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साम्प्रदायिकता का नया औज़ार : सोशल मीडिया..

-भावना पाठक||

ये इंसानी फितरत है कि हमारा ध्यान अच्छी चीज़ों से पहले बुरी चीज़ों की तरफ जाता है. किसी का अश्लील एम. एम. एस. हो, कोई विवादित मुद्दा हो, सेक्स या क्राइम से जुड़ी कोई खबर हो, इन्हे हम सरसरी निगाह से ही सही एक बार देखते ज़रूर हैं. मीडिया खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी ऐसी ख़बरों को मिर्च-मसाले के साथ परोसता है. ऐसी खबरें सोशल मीडिया पर भी बड़ी तेज़ी से वायरल हो जाती हैं. सोशल मीडिया अपनी बात को टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो और फोटो के ज़रिये लाखों लोगों तक पहुचाने का पसंदीदा प्लेटफार्म बनता जा रहा है खासकर युवाओं के बीच. युवाओं का ये स्वाभाव होता है कि वो बहुत जल्द उग्र भी हो जाते हैं और उत्साहित भी इसलिए उन्हें भड़काना ज़्यादा आसान होता है खासकर देश, जाति और धर्म के नाम पर. इसका पूरा फायदा साम्प्रदायिकता फैलाने वाली ताक़तें उठाती हैं.Social Media Logotype Background

२०१३ में उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में जो दंगा भड़का था उसका कारण सोशल मीडिया पर फैली अफवाहें ही थी. दरअसल सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडिओ ने मुज़फ्फरनगर में सांप्रदायिक उन्माद को हवा दी जिसने दंगे का रूप ले लिया. इस दंगे में ५० लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी और कई बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए. बाद में पता चला की जिस वीडिओ की वजह से मुज़फ्फरनगर में दंगा हुआ था वो वीडियो फ़र्ज़ी था और दो साल पुराना भी जिसे पाकिस्तान में बनाया गया था. इसी तरह अगस्त २०१२ में जब मुंबई, पुणे, बैंगलोर, के अलावा चेन्नई, हैदराबाद, मैसूर में काम कर रहे उत्तर पूर्वी राज्यों के लोग अचानक अपने अपने राज्यों का रुख करने लगे तो पता चला कि उसकी वजह उनके मोबाइल पर आने वाले वो ढेरों एस. एम. एस. थे जिनमें लिखा था कि असम में हुए मुस्लिम-बोडो दंगों की वजह से उन्हें यहां भी साम्प्रदायिक हिंसा झेलनी पड़ सकती है, वो निशाने पर हैं. दूसरी चरण में सोशल मीडिया पर उत्तर पूर्वी राज्यों के लोगों के खिलाफ बड़ी तेज़ी से प्रचार प्रसार हुआ, पेज तक बनाये गए जिन्हे लोगों ने लाइक किया और उनपर कमेंट भी किये. इससे दूसरे शहरों में रह रहे इन राज्यों के लोगों में अफरातफरी मच गयी. बाद में सरकार ने ऐसी अफवाहें फैलाने वाले २४५ पेज ब्लॉक कराये. सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट के कारण मध्य प्रदेश में भी सांप्रदायिक हिंसा की लगभग आधा दर्जन घटनाएं दर्ज़ की गयीं. खंडवा में एक प्रॉपर्टी ब्रोकर के आई. डी. को हैक करके किसी ने आपत्तिजनक धार्मिक फोटो अपलोड कर दी और उस फोटो ने सांप्रदायिक चिंगारी को हवा दी जिसकी वजह से वहाँ कर्फ्यू लगाना पड़ा और एक युवक को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. हाल ही में आतंकी संगठन आई. एस. आई. एस. द्वारा अमेरिका के दो पत्रकारों का सिर कलम करने वाला वीडियो यू ट्यूब पर खूब देखा गया इस वीडियो को इंटरनेट पर अपलोड करने के पीछे आई. एस. आई. एस. का मक़सद निश्चित तौर पर दुनिया को अपनी ताक़त दिखाना था साथ ही इसके ज़रिये वो वैश्विक जेहाद का सन्देश भी देना चाहते हैं.

भारतीय साइबर मॉनीटरिंग एजेंसियों का कहना है की यूँ तो हम अपने स्तर पर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर आने वाली भड़काऊ और आपत्तिजनक पोस्ट को रोकने की कोशिश कर रहे हैं ताकि कोई जेहादी गतिविधियाँ न हो सकें लेकिन जितनी तेज़ी से सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ रहा है उसे देखते हुए हमें इन मामलों में अमेरिका जैसे देशों के सहयोग की ज़रुरत पड़ेगी क्यूंकि ज़्यादातर सोशल वेबसाइट के सर्वर अमेरिका में हैं. सोशल मीडिया पर हर पोस्ट की जांच एक लम्बी प्रक्रिया है और इसके पूरे होने तक कोई भी आपत्तिजनक पोस्ट कई लोगों तक पहुंच चुका होता है.

सोशल मीडिया धीरे धीरे अफवाहें, विवाद, सांप्रदायिक हिंसा फैलाने का आसान जरिया बनता जा रहा है. इस पर फ़र्ज़ी आई. डी. से अकाउंट बनाना, गलत नाम पते पर जारी मोबाइल सिम से इंटरनेट के ज़रिये फेसबुक, व्हाट्स अप , ट्विटर कुछ भी डालना काफी आसान होता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंटरनेट पर कुछ भी पोस्ट करने वाले फ़र्ज़ी प्रोफाइल की पहचान तब तक संभव नहीं है जब तक वो इंसान दोबारा इंटरनेट पर सक्रिय न हो. आमतौर पर ऐसी अफवाहें ओपन वाई-फाई एरिया से शेयर की जाती हैं ऐसे में जांच प्रक्रिया संस्था के मुख्यालय तक आके रुक जाती है क्यूंकि संचालकों को भी पता नहीं होता कि किस तारीख, किस वक़्त और किस डिवाइस से ऐसी सूचना भेजी गयी. सर्विस प्रोवाइडर कंपनी के सर्वर में भी रजिस्टरड उपभोक्ता की आई. पी. एड्रेस दर्ज होती है जिससे ओपन वाई-फाई का इस्तेमाल करने वाले अपराधियों को पहचानना और पकड़ना मुश्किल हो जाता है. उन्हें तभी पकड़ा जा सकता है जब वो निगरानीशुदा जोन में फिर से ऑनलाइन हो.

इस तरह देखा जाए तो सोशल मीडिया के ज़रिये जाति, धर्म और नस्ल के आधार पर दुनिया के किसी भी कोने में हिंसा फैलाई जा सकती है इसलिए ये समस्या किसी एक देश की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की है. ऐसे में सभी देशों को एक साथ आना होगा और विश्व स्तर पर पुख्ता साइबर सुरक्षा के बारे में सोचना होगा. ये साइबर पैनल निगरानी रखे कि यू ट्यूब, व्हाट्स -अप, फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया का कोई बेजा इस्तेमाल न कर सके. इस दिशा में मुंबई पुलिस द्वारा की गयी पहल तारीफ के काबिल है. मुंबई पुलिस ने सोशल मीडिया लैब बनाया है जिसका काम महाराष्ट्र में सोशल मीडिया पर होने वाली आपत्तिजनक गतिविधिओं को रोकना और उन पर नज़र रखना है. इस सोशल मीडिया लैब ने ऐसे कई आपत्तिजनक पेज और पोस्ट को ब्लॉक कराया जिससे राज्य में तनाव फ़ैल सकता था. ऐसे सोशल मीडिया लैब की ज़रुरत हर राज्य को है. हमें भी सजग रहने की ज़रुरत है. जब भी कोई ऐसी आपत्तिजनक पोस्ट हमारे पास आये हम उस पर कोई कमेंट न करें, उसे दूसरों के साथ शेयर न करें और न ही लाइक करके ऐसी अफवाहें और हिंसा फ़ैलाने वाले लोगों को बढ़ावा दें. संचार क्रांति के इस दौर में हमारा मीडिया लिटरटे होना बहुत ज़रूरी है. सूचना और तकनीकी ज्ञान एक बहुत बड़ी ताक़त है इसका उपयोग शांति और सदभावना फैलाने के लिए होना चाहिए न कि दुनिया में द्वेष और हिंसा भड़काने के लिए.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.