगा. चुनाव में तो वैसे भी सबके चेहरे बदल जाते हैं. तो परिवार का चेहरा भी कुछ दिनों के लिए बदल जाय तो अचरज कैसा?

लोकसभा चुनाव के पहले से हिन्दुत्व के उभार की आशंकाओं को लेकर मैंने लगातार लिखा. वे सारी आशंकाएँ अब लगातार सही साबित होती जा रही हैं. हालाँकि चुनाव नतीजों के बाद के राजनीतिक आकलन में मुझसे ज़रूर बडी चूक हुई! मुझे लगा था कि बीजेपी को जिस तरह मुसलमानों के ठीक-ठाक वोट मिले हैं, उसके बाद वह शायद लम्बी रणनीति पर काम करे और ज़ाहिर तौर पर हिन्दुत्व का बिगुल न बजाये, बल्कि केवल विकास और गवर्नेन्स का डंका पीटे. इस चतुर रणनीति से बीजेपी को सबसे बड़ा फ़ायदा यह होता कि सेकुलरिज़्म का मुद्दा भारतीय राजनीति से सदा-सर्वदा के लिए ग़ायब हो जाता और बाक़ी सभी पार्टियाँ बीजेपी के मुक़ाबले निहत्थी हो जातीं. और पाँच साल बाद जब वह विकास की अपनी नुमाइश लगा कर चुनाव में उतरती, तो हिन्दुत्व का एजेंडा चलाने के लिए उसकी जड़ें कहीं ज़्यादा गहरी हो चुकी होतीं! उससे भी बड़ा फ़ायदा मोदी को होता, जो अरसे से विश्व नेता होने का सपना पाले हुए हैं और अब पूरे ज़ोर-शोर से उस रास्ते पर चल भी रहे हैं. लेकिन जब सरकार बनने के कुछ दिनों बाद से ही हिन्दूवादी भोंपुओं का खटराग शुरू हो गया, तो मुझे बड़ा अचम्भा हुआ.

संघ कभी नहीं चाहेगा हिन्दू-मुसलमानों का मेल-जोल

लेकिन अब समझ में आया कि ग़लती कहाँ हुई थी? दरअसल, यह सोच लेना मूर्खता होगी कि परिवार कभी अपने एजेंडे को किनारे रख सकता है. अब उसकी रणनीति बिलकुल साफ़ है. कभी यहाँ, कभी वहाँ, कभी इस मुँह से, कभी उस मुँह से कुछ ऐसा करते-कहते-बोलते रहो कि देश में मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ लगातार माहौल बनता रहे. फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मामले सच्चे हों या झूठे, बस वह ऐसे हों कि हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच दीवार खड़ी होती रहे, सीमा-रेखा खींची जाती रहे, उनको इतना अलग-अलग कर दिया जाय कि वह किसी प्रकार एक-दूसरे के पास न आ सकें. वरना यह साज़िशें क्यों होतीं कि हिन्दू त्योहारों में मुसलमान किसी प्रकार भी शरीक न हों!

अब मेनका गाँधी को ही ले लीजिए. कहती हैं कि ‘लव जिहाद’ का एक भी मामला अभी तक उनके मंत्रालय के पास नहीं आया. हालाँकि उन्होंने सुना है कि उनके निर्वाचन क्षेत्र पीलीभीत में ऐसे सात-आठ मामले हुए हैं. क्या मासूमियत है! अरे मेनका जी, आप केन्द्र में महिला मामलों की ही मंत्री हैं, अगर आपको शक है कि आपके इलाक़े में ऐसे मामले हुए हैं, तो आपने जाँच क्यों नहीं करायी? एक मंत्री हो कर बिना जाँच के ही आप ऐसे ग़ैर-ज़िम्मेदार बयान कैसे दे रही हैं? और अभी हाल की बात क्यों? संघ परिवार पिछले शायद पन्द्रह-बीस सालों से ‘लव जिहाद’ के नाम पर लोगों को भड़का रहा है. इतने राज्यों में इतने वर्षों तक बीजेपी की सरकारें रहीं, लेकिन सरकारी तौर पर आज तक एक भी ऐसा मामला क्यों नहीं पकड़ा जा सका, जहाँ यह साबित हो कि कोई अन्तर्धार्मिक विवाह किसी ख़ुफ़िया साज़िश के तहत रचाया गया था! इसी तरह क़साईबाड़ों की बात है. चुनाव के पहले मोदी जी उन पर ख़ूब दहाड़ते थे, तो अब प्रधानमंत्री बन कर क्यों उन पर कोई कार्रवाई नहीं की? और अब उनकी एक मंत्री मेनका गाँधी आरोप लगा रही हैं कि क़साईबाड़ों के पैसे से आतंकवादियों को मदद दी जाती है! अजीब बात है. सरकार आपकी, गृह मंत्रालय आपका, सीबीआई, एनआइए, आइबी, रा आपके हाथ में, तो जाँच क्यों नहीं कराते, किसने रोका है आपको? और फिर वही, मंत्री हो कर बिना किसी जाँच के ग़ैर-ज़िम्मेदाराना आरोप कैसे लगा रही हैं आप?

बात यहीं ख़त्म नहीं होती. कश्मीर त्रासदी पर देश ने पहली बार एक अलग रंग देखा! यहाँ भी, वहाँ भी. सचमुच चिन्ताजनक बात है. संवेदनशील मुद्दों को कैसे देखा और सम्भाला जाना चाहिए, यह सोचने की बात है. लेकिन कोई सोच रहा है क्या? या सोचना चाहता है क्या? कुछ महीनों बाद वहाँ चुनाव होनेवाले हैं. और इस माहौल के बावजूद धारा 370 के मुद्दे को गरमाया जा रहा है? ज़ाहिर है कि इसके पीछे कोई न कोई योजना तो होगी ही! इससे कोई न कोई नतीजा तो अपेक्षित होगा ही! क्या अपेक्षित है, सब जानते हैं!
लेह घुसपैठ और हिंडोला!

लेकिन क्या मौजूदा माहौल में यह बड़ा जोखिम नहीं है? मैं पहले ही लिख चुका हूँ कि मोदी की विदेश नीति की असली परीक्षा चीन और पाकिस्तान के मामले में ही होगी. इसके अपने कारण हैं. इसीलिए जब हुर्रियत के नेताओं की पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मुलाक़ात के कारण सचिव स्तर की बातचीत खटाक से रद्द कर दी गयी, तो किसी को ज़्यादा हैरानी नहीं हुई. लेकिन अभी चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के ठीक पहले अचानक चीन ने लेह में घुसपैठ कर दी! इधर चीनी राष्ट्रपति महोदय को आप हिंडोले में झुला रहे थे, उधर उनके जवान सीमा पर आँखें तरेर रहे थे. ज़रा कल्पना कीजिए, किसी और सरकार के ज़माने में यह हुआ होता तो नमो और बीजेपी किस तरह दहाड़ रहे होते! कहने को तो आप कह सकते हैं कि साझा प्रेस कान्फ़्रेन्स में मोदी ने इस मुद्दे को खुल कर उठाया, सही बात है! लेकिन यह भी सही है कि शीर्ष स्तर से लेकर कई स्तरों पर कई बार इस मुद्दे को जिनपिंग की यात्रा के दौरान कई बार उठाया गया, लेकिन ताज़ा ख़बरों के मुताबिक़ सीमा पर हालात वैसे ही बने हुए हैं और घुसपैठ जारी है. टाइम्स आफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक (20 सितम्बर 2014, पेज 18) प्रधानमंत्री मोदी ने ही कम से कम चार बार जिनपिंग से कहा कि चीनी सैनिकों को तुरन्त वापस लौटना चाहिए, लेकिन हालात जस के तस बने रहे. इसलिए कहने को आप कुछ भी कहते रहिए, लेकिन विदेश नीति की भाषा में इसका क्या अर्थ होता है, समझने वाले समझते हैं! आपको याद आया कि अपनी जापान यात्रा में प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के बारे में क्या बोला था! (वैसे याद दिला दें कि 2013 में मनमोहन सरकार के समय चीनी प्रधानमंत्री ली कु चियांग की भारत यात्रा के कुछ दिनों पहले भी ऐसी घुसपैठ हुई थी और दौरा रद्द कर देने की भारत की धमकी के बाद चीनी सैनिकों को वापस लौटना पड़ा था).

लेह कोई कूटनीति की पहली और आख़िरी चुनौती नहीं है. क्योंकि आने वाला समय बड़ा चुनौती भरा है. दुनिया के क्षितिज पर आज जैसे हालात हैं, उनमें एक भी ग़लत क़दम ऐतिहासिक चूक करा सकता है. राजनीति और कूटनीति दोनों इस समय एक बेहद नाज़ुक दौर में है. और ऐसे समय में जब मोदी ने महीने भर पहले स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में साम्प्रदायिकता पर दस साल के लिए रोक की अपील की थी, तब लगा था कि सचमुच वह देश की बुनियादी समस्याओं को सुलझाने को लेकर बड़े गम्भीर हैं. लेकिन उसके बाद के एक महीने की घटनाएँ उनकी अपील के बिलकुल उलट रहीं! क्यों? इस पर मोदी मौन हैं. यह उनकी मजबूरी है या मरज़ी कि उनकी रसायनशाला से ‘लव जिहाद’ छाप अवलेह बँटना जारी है! खेल ख़तरनाक है. मुझे लगता है कि नमो अगर कहीं गच्चा खायेंगे तो कूटनीति और साम्प्रदायिकता के सवाल पर ही. पता नहीं, उन्होंने इस बारे में कुछ सोचा है या नहीं? या वह सोचने की ज़रूरत समझते भी हैं या नहीं?

(रागदेश)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 6 years ago on September 20, 2014
  • By:
  • Last Modified: September 20, 2014 @ 10:52 am
  • Filed Under: राजनीति

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

हारी हुई कांग्रेस को लेना चाहिए नेहरू की बातों से सबक..

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: